नए कश्मीर का आक्रोशी आगाज

Nov 1st, 2019 12:05 am

31 अक्तूबर से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग संघ शासित क्षेत्र हो गए हैं। व्यवस्था और संविधान बदल गए हैं। विशेष दर्जे के कारण लागू 153 पुराने कानून खत्म कर दिए गए हैं और अन्य राज्यों की तरह 106 केंद्रीय कानून अब कश्मीर में भी लागू होंगे। आधार, सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार सरीखे राष्ट्रीय कानून भी लागू हो जाएंगे। अब अधिकृत भाषा उर्दू के बजाय हिंदी होगी। अब ये क्षेत्र प्रत्यक्ष तौर पर भारत सरकार के अधीन आ गए हैं। कानून-व्यवस्था केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन होगी। अब संविधान और तिरंगा भी भारत के ही होंगे। बेशक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में इतिहास ने करवट ली है, नया समय लिखा जा रहा है, नए बदलाव का आगाज भी हो रहा है, लेकिन कुछ आशंकाएं बरकरार हैं। कश्मीर में एक तबका अपने पुराने संविधान और झंडे के साथ आक्रोश में है। वह ‘हिंदुस्तान, आरएसएस मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहा है और उसे अनुच्छेद 370 वापस चाहिए। अनजानी और अदृश्य ताकतें मजदूरों और ट्रक चालकों के रूप में आम हिंदुस्तानी की हत्याएं कर रही हैं। इन ताकतों को सीमापार के आतंकी कह सकते हैं। यह सिलसिला चिंतित करता है और सरकार के दावों पर सवाल भी करता है। ऐसे ही माहौल में यूरोपीय संघ के सांसदों ने कश्मीर घाटी का दौरा किया। उस दल में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, बेल्जियम आदि देशों के 23 सांसद थे। शेष चार सांसद कश्मीर नहीं गए और अपने देशों को लौट गए। यूरोपीय सांसद कश्मीर क्यों गए? उनके प्रवास का खर्च किसने उठाया? प्रधानमंत्री मोदी से सांसदों की मुलाकात कराने वाली महिला कौन थी? और क्या यह आयोजन महज प्रचार की एक कवायद थी? ये सवाल भारत सरकार के कूटनीतिक प्रयासों के सामने बेमानी हैं। न हमारी विदेश नीति से समझौता किया गया और न ही वे सांसद आतंकवादी थे। प्रधानमंत्री से मुलाकात के पहले सभी मानकों का पालन किया गया होगा! गौरतलब यह है कि लोकतंत्र के मौजूदा युग में नाजीवादी, फासीवादी सरीखे विशेषण भी गालीनुमा हैं। मेहमानों को गालियां देना हमारी संस्कृति नहीं रही है। नाजीवाद, फासीवाद का दौर हिटलर की समाप्ति के साथ ही खत्म हो चुका है। यदि सांसद दक्षिणपंथी सोच के थे और उस नाते भाजपा-संघ के करीब लगते थे, तो वामपंथी के मद्देनजर क्या यह सोच आपराधिक है? यूरोपीय संघ के सांसदों ने अनुच्छेद 370 को भारत का आंतरिक मामला माना है और कश्मीर के हालात पर संतोष जताया है। पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित किया है। यह भी कहा है कि पाकिस्तान दहशतगर्दों को फंडिंग करता रहा है। मेहमान सांसदों की इन टिप्पणियों का स्वागत है, क्योंकि आतंकवाद पर उन्होंने भारत का साथ देने की बात कही है। अलबत्ता भारत को कश्मीर पर किसी के प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। कश्मीर फिलहाल सामान्य नहीं है, लेकिन हो रहा है, यह सच हम अच्छी तरह जानते हैं। हमारे अपने व्यापारिक संगठनों का आकलन है कि 370 हटाए जाने के बाद करीब एक लाख लोगों के रोजगार पर संकट आया है। सेब, पर्यटन, हस्तशिल्प आदि के कारोबार प्रभावित हुए हैं। कुल घाटा 10,000 करोड़ रुपए का आंका जा रहा है। बहरहाल विदेशी सांसदों के कश्मीर प्रवास पर विपक्ष के कुछ सांसदों और नेताओं को आपत्ति थी। कुछ छुटभैये नेताओं की टिप्पणी पर हम कोई व्याख्या नहीं करेंगे। हमारे अपने सांसदों की तुलना विदेशियों से नहीं की जा सकती। यह बिल्कुल अलग विषय है, जिसका विश्लेषण भी अलग ही होना चाहिए, लेकिन खासकर कांग्रेस याद करे कि जब नेता विपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेतली 2012 में कश्मीर में तिरंगा फहराने जाना चाहते थे, तो केंद्र की मनमोहन-सोनिया सरकार ने जाने से रोक दिया था। कांग्रेस के बड़े नेता अपने विवादास्पद बयानों को भी याद रखें। 370 हटाने के बाद माहौल बेहद नाजुक था, उसमें किसी भी तरह की सियासत की दरकार नहीं थी। यूरोपीय सांसद हमारे मेहमान थे, लिहाजा उनका स्वागत करना हमारी संस्कृति थी। उससे किसी संसदीय, विदेशी या राष्ट्रीय नीति का उल्लंघन नहीं हुआ।

 

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