बदले बदले से मलाल

Nov 15th, 2019 12:05 am

कुछ तो तड़प रही होगी जो राजनीति अपने इशारों में बात करती है। हालिया घटनाओं के आवरण में छुपी बयानबाजी को ही लें, तो मसला पक्ष और विपक्ष का नहीं, बल्कि अपने भीतर की खुरचनों में हर पार्टी को मलाल है। मलाल के इन्हीं संदर्भों में केंद्रीय वित्त मंत्री अनुराग ठाकुर के वक्तव्यों की झाड़ पौंछ में जो गर्द गुब्बार उभरा है, उसे यूं ही नहीं देखा जा सकता। इन्वेस्टर मीट के अपने छोर पर खड़े केंद्रीय मंत्री ने सीमा रेखा खींची या विस्तृत होते मैदान पर यह महज शाब्दिक चौके-छक्कों का आंखों हाल रहा। जो भी हो इन्वेस्टर मीट के मीन मेख में विपक्ष के लंबे हाथ नहीं थे, बल्कि सुनहरे सफर के अपने शब्दों में अनुराग ठाकुर का जिक्र भी किस्से सुना रहा था। केंद्रीय राज्य मंत्री को यह क्यों कहना पड़ा कि उनकी भूमिका को निमंत्रण मिले न मिले, वह प्रदेश के हित में काम करेंगे। एक बार फिर देहरा के मोर्चा पर केंद्रीय विश्वविद्यालय का जिक्र जब दर्द की तरह उभरा तो भीतरी घाव प्रकट हुए। ऐसे में एक हिमाचली सांसद की निगाहों से हिमाचल की पहचान बदलने की कसौटी कहीं आहत है। हम यह अनुमान लगा सकते हैं और मीडिया के साथ रू-ब-रू होती ख्वाहिशों का संघर्ष बताता है कि सियासी कशमकश में प्रदेश का हाल क्या है। सवाल पनुः उसी ढाल पर जिस पर इससे पहले भी हिमाचल से कई केंद्रीय मंत्री रहे और हर बार पूछा यही गया कि उनकी पारी में राज्य का तालमेल क्यों कम रहा। कमोबेश सांसदों के मार्फत भी प्रदेश की तरक्की में योगदान का सारथी बनने का सफर कहीं न कहीं अधूरा रहा। कांग्रेस की सत्ता में ही देखें तो विक्रम महाजन, वीरभद्र सिंह, चंद्रेश कुमारी और आनंद शर्मा का केंद्र में मंत्री होना, प्रदेश को अपना मुकम्मल स्पर्श नहीं दे पाया। खास तौर पर आनंद शर्मा के वाणिज्य मंत्री रहते हुए प्रदेश को मिले आर्थिक पैकेज का खुर्द बुर्द होना, काफी समय तक सालता रहेगा। हैरत यह कि नादौन को मिले स्पाइस पार्क के चिन्ह भी मिट गए। कुछ इसी तरह कांग्रेस के दौर में राज्यसभा सांसदों की उदासीनता ने प्रदेश के संबोधन खुद तक सीमित रखे। उदाहरण के लिए लंबे दौर की नुमाइंदगी में विप्लव ठाकुर का संसद में होना गवाह है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय नहीं होती। दूसरी ओर राज्यसभा के रास्ते जगत प्रकाश नड्डा का केंद्रीय मंत्री होना भी, कई मसलों पर उनकी भूमिका पर प्रश्न खड़े करता है। बेशक वह बिलासपुर में एम्स ले आए, लेकिन हिमाचल की पैरवी में उनकी सतह कमजोर दिखाई देती है। खासतौर पर कनेक्टिविटी के मसले पर उनका प्रभाव आज भी सामान्य परिदृश्य में सड़क, रेल व हवाई सेवा विस्तार में कमतर दिखाई देता है। अनुराग ठाकुर ने इसी विषय को निवेश से जोड़ते हुए भले ही नेक सलाह दी है, लेकिन यह केंद्र से हिमाचल की वकालत का विषय है। प्रदेश को राजनीतिक प्रभाव के बुर्ज चाहिएं या ईमानदारी से किए गए प्रयास। हर कोई अपनी सियासी प्राथमिकताओं के विकास पर रहनुमा बनता है, जबकि प्रदेश केसंतुलन में अब दृष्टिकोण , सामंजस्य व संतुलन की आवश्यकता है। हिमाचल में रेल विस्तार ऊना के मार्फत, रोड नेट वर्क हमीरपुर के मार्फत और हवाई सेवाओं का विस्तार गगल एयरपोर्ट के मार्फत पूरा हो सकता है, लेकिन इनसे कहीं भिन्न सियासत को अपने स्वार्थ के प्रतीक चाहिएं। क्या नेरचौक मेडिकल कालेज के बगल में एम्स की उत्पत्ति तर्क संगत है या विश्वविद्यालयों के परिसर केवल जमीन पर रेखाएं खींचने से मुकम्मल होंगे। केंद्र बनाम हिमाचल के संघर्ष का एक अन्य चेहरा शांता कुमार के रूप में जब अटल सरकार में चमका, तो उसे पद से रुखसत करने की वजह भी प्रदेश के सियासी मरुस्थल ही बने। प्रदेश की राजनीतिक जागरूकता ने नेताओं को इस काबिल तो बना दिया कि वे हमेशा मतदाताओं की अभिलाषा में अपना रास्ता प्रशस्त करें, लेकिन लोकप्रिय राजनीति ने हिमाचल के भविष्य को तमाम संकीर्णताओं में बांध रखा है। लोग कर देना नहीं चाहते, इसलिए उधार पर यह राज्य अपनी सांसें चुनता है। सरकारें अपने ही कर्मचारियों को कार्य संस्कृति सिखा नहीं पातीं, इसलिए नौकरी केवल ट्रांसफर को वश में करने की कसौटी है। नागरिक अपनी काबिलीयत से व्यवस्था को अव्यवस्था में कायम रखने का दम रखते हैं, इसलिए खुद सरकारें टीसीपी कानून की शक्तियां क्षीण करते हुए यह तय करती हैं कि किस तरह शहरी विकास योजनाओं से गांव बाहर कर दिए जाएं। राजनीति की धुरी पर घूमते हिमाचल को जो जोर से घुमाएगा, वही विजेता है और इस तरह यह मजबूरी है कि  यहां हर नेता बदला बदला नजर आता है।  

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