माओवादी जेहाद का अड्डा

बेशक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक प्रख्यात विश्वविद्यालय है। इसने शिक्षा के क्षेत्र में असंख्य होनहार विद्वान दिए हैं। शोधार्थियों की एक भरी-पूरी जमात है, जो विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं, अन्य सम्मानित पदों पर हैं, पत्रकार हैं और विदेशों में सक्रिय हैं। इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो.अभिजीत बनर्जी भी जेएनयू के छात्र रहे हैं। ऐसी महान परंपरा के बावजूद हिंदू धर्म और भारतीय सभ्यता-संस्कृति के महानायक स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अपमान किया जाए। उसके नीचे ‘भगवा जलाओ’ और ‘फासिज्म’ सरीखे शब्द लिख दिए जाएं, देशविरोधी हरकतों का अड्डा बन जाए और कई स्तरों पर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की गुंडई दिखाई दे, महिला पत्रकार से बदसलूकी, हाथापाई की जाए, तो इसे जेएनयू की कौन-सी परंपरा और जमात कहेंगे? बेशक ये चेहरे, उनके नारे और विरोध-प्रदर्शन जेएनयू का असली चेहरा नहीं है। विवि में फीस, अधिभार, भत्तों को लेकर नए संशोधन और बढ़ोतरी सामने आए हैं। छात्र उनका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संसद भवन तक भी जाने और सरकार को एहसास दिलाने की भी कोशिश की है, लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में विवेकानंद का दोष क्या है? गुस्सा और आक्रोश का पात्र उन्हें क्यों बनाया गया? बेशक यह भारत सरकार के दायित्वों में शामिल है कि उच्च शिक्षा भी सुलभ और सस्ती हो, ताकि शिक्षित और बौद्धिक पीढि़यां सामने आ सकें। शायद इसीलिए जेएनयू का बजट 556 करोड़ रुपए है और सबसिडी 352 करोड़ रुपए की है। औसतन एक छात्र पर चार लाख रुपए की सालाना सबसिडी खर्च की जाती है। सुविधाएं ऐसी हैं कि होस्टल में मात्र 10 रुपए माहवार किराए पर कमरा उपलब्ध है। बिजली, पानी, सर्विस चार्ज अभी तक निशुल्क रहे हैं। क्या ये सुविधाएं भारत-विरोधी नस्लें तैयार करने को दी जाती हैं? हम फीस के खिलाफ  मचे फसाद पर फिलहाल कोई विश्लेषण नहीं कर रहे, लेकिन भारत के गरिमामय महानायक विवेकानंद ने छात्रों का क्या बिगाड़ा था कि उनकी प्रतिमा को अपमानित किया गया? उन्हें ‘फासीवादी’ करार दिया गया? प्रतिमा को तोड़ने तक की कोशिशें की गईं? उस पर हिंसक प्रहार भी किए गए और लिख दिया गया-‘‘भगवा जलाओ।’’ कौन-सा भगवा…? और उसे क्यों जलाया जाए? क्या इसलिए कि वह भाजपा का एक प्रतीक-रंग है? लेकिन भगवा रंग तो राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगे’ में भी है। क्या भगवा रंग किसी की राजनीतिक और सांस्कृतिक बपौती हो सकता है? क्या विवेकानंद का अपमान भारतीय संस्कृति का अपमान नहीं है? क्या यह दंडनीय गुनाह नहीं है? तो फिर उन गुंडों को सजा कब दी जाएगी? दरअसल जेएनयू के भीतर यह जमात वह है, जो मृतप्रायः वामपंथ का झंडा उठाने का काम करती रही है। वह जमात माओवादी, नक्सलवादी, स्टालिनवादी है और ऐसी देशविरोधी हरकतें करना उसका जेहाद ही है। इस जमात के मुखौटे में एक युवा पीढ़ी पथ भ्रष्ट है और औसतन जेहादी छात्र दसियों साल विवि में पड़े रहते हैं। किसी न किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लेते हैं। आवरण पढ़ाई का, लेकिन हरकतें अराजकतावादी हैं। इस तरह हमारी एक पीढ़ी गल-सड़ रही है। देश की जनता ने तो वामदलों को कूड़ेदान में फेंक दिया है, लेकिन जेएनयू की एक भटकी जमात को आतंकी अफजल गुरु और मकबूल बट्ट के पक्ष में आंदोलित किया जा रहा है। वह जमात भारत की बर्बादी तक जंग के नारे लगाती है। भारत के टुकड़े-टुकड़े और आजादी की मांग करती है। ऐसी जमात के खिलाफ  कोई दंडात्मक कार्रवाई अभी तक क्यों नहीं की गई? किसी भी कुलपति ने ऐसी जमात को बर्खास्त कर विवि परिसर से बाहर क्यों नहीं फेंका? प्रसंग कन्हैया कुमार का भी याद आता है। देशद्राह वाले केस में मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी रपट दबाए बैठे हैं। न स्वीकृति और न ही खारिज…! नतीजतन कन्हैया को अदालत में देशद्रोही साबित नहीं किया जा सकता। राजनीतिक जमात भी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ में संलिप्त है। माओवादी जमात विवि में ही बीफ  समारोह मनाती है। जब दंतेवाड़ा में एक साथ कई जवान ‘शहीद’ होते हैं, तो यह जमात जश्न मनाती है, क्योंकि वे हत्याएं नक्सलियों ने की थीं। तो ये अराजक चेहरे स्वामी विवेकानंद का सम्मान कैसे कर सकते हैं? देश में करीब 800 विवि हैं, लेकिन यह चिंतनीय सवाल होना चाहिए कि जेएनयू के भीतर ही विवाद क्यों पनपते हैं? कमोबेश देश की सरकार भी अब सोचना शुरू कर दे कि शिक्षा की आड़ में तो देशविरोधी संस्कृति नहीं पनप रही है?

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