शिवसेना की सौदेबाजी

बहुमत का स्पष्ट जनादेश मिलने के नौ दिन बाद भी गतिरोध जारी है। महाराष्ट्र में सरकार बनने के समीकरण सुलझ नहीं पाए हैं। हालांकि भाजपा-शिवसेना गठबंधन को कुल 161 सीटों पर जीत  हासिल हुई है। इसमें 105 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है और शिवसेना के  56 विधायक हैं। भाजपा से लगभग आधी…इसके बावजूद शिवसेना को मुख्यमंत्री पद चाहिए। पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस पद को अधिकार ही नहीं, पार्टी की जिद भी करार दिया है। स्थितियां ऐसी बनी हैं कि गठबंधन के दोनों पक्षों के बीच असंवाद पसरा है। शिवसेना किस 50-50 फार्मूले की बात कर रही है? यानी 2.5 साल मुख्यमंत्री भाजपा का और शेष अवधि में मुख्यमंत्री शिवसेना का! लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बीच, सत्ता हासिल होने की स्थिति में, पदों और जिम्मेदारियों को आनुपातिक तौर पर बांटने की बात तय हुई थी। गठबंधन के शुरुआती दिनों में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे और भाजपा नेता प्रमोद महाजन ने आपस में तय किया था कि ज्यादा सीटें जीतने वाले दल का मुख्यमंत्री और छोटे दल का उपमुख्यमंत्री होगा। जब 1995 में जनादेश मिला, तो शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने। उस दौर में शिवसेना बड़े भाई के रूप में थी और भाजपा छोटा भाई होती थी। आज किरदार बिलकुल उलट गए हैं। वह कुंठा और बौखलाहट शिवसेना में हो सकती है, लिहाजा वह मुख्यमंत्री पद पर अड़ी है। हैरत तो यह है कि शिवसेना अपने ही संस्थापक नेता का फार्मूला मानने को तैयार नहीं है। वह गठबंधन धर्म भी भूल चुकी है और सौदेबाजी पर उतर आई है। हालांकि अब वह गठबंधन धर्म निभाने का दावा कर रही है। पार्टी के बड़े नेता संजय राउत ने ही एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से मुलाकात नहीं की है, बल्कि उद्धव ठाकरे ने भी फोन पर पवार से बात की है। एनसीपी-कांग्रेस की वैकल्पिक घुड़की बार-बार दिखाना ही शिवसेना की सौदेबाजी और दबाव की राजनीति है, जबकि पवार एक इंटरव्यू में साफ  कह चुके हैं कि शिवसेना के साथ सरकार बनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। एनसीपी और कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है, लिहाजा वह यही धर्म निभाएंगे। अब वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करने सोमवार को दिल्ली भी आ रहे हैं। दरअसल शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन में रहना चाहती है, क्योंकि यह उसकी वैचारिक और चुनावी मजबूरी है। यदि वह एनसीपी-कांग्रेस के साथ वाकई सरकार बनाने की इच्छुक है, तो पहले शिवसेना को गठबंधन तोड़ कर बाहर आना पड़ेगा। फिर पवार और कांग्रेस से समर्थन की गुहार लगानी पड़ेगी। क्या शिवसेना भाजपा से अलग होने का राजनीतिक जोखिम उठा सकती है? पवार सियासत के ऐसे कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं कि शिवसेना की सत्ता के लिए अपनी पार्टी को ‘बलि का बकरा’ बना दें। दरअसल शिवसेना का चरित्र ही ऐसा है। 2014 में दोनों दलों ने विधानसभा का अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा को सर्वाधिक 122 सीटें मिली थीं। तब भाजपा और पवार के रिश्ते बेहतर और सकारात्मक थे। दोनों की साझा सरकार भी बन सकती थी। शिवसेना लगातार नौ दिन तक सौदेबाजी करती रही थी। अंततः उसे भाजपा की ही शर्तों पर सरकार में शामिल होना पड़ा। पांच साल तक उपमुख्यमंत्री का पद भी नसीब नहीं हुआ। हमारा मानना है कि इस बार भी शिवसेना अपने घोड़े बेचकर भाजपा की ओर ही लौटेगी, लेकिन यह आठ नवंबर से पहले होना चाहिए, क्योंकि वह सरकार और विधानसभा के कार्यकाल का आखिरी दिन है। उसके बाद राष्ट्रपति शासन लगाया जाना संवैधानिक मजबूरी है। हास्यास्पद है कि शिवसेना इस सचाई को भी जनादेश का अपमान करार दे रही है। दरअसल शिवसेना को ही गठबंधन की गरिमा निभाना नहीं आता। उसके मुखपत्र ‘सामना’ में इसकी बदतमीजी और बेलगाम चरित्र सामने आते रहे हैं। लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन घोषित होने से पूर्व ‘सामना’ ने प्रधानमंत्री मोदी को राफेल विमान सौदे के संदर्भ में ‘चोर’ तक लिख दिया था। ऐसी निरंकुशता के लंबे सिलसिले हैं, लेकिन भाजपा गठबंधन को बरकरार रखने के लिए शिवसेना की बदतमीजियां झेलती आई है और उसे अपने साथ चिपटाती रही है। शिवसेना को याद रखना चाहिए कि करीब 35,000 करोड़ रुपए के बजट वाली बीएमसी में शिवसेना की सत्ता भाजपा के समर्थन पर ही टिकी है। दरअसल इस बार शिवसेना की राजनीतिक सौदेबाजी तमाम हदें लांघ रही है। क्या इसे ही गठबंधन कहते हैं?

 

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