लंका नरेश रावण का साधना स्थलः राक्षसताल

हमने अर्थपूर्ण दृष्टि से एक-दूसरे की ओर देखा। ऐसा लगा कि कोई अज्ञात शक्ति हमें यहां से आगे बढ़ने से मना कर रही हो। ‘कल फिर आने का विचार है क्या?’ वामाखेपा ने पूछा। ‘रात में निर्णय करेंगे।’ हम तेजी से वापस लौटने लगे। हम दोनों वापस आ गए। वापस आने पर वामाखेपा ने पूछा- ‘कल चलोगे राक्षस ताल?’ ‘ना।’ मैंने स्पष्ट इनकार कर दिया…

-गतांक से आगे..

यहा का सारा वातावरण इसका साक्षी है। ऐसे डरावने, भयानक और निर्जन स्थान में केवल आसुरी प्रवृत्तियों वाला साधक ही तपस्या कर सकता है। मनुष्य का तो वहां रात में रुकने का साहस किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता। रात में वहां रुकने वाला प्रातः जीवित नहीं मिल सकता। हम अभी आगे भी न बढ़ पाए थे कि अचानक रोंगटे खड़े कर देने वाले सनसनाते हुए हवा के तेज झोंके सनसनाते तीरों के समान इस प्रकार आक्रमण करने लगे, मानो हमें यहां आने की सजा दे रहे हों। हमने अर्थपूर्ण दृष्टि से एक-दूसरे की ओर देखा। ऐसा लगा कि कोई अज्ञात शक्ति हमें यहां से आगे बढ़ने से मना कर रही हो। ‘कल फिर आने का विचार है क्या?’ वामाखेपा ने पूछा। ‘रात में निर्णय करेंगे।’ हम तेजी से वापस लौटने लगे। हम दोनों वापस आ गए। वापस आने पर वामाखेपा ने पूछा- ‘कल चलोगे राक्षस ताल?’ ‘ना।’ मैंने स्पष्ट इनकार कर दिया। स्पष्ट था कि कल की यात्रा से रावण ने अपना साधना स्थल वर्जित कर रखा है। इसी कारण कोई भूले-भटके ही राक्षस ताल जाता है, पर दोबारा भूलकर भी वहां जाने का साहस नहीं जुटा पाता। ‘उड्डीश तंत्र’ के रचयिता रावण ने बांध रखा है, निषेध कर रखा है। केवल इतना ही देख लिया। यही हम दोनों का सौभाग्य था। प्रिय पाठको, राक्षस ताल जाने के अनेक मार्ग हैं। मैं अल्मोड़ा के रास्ते राक्षस ताल तक गया था। यह यात्रा 210 मील की थी। इस यात्रा में विश्राम, ईंधन की बड़ी जटिल समस्याएं हैं। यहां के मूल निवासी लेपचा और भोतिया हैं।

तिब्बत में छिपा है तंत्र ज्ञान

ल्हासा ऊंचे पर्वत के असंख्य शिखरों के बीच बसा अति प्राचीन-सा लगने वाला नगर है। वहां अधिकांश मकान केवल पत्थरों और लकड़ी के बने हुए हैं। दलाई लामा के राजनिवास को छोड़कर शेष सभी छोटे-बड़े मकान बड़े ही अनगढ़ ढंग से बने हुए हैं। लगता है, पत्थरों का नगर है। अधिकतर पत्थर वहां के निवासियों के समान ही मटमैले सफेद रंग के हैं, जिन पर धूल की परतें सदियों से बिछती आ रही हैं। प्रातः काल सूर्योदय के समय और संध्या सूर्यास्त की बेला में जगमग करते पत्थर जलते-बुझते दीपों-से टिमटिमाते हैं और किसी ऊंचे शिखर से देखने पर ल्हासा तब अजब भुतहा-सा नगर दिखाई देता है। डोलमा मुझे पालपा में ही मिल गया था। पालपा से ल्हासा कोई ढाई-तीन किलोमीटर दूर है। बीच में सियांग नदी पड़ती है। बड़ी पतली धारा थी। हम उसे पैदल ही पार कर गए। गर्मी के मौसम में सियांग नदी में बाढ़ आ जाती है और तब उसे पार करना कठिन होता है।

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