पुरस्कृत साहित्यकारों की रचनाधर्मिता-3

हाल ही में हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने साहित्यकार गंगाराम राजी, बद्री सिंह भाटिया, प्रो. केशव राम शर्मा, इंद्र सिंह ठाकुर, प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल तथा सरोज परमार को साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा की। इन साहित्यकारों की पुरस्कृत रचनाओं के प्रति रचनाधर्मिता क्या रही, संघर्ष का जुनून कैसा रहा, अपने बारे में साहित्यकारों का क्या कहना है तथा अन्य साहित्यकार व समीक्षक इनके बारे में क्या राय रखते हैं, इसी का विश्लेषण हम इस नई सीरीज में कर रहे हैं। पेश है इस विषय में प्रतिबिंब की तीसरी किस्त:

नदिया सी बहती हैं सरोज की कविताएं

प्रत्येक रचनाकार का अनुभव संसार उसकी रचनाओं में अंतर्निहित रहता है। सरोज परमार भी इसका अपवाद नहीं हैं। अंतर केवल इतना है कि ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ की लेखिका संकेतों, बिम्बों एवं प्रतीकों के माध्यम से अपनी घनीभूत संवेदना कला वैभव के साथ वाणी देती हैं। प्रत्यक्ष की अपेक्षा अप्रत्यक्ष संप्रेषण, कहा-अनकहा पाठक के मर्म को छू लेता है। अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘घर, सुख और आदमी’ से लेकर ‘समय से भिड़ने के लिए’ की मुद्रा दर्शाती हुई कवयित्री यथार्थ से सूक्ष्म और भावों की भींच तक का सफर तय करती हैं, अपने नदी होने वाले काव्य में, जो नास्टैजिया से भरपूर है, और टीस बराबर चलती रहती है, मानो भावनाओं के समानांतर उसकी आलोचना, मंथन एहसास बन कर चल रहा हो। रचनाकार जब अपनी रचनाओं में संन्यासी की मुद्रा में आ जाता है तो उसे अपार आनंदानुभूति होती है और पाठक भी उसमें सराबोर होता चलता है। स्फुट शब्दों में अस्फुट अभिव्यक्ति सरोज परमार की कविता को ंअलग पहचान देती है।

— डा. सुशील कुमार फुल्ल, वरिष्ठ साहित्यकार

भरपूर जीवन जीने की उत्कंठा से लबरेज़ सरोज परमार को लगता है उन्होंने लिखा ज़रूर है लेकिन उतना नहीं, जितने ज़ख्म मिले हैं। अब उन्हें समय कम लगता है, सेहत साथ नहीं देती और नामुराद कैंसर उनके जिस्म पर ऑक्टोपस की तरह चिमट गया है। कुछ दिन हिम्मत करके ़कलम उठाती हैं तो सेहत ऐसी रूठती है कि मनाए नहीं मनती। उकेरे शब्द मंजकर, माला में नहीं गुंथ पाते। लिखे हुए स़फे के स़फे बिखरे रह जाते हैं। बहुआयामी प्रतिभा की धनी लेकिन मुख्यतः कवयित्री सरोज परमार के अब तक प्रकाशित तीन संवेदनशील काव्य संग्रहों, ‘‘घर, सुख और आदमी’’, ‘‘समय से भिड़ने के लिए’’ और ‘‘मैं नदी होना चाहती हूं’’ में शिल्प का निर्वहन बड़ी दक्षता एवं सफलता से निभाया गया है। वैविध्य से भरी इन कविताओं में न केवल स्त्री विमर्श के लिए पर्याप्त सूत्र मौजूद हैं बल्कि समकालीन सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध भी सशक्त आवाज़ उठाई गई है। उनकी सभी कविताओं में दज़र् प्रतीक एवं बिंब उनकी स्वाभाविक क्षमता हैं। स्पष्ट की अपेक्षा अस्पष्ट, प्रत्यक्ष की अपेक्षा अप्रत्यक्ष संप्रेषण ने उनकी चुनी हुई विषय वस्तु को अन्यत्र कलात्मकता प्रदान की है। वह पाठक को जीवन के सघन अनुभव कराते हुए आगे बढ़ती हैं। ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ में सम्मिलित उनकी 63 रचनाओं में, समय से बंदिश करतीं नदी पर उनकी आठ कविताएं पाठक को सोचने पर विवश करती हैं कि क्या अपनी नैसर्गिकता में जीने वाली नदियों का अब कोई भविष्य बचा है? मौज़ूदा दौर के अंगारों के समान दहकते प्रश्नों के साथ स्त्री विमर्श के मुद्दों को भी कवयित्री ने अपने ढंग से उठाया है।  

— अजय पाराशर, साहित्यकार

समकालीन हिंदी कविता में सरोज परमार सुपरिचित नाम हैं। वह गत चार दशकों से अधिक से सृजनरत हैं। ‘घर, सुख, आदमी’ और ‘समय से भिड़ने के लिए’ के बाद सन् 2015 में ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ शीर्षक से तीसरा काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसमें 63 कविताएं संग्रहीत हैं। सरोज परमार की कविताएं समकालीन युगबोध को आत्मसात किए मनुष्य की चेतना और उसके अंतर्द्व़ंद्वों को घनीभूत संवेदना के साथ मूर्तिमान करती हैं। वह जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को गहन अर्थ प्रदान करती हैं। उनकी कविताओं का फलक सघनता के साथ समाज और जीवन के संवेदन जगत को बिंबों, प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से रूपायित करता है। सरोज परमार की ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ संग्रह की प्रारंभिक आठ कविताएं स्त्री विमर्श से संपृक्त सवालों और नारी उत्पीड़न के रूपों व संत्रास को मूर्तिमान करती हैं। स्त्री विमर्श का यह क्रम उनकी ‘जब चाहा’, ‘तलाकशुदा औरत’, ‘पीठ पर चिपटा पोस्टर’, ‘औरत ः पांच स्थितियां’, ‘घड़ी’ आदि कविताओं में नारी जीवन की विडंबनाओं के संदर्भ में और अधिक मुखर होकर सामने आया है। संग्रह की अनेक कविताएं छोटी हैं, परंतु उनकी ‘रेंज’ विस्तृत हैं। उनकी कविताएं सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण, संवेदनशून्यता, भौतिकता की अंधी दौड़, पर्यावरण आदि अपने समय और समाज के ज्वलंत प्रश्नों से टकराती हैं।

— डा. हेमराज कौशिक, साहित्यकार

लगभग आधी शताब्दी की सरोज परमार की कविता यात्रा उनके तीन कविता संग्रहों में संग्रहित है। समग्रता में देखें तो पुरस्कृत संग्रह ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ की तर्ज पर उनकी कविता की किसी धारा में उन्हें नहीं बांधा जा सकता, न ही किसी आंदोलन या संगठन के कायदे उनकी कविता पर लागू होते हैं। कहना यह है कि व्यक्तिगत अनुभवों, प्रेम, स्त्री और प्रकृति की लौकिक दुनिया से गुजरते हुए उनकी कविता अलौकिक दुनिया के दरवाजे पर दस्तक देती है। उनकी नदी सिरीज की कुछ कविताओं को अलग से रेखांकित किया जा सकता है जहां पर्यावरण के क्षरण तथा व्यवस्था की उदासीनता को लेकर भी उनकी चिंताएं उजागर होती हैं। संग्रह की अंतिम महत्त्वपूर्ण कविता ‘शब्द’ के माध्यम से कविता की सत्ता के प्रति उनका अगाध विश्वास व्यक्त होता है। कवि अजेय को समर्पित ‘शिद्दत से याद आए’ तथा ‘पीठ पर चिपका पोस्टर’ भी अलग तेवर की कविताएं हैं।                 

— निरंजन देव शर्मा, साहित्यकार

सरोज परमार के साहित्य पर विद्वानों के विचार

लंबे समय से कविताएं लिख रहीं, प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित व चर्चित हो रहीं, सरोज परमार का तीसरा काव्य संग्रह मानो बोधात्मक स्फुलिंग है। ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ संकलन की कविताएं, जीवन संघर्ष में उनके जुझारुपन को एक ठांव उपलब्ध करवाती चेतना का उद्घाटन हैं। नदी को संबोधित आठ कविताओं में, विकेंद्रित होते पर्यावरण और बेदखल होती स्त्री की चिंता को लेकर, प्रश्न और समाधान दोनों है, यह एक अकेली पंक्ति – ‘क्या सहते हुए बहना ही, जीवन सत्य है।’…सत्ता, धर्म और संचार माध्यमों की स्वार्थ सिद्धि के हेतु प्रायोजनों पर उनकी व्यंग्यात्म पंक्तियां सटीक और समसामयिक हैं। अपने समय को गहराई से समझ कर सरोज परमार, देश-काल की सीमाएं लांघ जाती हैं। करुणा से सराबोर मानव मात्र पर दृष्टि गाढ़ते हुए – ‘कभी-कभी रुई भी कात लेती हूं/चादरें बुनती हूं/इराक के नवजात शिशुओं के लिए।’ चिंता का यह उदार वैभव व दुख का साधारणीकृत काव्य-रूप, विशेष निज भाषा शैली में अभिव्यक्त होकर इस संग्रह को पठनीय तथा संग्रहणीय बना देता है। उनकी साहित्यिक यात्रा व उपलब्धियों के लिए सस्नेह बधाई तथा शुभकामनाएं।  

-प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल, साहित्यकार

हिमाचल के सुंदर इलाके पालमपुर से संबद्ध वरिष्ठ कवयित्री सरोज परमार ने मानव संवेदनाओं से सराबोर कविताएं लिखी हैं, प्रेम और प्रकृति उनकी कविताओं में भरपूर है। स्त्री संवेदना और अनुभूति को सरोज परमार ने अपनी कविताओं में जमकर उकेरा है। भाषा कोई बंधन नहीं रहा है। बस भावनाओं का प्रवाह नदी जैसा है। सरोज परमार स्त्री विमर्श से परे सीधी और साफ  टिप्पणी करती हैं। उन्हें मालूम है कि हमारे समाज में स्त्री और पुरुष में जो भेदभाव है, वह किस हद तक एक स्त्री को प्रभावित करता है। सामाजिक ताने-बाने में एक स्त्री को उसका पूरा हक कभी नहीं दिया गया। उसके ऊपर सारी जिम्मेदारी तो डाल दी, कर्त्तव्यों का बोझ भी लाद दिया, लेकिन अधिकारों की बात नहीं की। उस पर सारे बंधन, नियम, कानून आदि थोपे गए। सरोज परमार ने संघर्ष भरे अपने जीवन में छोटी-छोटी खुशियां खोज निकालने की भरपूर कोशिश की है। दूसरों की पीड़ा को महसूस करने का प्रयत्न किया है। वह नदी से भी बतिया लेती हैं। सरोज परमार की नदियों पर बहुत कविताएं हैं। यूं लगता है जैसे नदी से उनका एक पक्का रिश्ता है। नदी को वह अपना दोस्त मानती हैं। नदी से बात करती हैं, नदी से सवाल करती हैं और नदी के साथ रहना चाहती हैं।           

-गणेश गनी, साहित्यकार

पिछले पांच दशक से चुपचाप लगातार साहित्य की विभिन्न विधाओं में सृजनरत व तीन कविता संग्रहों- घर, सुख और आदमी, समय से भिड़ने के लिए और मैं नदी होना चाहती हूं, से देश के काव्य परिदृश्य में अपनी धारदार उपस्थिति दर्ज करवाने वाली सरोज परमार को हिमाचल प्रदेश कला संस्कृति व भाषा अकादमी सम्मान भले ही काफी विलंब से मिला है लेकिन सचमुच उनकी कविताएं इस सम्मान की हकदार हैं। भाषा, शिल्प और कथ्य की दृष्टि से उनकी कविताएं श्रेष्ठ हैं और उन्हें समकालीन कवयित्रियों की कतार में अलग से खड़ा करती हैं। भाषा के साथ उनका एक बेहद अंतरंग, लचीला और घनिष्ठ रिश्ता है जो उनकी कविताओं में प्रस्फुटित होता है। उनकी सारी संवेदनाएं शब्दों में मुखरित होती हैं। जीवन का संघर्ष यथार्थ के धरातल पर उनकी रचनाओं में झांकता है, इसलिए तमाम रचनाएं जिंदगी के बहुत करीब महसूस होती हैं। सरोज परमार की कविताओं से गुजरते हुए यूं लगता है जैसे उन्होंने अपनी कविताओं में हमारे एहसास और हमारी अनुभूतियां भी व्यक्त की हैं, उन्हें शब्द दिए हैं। जिंदगी के तमाम रंग उनकी कविताओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते दिखते हैं। सरोज परमार ने स्त्री विमर्श की बिल्कुल नई भाषा रची है और आम औरत के दर्द को भी स्वर दिया है। उनकी कविताएं यह साबित करती हैं कि स्त्री की पीड़ा को स्त्री होकर ही बेहतर जाना जा सकता है। उनकी कविताओं से गुजरते हुए आम औरत के भीतर की छटपटाहट और उसकी बेचैनी को पाठक अपने अंदर महसूस करने लगता है और कविता से गुजरते हुए पाठक का बेचैन हो जाना ही सरोज परमार की कविता की ताकत को दर्शाता है।                      

-गुरमीत बेदी, साहित्यकार

सरोज परमार उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने विशाल हिमाचल बनने के शुरुआती दिनों में कविता की लौ जगाई। विशेषकर हिंदी कविता में महिला लेखन का जब नितांत अभाव था, सरोज परमार एक नाम उभर कर आया जिसने समसामयिक और आधुनिक कविता का अलख जगाया। नारी-मन की कोमल अनुभूतियों के साथ नारी समाज की तमाम विडंबनाओं को इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। नारी की व्यथा, दीन-हीन स्थिति के साथ बलिदान के भाव को भी उजागर किया। यह उस युग की बात है जब यहां महिला लेखन नहीं के बराबर था। जब कमला वर्मा कमल हमीरपुर से पहाड़ी में और हरिप्रिया कुल्लू से हिंदी में कविता लिखती थीं, उस समय सरोज परमार अपनी मारक भाषा और तीक्ष्ण शैली के लिए जानी जाती थीं। हालांकि इसके बाद रेखा वशिष्ठ और रेखा ढडवाल जैसे प्रभावी स्वर भी उभरे। सरोज परमार ने नारी-मन की संवेदनाओं को अपनी अलग काव्य भाषा और शैली में स्वर दिया है। हालांकि पुरस्कार मिलना कोई पैमाना नहीं है, फिर भी चाहे देर से ही सही, सरोज परमार को एक बार फिर कविता के लिए मान्यता मिली है।

-सुदर्शन वशिष्ठ, वरिष्ठ साहित्यकार

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