विचारधारा की लड़ाई

Nov 19th, 2019 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

अपने घर के लॉन में पंडित जॉन अली को परेशान घूमते देख जब मुझ से न रहा गया तो मैं उनके सामने जाकर खड़ा हो गया। वह मुझे देखते ही बोले, ‘अच्छा हुआ तुम आ गए। मेरा दिमाग तो सोच-सोच कर भारी हो गया है और पांव घूम-घूम कर। सारी रात सो भी न सका। तुम आ गए हो तो बोल कर जी हल्का हो जाएगा।’ मैंने छूटते ही कहा, ‘पंडित जी, यह कलियुग है, सत्, द्वापर या त्रेता नहीं। इसमें बिना वैज्ञानिक कारण पांव भारी होना संभव नहीं।’ वह नाराज होते हुए बोले, ‘अमां यार! अब तुम भी फिरकी लोगे तो काहे के लंगोटिया रहे। मिडिल क्लास तो कछुए की पीठ हो गई है। चाहे गोली भी मार दो, कोई असर नहीं होता। सब मस्त हैं, अपनी-अपनी लादी ढोने में। मजाल है कोई चूं कर जाए। अमीर, अपनी अमीरी में मस्त है तो गरीब, अपनी गरीबी में पस्त। उधर, तमाम राजनीतिक दल अपनी-अपनी विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिंदगी के पचास गुजर गए, बोझ ढोते-ढोते, लेकिन आज तक न राजनीतिक दलों की विचारधारा समझ में आई और न ही अपनी लादी का पता चल पाया। बस, दोनों ढोए जा रहे हैं।’ मैं फिर हल्के मूड में बोला, ‘पंडितजी, जैसे हम ढो रहे हैं, वैसे ही राजनीतिक दल भी ढो रहे हैं, लेकिन भीतर क्या है, किसे पता?’पंडित तनिक गंभीर होकर बोले, ‘यार, जिंदगी के बोझ से दबा आम आदमी तो किसी तरह घसीटने में लगा रहता है, लेकिन राजनीतिक दल तो समाज और देश सेवा की कसम खाकर मैदान में कूदते हैं। अगर कोई विचार धारा होती तो देश को आजादी दिलाने का दम भरने वाले आज जीभ निकाले सड़कों पर क्यों पड़े होते? विचारधारा होती तो बापू गोली से क्यों मरते? मारने वाला उनसे सीधे न सवाल पूछता। बापू तो सर्वसुलभ थे। सबसे सीधे मुखातिब थे। एसपीजी या जैड प्लस से घिरे रहने वालों की तरह रेडियो, टीवी पर फेंकते तो नहीं थे। इसका तो यही मतलब हुआ न कि नजर केवल मलाई पर है।’ मैंने कहा, ‘कहते तो आप ठीक हैं। अगर लड़ाई विचारधारा की होती तो राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र में क्यों घमसान मचता?’पंडित बोले, ‘हां, अगर जन सेवा की बात होती तो आधे-आधे का सवाल कहां उठता? एक ओर, चुपड़ी रोटी की बात पर चुनाव से पहले एक हुए दो दल मुंह फुलाए उत्तर-दक्षिण हो गए हैं तो दूसरी ओर, भानुमति का कुनबा एक होने की कोशिश कर रहा है। बस, चुपड़ी घनी मिलनी चाहिए। अगर सचमुच देश सेवा का जज्बा होता तो अब तक तो सरकार बन चुकी होती। एक और राज्य में, सत्ता की ़खातिर दो ध्रुव एक हो गए। कल तक जो धुर विरोधी थे, जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में पिरे थे, वे आज सरकार में शामिल होकर, सत्ता के मोतीचूर में चूर हैं। बेचारे तो बस लोग हैं, जो हर चुनाव में भेड़ बनते आ रहे हैं। भाई, मुझे तो लगता है सबकी विचारधारा कुर्सी के चार पायों पर आकर खत्म हो जाती है। असली लड़ाई तो कुर्सी की है। जब विचार ही नहीं तो धारा कैसी? चुनावम् शरणम् गच्छामि सत्ताम् शरणम् गच्छामि कुर्सीम् शरणम् गच्छामि 

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