श्री गोरख महापुराण

Nov 23rd, 2019 12:20 am

गतांक से आगे…

जब बहुत खोजने पर भी उन्हें अपने गुरु नहीं मिले, तो उन्होंने सोचा कि न जाने गुरुदेव कहां रम गए हैं। गोरखनाथ घूमते-घूमते राजा गोपीचंद की राजधानी हैलापट्टन में जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि यहां के राजा ने एक महान योगी जालंधरनाथ को कैद में डाल रखा है और उनकी बहुत दुर्गति कर रखी है। गोरखनाथ राजा की माता मैनावती से भी मिले। जो साधू-संतों की सेविका थी। गोरखनाथ के ज्ञान बल पर मैनावती मोहित हो गई और उनकी विद्या देखकर उनकी शिष्या बन गई। जब जालंधरनाथ को मुक्त कराने की बात चली, तो वह बोली कि मुझे कुछ पता नहीं है। मैं तो अपने बेटे को अमरत्व दिलाने की चिंता में हूं।

गोरखनाथ अपनी प्रथम शिष्या के विचार सुन बहुत प्रसन्न हुए और रानी को आशीर्वाद दे तीर्थ यात्रा पर चल पड़े। जब वह एक नगरी के बागीचे से होकर गुजरे, तो वहां उन्होंने राजकुमार के समान संुदर एक युवक नाथ पंथी योगी को देखा। जिसके कान में स्वर्ण मुद्रा थी। वह रेशमी कुर्ता पहने बड़े ठाट-बाट से बागीचे में विराजमान था। गोरखनाथ के आदेश शब्द उच्चारण करते ही उसने भी उठकर आदेश कहा, नाथ पंथ में आदेश शब्द कहने की प्रथा है। कणीफानाथ ने उठकर गोरखनाथ का स्वागत किया और उन्हें पलंग पर ही अपने पास बिठाकर पूछा,भाई आपका परिचय क्या है? गोरखनाथ बोले कि मैं मछेंद्रनाथ का शिष्य हूं और मेरा नाम गोरखनाथ है। यह सुनकर कणीफानाथ प्रसन्न होकर बोले, भाई इस बागीचे में आम बहुत मीठे हैं यदि आपकी खाने की इच्छा हो तो मंगवाऊं। गोरखनाथ बोले कि क्यों व्यर्थ में परेशान होते हो।

मुझे ज्यादा भूख नहीं है। कणीफानाथ बोले, परेशान होने की बात आपने खूब कही। मैं अभी शिष्यों को भेजकर आम तुड़वाकर मंगवाए देता हूं। गोरखनाथ बोले मामूली बात के लिए उन्हें कष्ट क्यों दिया जाए। इस पर कणीफानाथ बोले, चलो जाने दो। मैं विद्या से यहीं बैठे-बैठे आम मंगवाए देता हूं। अपनी विद्या का चमत्कार दिखाने के लिए विभाक्तास्त्र के मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित भस्म को आम के वृक्षों की तरफ फेंका जिससे पके हुए आम टूटकर धरती पर गिर गए। उसके पश्चात अभिमंत्रित भस्म फेंकने पर वह गिरे हुए आम खिंचकर वहीं आ गए जहां कणीफानाथ और गोरखनाथ विराजमान थे। दोनों संतों ने भरपेट आम खाए फिर भी आम बच गए। तब गोरखनाथ बोले, भाई इन बचे हुए फलों को बासी करने से क्या फायदा? इन्हें इनकी जगह पर वापस भेज दो ताकि फल ताजे ही बने रहें। बासी फल खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। गोरखनाथ की बातें सुनकर कणीफानाथ बोले, भाई क्यों अनहोनी बात करते हो? टूटे हुए फल भी कभी वापस वृक्ष पर लग सकते हैं।

तब गोरखनाथ बोले कि जिस प्रकार टूटने से पहले लगे हुए थे। कणीफानाथ बोले आप अपूर्ण गुरु के शिष्य हो। परिपूर्ण किस प्रकार हो सकते हो। अधिक ढिठाई ठीक नहीं। गोरखनाथ ने कहा, मेरे गुरुदेव ने मुझे इतना सामर्थ्यवान बना दिया है कि मैं कहीं हार खाने वाला नहीं। कणीफानाथ व्यंगपूर्वक बोले, आपके गुरु वही हंै न जो त्रिया राज्य में भोग विलास में लिप्त हैं। उनकी परिपूर्णता की बात किस से छिपी है। अपने गुरु की बुराई सुनकर गोरखनाथ ने गुस्से में भरकर कहा, अपने गुरु की दुर्दशा का भी कुछ पता है? वे बेचारे गोपीचंद राजा के यहां गड्ढे में पाट दिए गए हैं। यदि तुम कुछ चमत्कार जानते होते तो क्या अपने गुरु को बाहर नहीं निकाल सकते थे? तुम्हें विश्वास न हो तो हैलापट्टन जाकर अपनी आंखों से अपने गुरु की दुर्दशा देखो। ईंट का जवाब पत्थर की तरह मिलने पर कणीफानाथ काफी लज्जित हो गए और उनसे कोई उत्तर देते नहीं बना। तब गोरखनाथ बोले, मेरे गुरु की विद्या का चमत्कार देखना चाहते हो, तो लो देखो अभी ये टूटे हुए आम वृक्षों पर लटकते दिखाई देंगे।                   – क्रमशः

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