लांछित करने की साजिश

भाजपा इस आघात से बच नहीं सकती और एक बार फिर साबित हो गया कि पार्टियों के भीतर सियासी कतरब्यौंत किस तरह हावी है। शीतकालीन सत्र से ठीक पूर्व सोशल मीडिया पर वायरल हुए पत्र बम का खुलासा परेशानियों का सबब बनकर पूर्व मंत्री रविंद्र सिंह रवि को कठघरे में खड़ा कर रहा है। फोरेंसिक जांच ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किस तरह वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार को लांछित करने की साजिश रचते हुए वर्तमान सरकार पर आक्रमण बोला गया। खबर इसलिए भी गर्म रही क्योंकि पत्र बम के निशाने पर एक मंत्री ही नहीं, बल्कि परोक्ष में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को भी चुनौती दी गई। यह खिचड़ी क्यों पकी और किसके चूल्हे पर चढ़ी, यह अंर्तकलह की आग बताएगी, लेकिन इस सारे प्रकरण का ठीकरा अब रविंद्र सिंह रवि पर फूटेगा। पूर्व मंत्री की पृष्ठभूमि और कांगड़ा के संदर्भों की सियासत का यह गठजोड़ पालमपुर केंद्रित रहा है, लिहाजा पूर्ववर्ती सरकारों के चाल और चरित्र पर फिर से चर्चा होगी। यह भी विडंबना रही कि वर्तमान भाजपा सरकार में सारे ओहदेदार बदले, तो सत्ता की पलकों पर नया साम्राज्य स्थापित हो गया। कभी रविंद्र सिंह रवि को जो हासिल था, वह अब विपिन सिंह परमार की ताकतवर छवि है। बावजूद इसके दोनों की सियासत में अंतर स्पष्ट है। विपिन सिंह परमार की पृष्ठभूमि के पीछे एक विस्तृत राजनीतिक तस्वीर व आरोहण की पद्धति खड़ी है, जबकि इस छवि से अलग रवि के प्रकाश में सूर्य केवल सरकार थी। इस दौरान पालमपुर के केंद्र बिंदु में जो कुछ रहा या बीता, उसे रविंद्र सिंह रवि के व्यक्तित्व से जोड़ा जा सकता है। जाहिर है तब कांगड़ा का सबसे बड़ा चेहरा इन्हें बनाया गया और इनके सामने कई मंत्री या विधायक बौने होते गए। यह वह दौर भी रहा जब जिला के भीतर दीवारें खड़ी होती गईं और तमाम अशांति के कई ध्वजधारक खड़े हुए। अब आरोहण के पथ पर स्थितियां-परिस्थितियां बदलीं तो साजिश का यह पैगाम, बदनाम हो गया। अगर सरकार सक्रिय न होती या फोरेंसिक रिपोर्ट निष्पक्ष न होती, तो कौन कह सकता था कि एक पूर्व मंत्री ही वर्तमान भाजपा सरकार की छवि को छेदक के रूप में मलिन कर सकता है। आश्चर्य यह कि इस सबके पीछे वही हस्तियां दिखाई दे रही हैं, जो पहले भी कांगड़ा की सियायत को कमजोर कर चुकी हैं। ऐसे में अब सरकार के अलावा पार्टी को भी फैसला लेना होगा कि जो घटनाक्रम एक मंत्री को बदनाम करने की लिए चला, उसके साजिशकर्ता के साथ क्या सलूक किया जाए। देखना यह भी होगा कि इस पड्यंत्र की जड़ें कहां तक बिछी हैं और बदनामी का मकसद कितना घिनौना हो सकता है। हमारा मानना है कि यह बिसात कहीं ज्यादा गंदी हो सकती है और अगर भाजपा का भीतरी युद्ध न रुका, तो कालिख पोतने के पात्र बढ़ जाएंगे। यह विडंबना है कि हिमाचली सोच की सियासत इतनी विकराल हो रही है तथा चरित्र हनन की शाखाएं खत्म नहीं हो रहीं। इससे पूर्व वीरभद्र सिंह बनाम विजय सिंह मनकोटिया के बीच चरित्रहनन की परिपाटी रही और इसी अंदाज में भाजपा सरकार के खिलाफ उसके ही कुछ मंत्री व विधायक रहे। ऐसे में चरित्रहनन के हथियार के रूप में सोशल मीडिया का उपयोग अगर चेतावनी दे रहा है, तो राजनीतिक चेहरों को भी अपने मुखौटे हटाने पड़ेंगे। स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ हुआ दुष्प्रचार कितना प्रभावी या प्रमाणित है, यह अलग तरह की जांच का विषय हो सकता है, लेकिन जिस तरह इसे अंजाम दिया उस पर प्रश्न खड़े हैं। सुखद पहलू यह कि राजनीति ने अपने पहलू में पहली बार सुराख देखा है। देखना अब यह होगा कि भाजपा अपने एक वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री के कृत्य पर कितना निर्णायक होती है। आम जनता के लिए यह काफी हद तक साफ हो जाना चाहिए कि हम जिस चरित्र को पूजकर नेताओं का कद ऊंचा करते हैं, वे वास्तव में कितने घृणित तथा निम्न सोच के व्यक्ति हो सकते हैं।

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