भारत में जनमत संग्रह हो 

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

इंग्लैंड में तीन वर्ष पहले सवाल उठा था कि इंग्लैंड को यूरोपियन यूनियन का हिस्सा बना रहना चाहिए या उससे बाहर आ जाना चाहिए। उस समय सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी ने इस विवाद को समाप्त करने की दृष्टि से जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया। उन्होंने माना विषय इतना गंभीर है कि इस पर सांसदों द्वारा स्वयं निर्णय लेना उचित नहीं है। जनता क्या चाहती है इसे समझने की जरूरत है। कंजरवेटिव पार्टी यूरोपियन यूनियन में बनी रहने के पक्ष में थी और उन्हें पूरा भरोसा था कि जनमत उनकी तरफ  निर्णय देगा, लेकिन जनमत में लगभग 52 प्रतिशत लोगों ने यूरोपियन यूनियन से बाहर आने का निर्णय दिया…

हमारे लोकतंत्र में व्यवस्था है कि जनता द्वारा प्रतिनिधि चुने जाएंगे और वे जनता के निर्देशानुसार संसद में अपने मत डालेंगे। इस प्रकार संसद द्वारा जनता की इच्छा के अनुरूप निर्णय लिए जाएंगे, लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं होता है। कारण यह कि जन-प्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत स्वार्थों अथवा अपनी पार्टी के स्वार्थों के आधार पर संसद में मत डाल सकते हैं और उसी जनता के निर्देशों को नकार सकते हैं जिसके द्वारा उन्हें चुना गया है। यदि सभी पार्टियां इस प्रकार का व्यवहार करें तो जनता के सामने ऐसे व्यक्तियों के बीच में चयन करने का विकल्प मात्र रहता है जो विभिन्न तरीकों से जनता के निर्देशों के विपरीत कार्य करते हैं। जन-प्रतिनिधि और जनता के बीच में एक विशाल खाई बन गई है जिसे हमारा लोकतंत्र पार नहीं कर पा रहा है। यह समस्या विश्व के तमाम देशों में देखी गई है। इंग्लैंड में तीन वर्ष पहले सवाल उठा था कि इंग्लैंड को यूरोपियन यूनियन का हिस्सा बना रहना चाहिए या उससे बाहर आ जाना चाहिए। उस समय सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी ने इस विवाद को समाप्त करने की दृष्टि से जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया। उन्होंने माना विषय इतना गंभीर है कि इस पर सांसदों द्वारा स्वयं निर्णय लेना उचित नहीं है। जनता क्या चाहती है इसे समझने की जरूरत है। कंजरवेटिव पार्टी यूरोपियन यूनियन में बनी रहने के पक्ष में थी और उन्हें पूरा भरोसा था कि जनमत उनकी तरफ  निर्णय देगा, लेकिन जनमत में लगभग 52 प्रतिशत लोगों ने यूरोपियन यूनियन से बाहर आने का निर्णय दिया। यानी जिस कंजरवेटिव पार्टी ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने की पालिसी को बढ़ाया था उसी कंजरवेटिव पार्टी द्वारा बुलाए गए जनमत संग्रह में विपरीत निर्णय आया।

इस प्रकरण से पता लगता है कि जनता और जन प्रतिनिधियों के बीच में खाई कितनी गहरी हो सकती है। इस समस्या से स्विट्जरलैंड में गहरा विचार हुआ है। आज से पूर्व में स्विट्जरलैंड में तमाम जिले थे, जिन्हें कैंटन कहा जाता था। यह कैंटन स्वतंत्र थे। इन कैंटन में निर्णय जनता से सीधे चर्चा के माध्यम से लिए जाते थे। कैंटन के नेताओं को जब निर्णय लेना होता था तो वे कैंटन के सभी लोगों को आमंत्रित करते थे और एक जन सभा में सामूहिक निर्णय लिए जाते थे जिससे जनता की इच्छा के अनुरूप ही निर्णय होता था। इसके बाद समय क्रम में एक राष्ट्रीय शासन व्यवस्था बनाई गई, क्योंकि तमाम ऐसे विषय उत्पन्न हो गए जिन्हें कैंटन के स्तर पर सुलझा पाना संभव नहीं था, जैसे विदेश नीति अथवा मुद्रा। इसलिए स्विट्जरलैंड में एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर देश के सभी नागरिकों को बुलाकर सामूहिक चर्चा करना संभव नहीं था। इसलिए वहां पर जन-प्रतिनिधि की व्यवस्था की गई जैसे कि अपने देश में है, लेकिन साथ-साथ जनमत संग्रह की भी व्यवस्था जारी रखी गई। वहां वर्तमान व्यवस्था यह है कि यदि राष्ट्रीय संसद समझती है कि यदि कोई विषय गूढ़ अथवा दीर्घकालीन प्रभाव वाला है तो सरकार जनमत संग्रह कराती है। विशेष यह कि यदि बड़ी संख्या में लोग चाहते हैं कि किसी विषय पर जनमत संग्रह कराया जाए अथवा बड़ी संख्या में लोग समझते हैं कि सरकार की नीति उनकी इच्छा अनुरूप नहीं है तो वह सरकार को बाध्य कर सकते हैं कि उस विषय विशेष पर जनमत संग्रह कराया जाए। आज स्विट्जरलैंड में दोनों व्यवस्थाएं समानांतर चलती हैं। मूलतः निर्णय राष्ट्रीय संसद द्वारा लिए जाते हैं, लेकिन संसद स्वयं अथवा जनता मांग कर सकती है कि संपूर्ण जनता से जनमत संग्रह कराया जाए। अतः यदि राष्ट्रीय संसद जनता के निर्देशों के अनुरूप नहीं करती है तो जनता जनमत संग्रह के माध्यम से उसे बाध्य कर सकती है कि वह अपनी चाल में परिवर्तन लाए। अपने देश में वाजपेयी सरकार ने संविधान समीक्षा आयोग बनाया था। आयोग ने तमाम सुझाव दिए। उसमें एक सुझाव यह था कि विश्व व्यापार संगठन अथवा ‘डब्ल्यूटीओ’ जैसी संधियों को बिना संसद में चर्चा के प्रशासनिक स्तर पर दस्तखत करने का सरकार को हक नहीं होना चाहिए।

उन्होंने आगाह किया था कि डब्ल्यूटीओ संधि का जनता पर गहरा और दीर्घकालीन प्रभाव होना है। उनकी चिंता आज हमारे सामने स्पष्ट दिख रही है। इस संधि के कारण आज हम मुक्त व्यापार को अपनाने को बाध्य हैं जिसके कारण चीन में बना सस्ता माल देश में प्रवेश कर रहा है और जिसके कारण भारत के अमीर अपनी पूंजी समेत विदेश को पलायन कर रहे हैं और जिसके कारण विदेशी निवेशक आकर भारत में लाभ कमाकर हमारी पूंजी को विदेश ले जा रहे हैं। इसी कारण आज विश्व व्यापार संधि का संपूर्ण विश्व में विरोध हो रहा है। इस दूरदृष्टि से आयोग ने कहा था कि ऐसी महत्त्वपूर्ण संधियों को बिना संसद में पारित किए लागू नहीं करना चाहिए। मैं समझता हूं कि आयोग के इस विचार को और आगे बढ़ाने की जरूरत है। डब्ल्यूटीओ की तर्ज पर इस समय सरकार चीन की अगवाई में एक और मुक्त व्यापार संधि करने पर विचार कर रही है जिसे रीजनल कोंम्प्रेहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप ‘आरसीईपी’ का नाम दिया गया है। इस संधि को लागू करने के लिए चार नवंबर को पूर्वी एशियायी देशों का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें हमारे प्रधानमंत्री भाग लेंगे। आरसीईपी लागू होने के 15 वर्षों में भारत को चीन से आयातित होंने वाले अधिकतर माल पर शून्य कर लगाने होंगे। चीन से माल के आयात से वर्तमान में ही हमारे उद्योग दबाव में हैं और रोजगार का क्षरण हो रहा है। आयात कर शून्य कर देने के बाद हमारा टिकना कठिन हो जाएगा। अतः सरकार को चाहिए कि आरसीईपी पर जनमत संग्रह कराने के बाद ही कोई निर्णय ले। लेख लिखते समय तक सरकार ने आरसीईपी पर अंतिम निर्णय नहीं लिया था। अपने देश में जरूरत है कि ब्रिटेन और स्विट्जरलैंड की तर्ज पर हम भी जनमत संग्रह की स्थायी व्यवस्था लागू करें। सर्वोत्तम यह होगा कि हर वर्ष विपक्ष द्वारा एक प्रस्ताव बनाया जाए जिस पर देश की संपूर्ण जनता अपना मत प्रदान करे। ऐसा करने से जिन विषयों पर सरकार जनता के विपरीत चल रही है, उन्हें विपक्ष द्वारा उठाया जा सकेगा और सरकार को अपनी चाल बदलनी होगी। सरकार बाध्य होगी कि जनता के निर्णय के अनुसार कार्य करे। इस जनमत संग्रह के खर्च से हमें तनिक भी विचलित नहीं होना चाहिए। हमारी सरकार का वार्षिक बजट 2500 हजार करोड़ है जबकि जनमत संग्रह का खर्च एक हजार करोड़ से भी कम होता है। इतनी छोटी रकम का खर्च वहां करना उपयुक्त है जिससे कि देश सही दिशा में चल सके।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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