वल्ली को चाहने वालियों की लंबी कतार थी

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन : एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है इक्कतीसवीं किस्त…

-गतांक से आगे…

सत्रह सालाना वल्ली, अच्छी कद-काठी और सजीले नैन-नक्श वाला नौजवान था। उसके आकर्षण की वजह से, ताज्जुब की बात नहीं कि उसकी चाहने वालियों की लंबी कतार लग जाया करती थी। शाम को जब भी वह अपनी बहनों के साथ माल रोड की सैर पर जाता, तो खाने के खोमचे पर खड़ा हसीन लड़कियों का कोई न कोई झुंड उसे पहचान ही लेता था। वे हाथ हिलाते हुए चिल्लातीं, ‘हाय, वल्ली बेग।’ वह चतुराई से उन्हें हाथ हिला देता, इससे पहले कि उसकी बहनें उसके पीछे आएं। उसके जैसे आकर्षक भाई के लिए अपनी बहनों की निगहबानी बेहद उबाऊ काम था। मल्लिका के साथ तो कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी, जिसे पहले ही घर पहुंचने की जल्दी रहती थी कि कहीं नमाज का समय न निकल जाए। लेकिन शहनाज को संभाल पाना अच्छों-अच्छों के बस की बात नहीं थी, जो बस दुकानों और सामानों को देखकर मानो दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाती थीं, फिर वह चाहे जेवर की दुकान हों या स्टाइलिश सन ग्लास की, कपड़े हों या फिर लकदक जूतियां। अक्सर माल रोड ऐसी आवाजों से भर जाता, ‘शहनाज कहां है?’ ‘मैं यहां हूं, वल्ली,’ वह किसी कोने से जवाब देतीं और फिर से भीड़ में कहीं गुम हो जातीं। और फिर से आवाज आती : ‘और अब वह कहां गई?’ वल्ली और नूरां मौजी शहनाज को ढूंढते-ढूंढते थक कर चूर हो जाते। वापसी पर, परेशान नूरां सईदा बेगम के सामने शिकायतों की पोटली खोल डालती : ‘मुझे छोटी बेबी के साथ मत भेजिएगा, बेगम साहिबा। वे मेरे हाथों से निकलकर इन वादियों में कहीं गुम हो जाएंगी। वे मेरी एक नहीं सुनती हैं। मैं हजार बार मल्लिका बेबी के साथ जाने को तैयार हूं, लेकिन छोटी बेबी से पार पाना मेरे बस की बात नहीं।’ ‘वह तो मेरे भी काबू में नहीं है’, वल्ली भी मौका देखकर अपनी बात कह देता, वह भी सैर के वक्त निगहबानी के काम से छुटना चाहता था। जबकि उसकी दोस्त छुट्टियों का लुत्फ लेतीं, वह बस उन्हें हाथ हिलाने तक सीमित रह जाता। खुद को कुछ दिनों के लिए बादलों में पर्दापोश करने का मसूरी का अपना ही अंदाज था, और वह दिन कुछ ऐसा ही था, कोहरे की चादर में लिपटा हुआ। लड़कियों ने जोर दिया कि वे माउंटेन रोड पर सैर के लिए जाना चाहती थीं। ‘ठीक है’, सईदा बेगम ने हामी भरते हुए कहा। ‘लेकिन मैं भी तुम लोगों के साथ चलूंगी।’ कड़क साड़ी और चुस्त सैंडल पहनकर वह मल्लिका के साथ होटल से बाहर निकलीं, हमेशा की तरह शहनाज उनसे कुछ पीछे चल रही थीं। बेमन से ही सही, वल्ली की एक और शाम निगहबानी में जाया होने वाली थी।

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