व्यंग्य-साहित्य: संदर्भ एवं चुनौतियां

Nov 3rd, 2019 12:06 am

अमरदेव आंगिरस

मो.-9418165573

आज साहित्य में व्यंग्य विधा को स्वतंत्र विधा मान लिया गया है। समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से तंज या व्यंग्य किया जाता है। साधारण तथा लघु कथा की तरह संक्षेप में घटनाओं पर व्यंग्य होता है, जो हास्य नहीं कभी-कभी आक्रोश भी पैदा करता है। विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल से ही साहित्य में व्यंग्य की उपस्थिति मिलती है। चार्वाक के ‘यावद जीवेत सुखं जीवेत’ के माध्यम से स्थापित मूल्यों के प्रति प्रतिक्रिया को इस दृष्टि से समझा जा सकता है। सर्वाधिक प्रामाणिक व्यंग्य की उपस्थिति कबीर साहिब के ‘पात्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार’ तथा ‘तां चढि़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा भया खुदाय’ आदि के रूप में देखी जा सकती है। हास्य और व्यंग्य में अंतर है। साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती। व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह चिर स्थायी प्रभाव डालता है। व्यंग्य श्रेष्ठ साहित्य की जान है या यूं कह सकते हैं कि जो भी कहानियां, उपन्यास, कविता आदि साहित्यिक स्तर पर श्रेष्ठ मानी गई हैं, उनमें व्यंग्य की रोचक तथा शालीन भाषा का प्रयोग है। व्यंग्य सहृदय के भीतर संवेदना, आक्रोश एवं संतुष्टि का संचार करता है। स्वतंत्रता पूर्व व्यंग्य लेखन की सुदीर्घ परंपरा की एक लंबी लेखक सूची है। भारतेंदु हरिशचंद्र, महावीर प्रसाद चतुर्वेदी, बालकृष्ण भट्ट तथा अन्य लेखकों ने एक बहुत बड़ा लेखक समूह संगठित किया था। इनमें बाबू बालमुकुंद गुप्त के धारावाहिक ‘शिव शंभु के चिट्ठे’ युगीन दिग्दर्शक हैं। वायसराय के स्वागत में उस समय उनका साहस दृष्टव्य है- ‘माई लार्ड, आपने इस देश में फिर पदार्पण किया, इससे यह भूमि कृतार्थ हुई। विद्वान, बुद्धिमान और विचारशील पुरुषों के चरण जिस भूमि पर पड़ते हैं, वह तीर्थ बन जाती है। आप में उक्त तीन गुणों के सिवा चौथा गुण राज शक्ति का है। अतः आपके श्रीचरण स्पर्श से भारत भूमि तीर्थ से भी कुछ बढ़कर बन गई। भगवान आपका मंगल करे और इस पतित देश के मंगल की इच्छा आपके हृदय में उत्पन्न करे। ऐसी एक भी सनद प्रजा-प्रतिनिधि शिव शंभु के पास नहीं है। तथापि वह इस देश की प्रजा का, यहां के चिथड़ा पोश कंगालों का प्रतिनिधि होने का दावा रखता है। गांव में उसका कोई झोंपड़ा नहीं, जंगल में खेत नहीं…. हे राज प्रतिनिधि, क्या उसकी दो-चार बातें सुनिएगा?’

व्यंग्य से रचना चिरस्थायी बनती है। आजादी के पश्चात सामाजिक सरोकारों से संबंधित अनेक श्रेष्ठ लेखकों के नाम हैं। इनमें हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य को एक नई धार दी और व्यंग्य के प्रति जो उपेक्षा भाव था, उसे साहित्य की श्रेष्ठ विधा के रूप में अपनी रचनाओं के द्वारा प्रमाणित किया। लेखकों की कई पीढि़यों ने लेखन में योगदान दिया है- परसाई, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर, प्रेम जन्मेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णुनागर, सूर्यकांत व्यास, आलोक पुराणिक आदि असंख्य लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य लेखन को नया स्वरूप दिया है। कविता के क्षेत्र में काका हाथरसी, बेढब बनारसी आदि की कविताएं हास्य-व्यंग्य की दृष्टि से लोगों का कंठहार बनीं। आधुनिक युग में व्यंग्य कविता की एक सशक्त धारा विद्यमान है, जो निराला से आरंभ होकर केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, धूमिल आदि से होती हुई आज तक पहुंची है। आज प्रत्येक प्रदेश में लेखकों के अपने-अपने समूह पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से  सक्रिय हैं। आज के व्यस्त और भागदौड़ के जीवन में लंबे लेख, कहानियां या उपन्यास पढ़ना पाठक पसंद नहीं करता। वह समाचार पत्र की भी हैडलाइन ही पढ़ता है। हास्य या हल्की-फुल्की रचना, लघुकथा या व्यंग्य लेख को पढ़ने को उत्सुक रहता है। मनोविनोद और समय गुजारने के लिए उसके पास मोबाइल, टीवी, इंटरनेट आदि सुविधाजनक साधन हैं। फिर भी व्यंग्य लेखों और कविता की महत्ता बनी हुई है। असंख्य पत्र-पत्रिकाओं को मैटीरियल की जरूरत होती है। अतः निरंतर कुछ न कुछ छपता रहता है। देश-प्रदेश में एक बहुत बड़ा वर्ग व्यंग्य लेखन से जुड़ा है। निकट भविष्य में व्यंग्य की धार और भी पैनी होती जाएगी। पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य सामग्री छपती है, किंतु स्वतंत्र व्यंग्य पुस्तकें कम ही छप पाती हैं। हिमाचल में व्यंग्य लेखकों की कमी नहीं है, लेकिन व्यंग्य पुस्तकों के लेखक उंगलियों पर गिनाए जा सकते हैं। वैसे अभी के कुछ बरसों में हिमाचल के वरिष्ठ व्यंग्यकार अशोक गौतम के दर्जनों व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। प्रायः प्रत्येक पत्र-पत्रिका में व्यंग्य सामग्री आज समय की आवश्यकता समझी जा रही है। व्यंग्य साहित्य के आगे सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि व्यंग्य के वर्ण्य-विषय नकारात्मक, दलीय और पत्रों की प्रतिबद्धता के कारण सामाजिक भेदभाव एवं विघटन को हवा दे रहे हैं। अंधविश्वासों, रूढि़यों, भ्रष्टाचार आदि पर व्यंग्य तो उचित है, किंतु किसी एक जाति, एक धर्म, राष्ट्रीय नायकों, त्योहारों आदि पर घृणापूर्ण व्यंग्य समाज में सौहार्द स्थापित नहीं कर सकता। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था युग धर्म के अनुसार होती है। मसलन हिंदू परपंराओं को सांप्रदायिक दिखाने की होड़ लगी है। जानबूझकर या अज्ञान से ऐसा दर्शाया जाता है जैसे ब्राह्मणों ने ही स्वेच्छा से राष्ट्रीय एकता का बंटाधार किया हो या मुगलों के केवल अकबर से औरंगजेब तक के सौ सालों में सारे देश को नई व्यवस्था दी हो अथवा मुगल सदैव हिंदुओं को सूली पर लटकाते रहे हों। सत्ताधारी सदैव बुद्धिजीवियों पर हावी रहे और स्वेच्छानुसार साहित्य को पुरस्कृत करते रहे। यही भी दुर्भाग्य है कि आज के दलितों को शूद्र माना जा रहा है। आधुनिक संदर्भों में इतिहास को तत्कालीन परिस्थितियों में स्वीकृति के रूप में देखने की आवश्यकता है। धार्मिक एवं जातिगत भावना से रचा साहित्य कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ हो सकता है, लेकिन एकांगी माना जाएगा। फिर भी श्रेष्ठ साहित्य लेखन में व्यंग्य शैली, व्यंग्य भाषा एवं हास्य की अनिवार्यता रहेगी, क्योंकि व्यंग्य विधा साहित्य का प्राण है।

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना-5

अतिथि संपादक :  अशोक गौतम

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावनाएं क्या हैं, इन्हीं प्रश्नों के जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचल में व्यंग्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस सीरीज की पांचवीं किस्त…

विमर्श के बिंदू

* व्यंग्यकार की चुनौतियां

* कटाक्ष की समझ

* व्यंग्य में फूहड़ता

* कटाक्ष और कामेडी में अंतर

* कविता में हास्य रस

* क्या हिमाचल में हास्य कटाक्ष की जगह है

* लोक साहित्य में हास्य-व्यंग्य

एडीशनल का दर्द

डा. ओमप्रकाश सारस्वत

मो.-8219672740

एक दिन यूं ही हवा में छक्के मार रहे थे, तभी एक मित्र ने संजीदा होते हुए बात सरकारी कारगुजारी की ओर मोड़ी। कहने लगा-सब निराशाजनक। दूसरा बोला-सब जस का तस। लोग सुनकर स्थिर रहे। मुझे लगा, आदमी तभी किसी काम को काम मानता है, जब उसका अपना काम बन रहा हो। तभी एक अन्य बोला-सरकार को तो सरकारी असफर/सेक्रेटरी आदि ही चलाते हैं। एक दूसरा जो अभी-अभी प्रशासन का अंग/अंश हुआ ही था, कहने लगा, प्रशासकों/सचिवों का काम सरकार को स्थायित्व और नैरंतर्य प्रदान करना है। लोग सुनकर मौन साध गए। बात को विवाद बनाना शायद उचित नहीं समझा गया। इसी मध्य एक सज्जन, जो अब तक चुप थे, बोले, मुख्यमंत्री निहायत शरीफ हैं। लोग उनकी सज्जनता का लाभ उठाकर गलत सूचनाओं द्वारा ऊंचे-ऊंचे पद झटक रहे हैं। अभी कुछ पदवीधारकों के कारण सरकार की खूब फजीहत भी हुई। तभी एक महोदय हस्तक्षेप करते हुए बोले-पर अब ऐसा नहीं है। मुख्यमंत्री ने आज ही अपने कार्यकाल की समीक्षा करते हुए मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव को बदल दिया। आजकल अतिरिक्त की खूब फसल छाई हुई है। जहां देखो अतिरिक्त ही अतिरिक्त। अतिरिक्त मुख्य सचिव, अतिरिक्त सचिव, अतिरिक्त न्यायाधीश, अतिरिक्त वकील, अतिरिक्त गवाह, अतिरिक्त केस, अतिरिक्त अदालत, अतिरिक्त प्रधान, अतिरिक्त चपरासी, अतिरिक्त प्रत्याशी। सड़कों पर अतिरिक्त गड्ढे और बसों में अतिरिक्त सवारियां। देश के हिसाब से जनता अतिरिक्त तो रातों के हिसाब से ख्वाब। चूंकि शब्दों में अर्थ विस्तार का अवकाश है, अतः उसने अतिरिक्त का अर्थ एडीशनल के अलावा फालतू भी मान लिया। एडीशनल माने फालतू यानी जरूरत से ज्यादा। भैया! जब हर चीज जरूरत से ज्यादा होगी तो उसका अपव्यय भी होगा। जैसे अतिरिक्त पद, मतलब पद का अपव्यय। ऐसे ही समय का अपव्यय, शक्ति का अपव्यय, धन का अपव्यय, कुर्सी का अपव्यय, नियम का अपव्यय। यह अपव्यय हमारे जीवन के हर क्षेत्र में घुस गया है। लग रहा है कि इस मूल्यवान जीवन का भी अधिकतर अपव्यय ही हो रहा है। नेता फालतू के मसलों में उलझ कर देश की बुद्धि और समय का अपव्यय कर रहा है। अफसर अतिरिक्त पदों पर अपनी क्षमता का नाश कर रहा है। कर्मचारी अतिरिक्त होकर जनशक्ति को बेकार कर रहा है और सामान्यजन वैसे ही फालतू हो गया है। यदि एडिशनल की यही रफ्तार रही तो हम एक दिन सारे ही अतिरिक्त हो जाएंगे। दफ्तर में ‘एडीशनल सर’ तो घर में ‘एडीशनल साहब’। प्रमोशन पर बधाई देने आई महिलाएं कहेंगी-भैन, तुम्हारे उनके एडीशनल होने की बधाई। घर में समय पर न लौटने पर बच्चों से मां कहेगी, तुम्हारे पापा दफ्तर में एडीशनल हो गए हैं। (अतः देर तक बैठते हैं।) आफिस के काम में हाथ बंटाने के लिए उन्हें एक एडीशनल मिल गई है। वैसे पुराने जमाने में राजा-महाराजा लोग, अतिरिक्त रानियां-महारानियां रखते थे। वे सबसे अतिरिक्त प्यार करते थे। कई राजाओं/अतिरिक्त राजाओं से अतिरिक्त ‘प्यार पाई हुई’ दासियां आज भी अतिरिक्त रोमांचित हो घूमती हैं। वे ‘ओल्ड दिनों’ को ‘गोल्ड’ की तरह अपने वक्षोजों पर सहेजे इतराती हैं। यह अतिरिक्त हमारे हर क्षेत्र पर हावी है। सरकार अतिरिक्त साधनों के चक्कर में घूमती है, तो धनवान अतिरिक्त धन के। समर्थ देश, अतिरिक्त हथियारबंद हो रहे हैं, तो असमर्थ अतिरिक्त खुशामदी। कहीं अतिरिक्त उदंडता है तो कहीं अतिरिक्त दीनता। सर्वत्र गुंडे, चोर, लुटेरे, बदमाश, शरीफ, सती-असती, बुद्धिजीवी, बुद्धिहीन, दीन, संपन्न, दाता-पाता, गुरु-चेला, साधु, ठग, संत-असंत, सब अपने-अपने विषयों में एडीशनल योग्यता जुटाने में व्यस्त हैं। खुदा खैर करे।

समाज में व्यंग्य

प्रभात कुमार

मो.-9816244402

वो जमाना गए एक अरसा हो गया जब समाज में व्यावहारिक  व्यंग्य के माध्यम से जनमानस में सुधार की नींव पड़ जाती थी।  कितनी बार तो किसी वरिष्ठजन की एक नजर ही व्यंग्य का रोल निभा देती थी। सीधे-सीधे व्यंग्य करते हुए भी समझा दो, तो भी बुरा नहीं माना जाता था। पूरे ताम-झाम के साथ आए विकास जी द्वारा रोपित किए गए भौतिक गुलाबों में खुशबू तो लुभावनी रही, लेकिन कांटे असली रहे। इन कांटों ने जिंदगी की खुशियों को जख्मी कर दिया। बाजार ने मरहम लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा मसालेदार हास्य पकाना शुरू कर दिया जो अब फूहड़ता की हदें लांघ चुका है। अब जैसा भी हास्य इंजेक्ट किया जा रहा है, हम उसे स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि विकल्प कम होने के कारण हमारी चयन शक्ति कमजोर पड़ गई है। दरअसल अब हमने ट्रेंड के साथ चलना कबूल लिया है। इसे ऐसे कहा जाता है, ‘यह पूरी तरह से कामेडी है, लेकिन बेहद गंभीर संदेश के साथ।’ क्या कामेडी और गंभीरता मिलकर एक जैसा संदेश दे सकते हैं। यह समझ से बाहर है कि इतने कठोर हो चुके जमाने में चहुं ओर विसंगतियों से घिरी जिंदगी में हम हंसते हुए किसी गंभीर समस्या या विषय पर बात करना चाहते हैं। व्यंग्य क्योंकि हास्य नहीं है और यह संजीदा संप्रेषण है, इसलिए कम सुहावना लगेगा ही। वस्तुतः हम स्थिति को टाल रहे होते हैं। हमारे समाज में तो दिल की बीमारी को भी संजीदगी से नहीं लिया जाता। ‘सब चलता है’ के मौसम में बहुत ज्यादा संजीदगी से कही बात को भी सरल संजीदगी से न लेने की परंपरा विकसित हो चुकी है। ऐसी स्थिति में व्यंग्य लेखकों की जिम्मेवारी बढ़ गई है। असुरक्षा की भावना समाज में गहरे पैठ कर गई है, इसलिए व्यंग्य करना तो खतरा बन चुका है। व्यंग्य लिखना और छपना और अधिक छपे हुए शब्द ने हमेशा प्रभाव पैदा किया है, लेकिन राजनीतिक, धार्मिक व्यवस्था को ऐसी शक्ल दे दी गई है कि प्रतिक्रिया, आक्रोश और विरोध अब ज्यादा सहमे हुए हैं, इसलिए चुप हैं। व्यंग्य की धार के सामने कोई आना नहीं चाहता। एक व्यंग्यात्मक कार्टून भी काफी होता है, असामाजिक तत्त्वों के दिमाग में उबाल लाने के लिए। निडर और डरने वाली प्रवृत्तियों वाले लेखक तो समाज में हमेशा रहते ही हैं। इधर प्रसिद्धि और धन अर्जन के लिए संजीदगी से काम करने वाले कलाकार लेखकों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में संजीदा व्यंग्य लेखन एक शांत अस्त्र की मानिंद हो गया है जिससे आप समाज की विसंगतियों का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। हां, लिखकर खुन्नस निकाल सकते हैं जिसे अपना बदला समझ सकते हैं। जैसे किसी मनपसंद खूबसूरत व्यक्तित्व से मुहब्बत का इजहार इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि इस संबंध में कई तरह के जोखिम हैं, लेकिन एक उम्दा, गहन  प्रेम कविता तो लिख कर संभाल ही सकते हैं। यह विकास जी की मेहरबानियों को पूरी तरह से ओढ़ लेने की निशानी है कि इनसान अधिक से अधिक व्यक्तिवादी होता जा रहा है। उसे लगता है वह जो कर रहा है, कह रहा है, ठीक है। ऐसे में समाज को ऊबड़-खाबड़ सड़क के कितने ही अंधे मोड़ों पर सावधान रहने की जरूरत है। बदलाव के लिए ऐसी व्यंग्य रचनाओं की बहुत जरूरत है जो पढ़ने वालों का अंतर्मन तक झकझोर दे। एहसास दिला दे कि अपनी खुशियों के साथ दूसरों का दर्द भी समझ लेने की जरूरत है। बचपन से ही बिगाड़े जा रहे जीवन में शुरू से ही अभिभावकों द्वारा खरा-खरा समझाने की जरूरत है। वह खरा-खरा व्यंग्य का ही एक रूप होना चाहिए। आपस में सिर्फ प्रशंसा कर लेना समझदारी की सही नींव नहीं होती। एक-दूसरे के स्वाभाविक व व्यावहारिक विरोधाभासों को हजम करने की जरूरत है। यह बदलाव लिखा, पढ़ा और व्यवहार में लाया जाने वाला व्यंग्य भी ला सकता है।

सार्थक व्यंग्य वही जो उठे हाथों हाथ

डा. राजेंद्र वर्मा

मो.-8219543486

जनमानस की अपेक्षाओं और प्राप्य तथा सपनों और उपलब्धियों के बीच का फासला अनेक विसंगतियों को जन्म देता है तथा वर्तमान में जब मानव की दृष्टि अपेक्षाकृत अधिक भौतिकवादी हो गई है तो आपाधापी के इस वातावरण में गलाकाट प्रतियोगिता और होड़ जीवन-मूल्यों में परिवर्तित हो गए हैं। अतः ये फासले अधिक विषम हो गए हैं। राजनीतिक चालबाजियों, प्रशासन की संवेदनहीन और लचर कार्यशैली, सामाजिक रीतियों और स्थितियों, धार्मिक मान्यताओं और ढकोसलों में भी विषमताएं और विसंगतियां प्रतिबिंबित होती हैं। ऐसी विषमताओं और विसंगतियों के चक्रवातों के बीच एक व्यंग्यकार अचल खड़ा रहता है और अपनी ओर से हवाओं को थामने अथवा उनका रुख मोड़ने का भरसक प्रयास करता है। अपने समय की मानवीय संवेदनाओं को साहित्य की सभी विधाएं अपने-अपने ढंग से अपने में किसी न किसी रूप में समाहित करती ही हैं। हमारा जीवन घटनाओं का समूह है, साहित्य इन्हीं घटनाओं को साहित्यिक विधाओं की शैली के अनुरूप अपने में दर्ज करता रहता है। अन्य साहित्यिक विधाओं की अपेक्षा व्यंग्य  समाज की तासीर को परखने में अधिक सजग रहा है। समसामयिक परिदृश्य पर व्यंग्यकार की नजर कदाचित सबसे तीखी रहती है। व्यंग्य विधा के माध्यम से एक संवेदनशील कलाकार राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं और विसंगतियों को प्रखरता पूर्वक उजागर करता है। अपने ऐसे प्रयास द्वारा वह व्यवस्था से जुड़े हर आमोखास को लगातार सचेत करता है कि कोई है जो उन्हें देख रहा है और इसलिए वे बेलगाम नहीं हो सकते। ये विसंगतियां, अव्यवस्था अथवा अराजकता सिस्टम में व्यक्तिगत और सामूहिक स्वार्थों द्वारा ही पोषित होती हैं। व्यंग्यकार सहज रूप में ही जीवन की उन विसंगतियों की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करता है जिन्हें हम सामान्यतः हल्के में लेते हैं। व्यंग्य के लिए समर्पित प्रतिष्ठित पत्रिका व्यंग्य यात्रा के जनवरी-मार्च 2016 के  अंक में डा. सुरेश गर्ग ने व्यंग्य विषयक कुछ सूत्र दिए हैं।

  1. व्यंग्य लेखन मात्र दूसरों पर कटाक्ष करना, चुटकी लेना, चोंटिया भरना, उंगली उठाना, मजाक बनाना, आनंद लेना, करुणा दर्शाना ही नहीं है, बल्कि स्वयं के अंदर व्याप्त विकृतियों, विद्रूपताओं, पाखंडों…अवगुणों का सार्वजनिक रूप से प्रकटीकरण करके अपने ‘अंदर’ को परिष्कृत करने की ‘साधना’ है।
  2. व्यंग्यकार जिन सामजिक, राजनीतिक एवं व्यवस्थाई विद्रूपता…आदि को इंगित करता है, उनको अपने जीवन से बाहर निकालने के बाद ही दूसरों से परिवर्तन की उम्मीद कर सकता है।
  3. व्यंग्यकार जो लिखता है, वो सब उसके अंदर मौजूद होता है, तभी उसका दिल-ओ-दिमाग उन गहराइयों तक पहुंच पाता है।

मध्य भारत से आने वाले सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शंकर पुणतांबेकर ने श्रेष्ठ व्यंग्य के तीन आवश्यक तत्त्व बताए हैं :

  1. विडंबना, विसंगति, विद्रूपता, 2. अभिव्यक्ति कौशल, 3. प्रहारात्मकता। उनके अनुसार यदि व्यंग्य तीखा नहीं है, विक्षोभ पैदा नहीं करता और विचारों को आंदोलित-उद्वेलित नहीं करता तो ऐसे व्यंग्य का कोई अर्थ नहीं। आज का व्यंग्य भी कहीं विरोधाभासी है तो कहीं विरोधी परिस्तिथियों को अपने में पूरी ईमानदारी में समेट रहा है। अपने अद्यतन व्यंग्य-संग्रह ‘हवा भरने का इल्म’ की भूमिका में अशोक गौतम लिखते हैं कि ‘अगर कोई व्यंग्य अपने पाठकों के बीच जाकर उसे उसके जीवन के रोधों-प्रतिरोधों, विरोधों, अंतर्विरोधों से कहीं न कहीं परिचित नहीं करवाता, उनके खिलाफ उन्हें खड़े होने का साहस नहीं बंधवाता, तो यह प्रश्न पूछा जाना वाजिब है कि वह किसके लिए लिखा जा रहा है? वह क्यों लिखा जा रहा है?’ हरीश नवल का यह कथन भी सही है कि, ‘अन्य विधाकार कहीं से भी अपने विषय उठा सकते हैं, किंतु व्यंग्यकार गंदगी के मुहाने पर खड़े होकर विषय चुनता है। उसका दायित्व गुरु गंभीर है, वह बुराई को जानने और उसे समाप्त किए जाने के विचार का प्रसारक होता है, व्यंग्यकार का मार्ग कंटकाकीर्ण है, व्यंग्यकार उसके पुष्पित होने की संभावनाएं खोजता है।’ किंतु व्यंग्य को कविता, कहानी, निबंध के समकक्ष विधा मानने को लेकर कई प्रश्न-चिह्न हैं। कई बार तो यह धारणा भी बनती देखी गई है कि यह एक नकारात्मक योजना है तथा व्यंग्य-लेखक को हीन-ग्रंथि का शिकार व्यक्ति तक ठहराया जाता है। किंतु सच्चाई यही है कि व्यंग्य किसी भी भाषा की जिंदादिली और जीवंतता का प्रतीक होता है। वास्तव में व्यंग्यकार अपनी साहित्यिक प्रतिभा और रचनात्मकता से जीवन को रचनात्मक और सुंदर बनाने का प्रयास करता है। सभी प्रकार की सामजिक-व्यवस्था और यथास्थितिवादी मूल्य-पद्धतियां तथा आत्मतुष्ट और आत्मनिष्ठ अथवा स्व-केंद्रित व्यक्ति उसका निशाना होते हैं। किंतु फिर भी क्या उसे कहानी, निबंध, कविता आदि की तरह एक अलग विधा माना जा सकता है? यह प्रश्न व्यंग्य पर बात करते हुए बार-बार जहन में आता है और आना भी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करते-करते हम उसकी व्यापकता, सहजता और प्रहारात्मकता को कम कर रहे हों? उससे उसकी जमीन और आकाश छीन रहे हों? तात्कालिक प्रभाव के वशीभूत हो वैचारिक उदात्तता, जिससे साहित्य कालजयी बनता है, वह संभावना समाप्त कर रहे हों? हिमप्रस्थ के मार्च, 2018 के हास्य-व्यंग्य विशेषांक में डा. ओम प्रकाश सारस्वत ने भी यह प्रश्न उठाया था। इससे पूर्व जनमेजय के हवाले से व्यंग्य-यात्रा त्रैमासिकी पत्रिका के जनवरी-मार्च 2016 के अंक में यह चिंता सामने आई थी कि, ‘हम व्यंग्यकारों ने एक कुएं का निर्माण कर लिया है और उसी में कूद-कूदकर एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे हैं। हमारे सामने कुएं का आकाश ही है। हम व्यंग्य को साहित्य के विस्तृत आकाश में नहीं देख रहे हैं। विषय सीमित हो गए हैं और हम आभासित गधों को पीट रहे हैं।’ तो इस विषय पर मंथन होना चाहिए और कदाचित व्यंग्य को समर्पित ‘दिव्य हिमाचल’ की इस पहल में इस पर सार्थक विमर्श हो पाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

शिमला डायरी : साहित्य व पत्रकारिता को समर्पित किताब

शिमला डायरी के नाम से एक किताब साहित्यिक बाजार में आई है, जो साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता को भी समर्पित है। इसके लेखक प्रमोद रंजन हैं। वह इस समय फारवर्ड प्रेस नई दिल्ली के प्रबंध संपादक हैं। प्रमोद रंजन ने हिंदी समाज के सांस्कृतिक और साहित्यिक विमर्श को नए आयाम दिए हैं। वह हिंदी समाज-साहित्य को देखने-समझने के परंपरागत नजरिए को चुनौती देने वाले लोगों में से एक हैं। रंजन ने अपनी वैचारिक-यात्रा पत्रकारिता से शुरू की, जिसका अहम पड़ाव शिमला था। शिमला व हिमाचल के अन्य हिस्सों में वह कुछ समय तक रहे, इसीलिए यहां से जुड़ी अपनी यादों को उन्होंने इस किताब में शृंखलाबद्ध किया है। वर्ष 2002 से 2005 तक शिमला व कांगड़ा में रहकर उन्होंने विभिन्न समाचार-पत्रों में काम किया। रंजन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से एम फिल व पीएचडी की है। आलोच्य पुस्तक में जहां आलोचनाएं हैं, वहीं कहानियां व कविताएं भी हैं। इसके अलावा इसमें समाचार-पत्रों के लिए लिखी गई टिप्पणियां भी शामिल की गई हैं। भूमिका में साहित्य और पत्रकारिता का आरंभिक पड़ाव दर्शाया गया है। खंड एक में डायरी है जिसमें कहा गया है कि लेखक सपनों की तलाश में पहाड़ों की ओर गया था। खंड दो और तीन में आलोचनाएं, कविताएं व कहानियां दी गई हैं। खंड चार में समाचार पत्रों के लिए लिखी गई टिप्पणियां हैं, तो खंड पांच में किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्र का मौखिक इतिहास समेटा गया है। आशा है 216 पन्नों की यह किताब पाठकों को जरूर पसंद आएगी।

 पुस्तक समीक्षा

* पुस्तक का नाम : शिमला डायरी

* लेखक का नाम : प्रमोद रंजन

* प्रकाशक : दि मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, दिल्ली

* मूल्य : 350 रुपए 

-फीचर डेस्क

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