सांसों का आपातकाल

दिल्ली और आसपास प्रदूषण इतने जानलेवा स्तर तक पहुंच गया है कि इसे ‘सांसों का आपातकाल’ करार दिया जा रहा है। वैसे भी सरकार ने प्रदूषण का आपातकाल घोषित किया है। स्कूल बंद करा दिए गए हैं और कई गतिविधियों पर पाबंदी चस्पां की गई है। उसके बावजूद हवा इतनी जहरीली हो गई है कि प्रदूषण अपने औसत स्तर से 10-15 गुना ज्यादा तक बढ़ गया है। यदि जानलेवा से भी अधिक गंभीर कोई शब्द है, तो उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। कभी सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने दिल्ली के लिए ‘गैस चैंबर’ की उपमा दी थी। आज वह भी कम भयावह लगता है, क्योंकि लगभग पूरी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद आदि शहरों में प्रदूषण का स्तर 1200-1600 तक पहुंच गया था। वायु की गुणवत्ता का मानक स्तर 100-150 तक ही ठीक माना जाता रहा है। यह संपादकीय लिखते हुए भी वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 के करीब था, जो खतरनाक स्तर है। हालात ये हैं कि औसत आदमी 20 सिगरेट के बराबर का धुआं निगलने को विवश है। यदि 24 घंटे ऐसे ही प्रदूषित इलाके में रहना पड़े, तो 26 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान होगा। सोचा जा सकता है कि ऐसे पर्यावरण में फेफड़े, दिल, लिवर का स्वास्थ्य कैसा रहेगा? कैंसर, अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। आम आदमी की जिंदगी औसतन 10 साल कम हो रही है। क्या ऐसे जानलेवा प्रदूषण के लिए पंजाब और हरियाणा में जलाई जा रही पराली ही एकमात्र जिम्मेदार है? क्या बीते कुछ सालों में ही पराली का प्रदूषण इतना विषाक्त साबित हुआ है? धिक्कार है कि राजनीति ने प्रदूषण को भी मुद्दा बना दिया है और बुनियादी कारकों को खत्म या कम करने की सकारात्मक कोशिशें नहीं की जा रही हैं। क्या कारण है कि अक्तूबर मध्य तक दिल्ली की हवा खराब या जानलेवा नहीं थी और अब नवंबर के शुरू होते ही इतनी घातक हो गई है कि डाक्टर लोगों को दिल्ली के बाहर ही रहने की सलाह दे रहे हैं। शिकागो यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने प्रदूषण पर शोध किया है, जिनका निष्कर्ष है कि बीते 18 सालों के दौरान दिल्ली का प्रदूषण 72 गुना बढ़ा है। खौफनाक…आखिर दिल्ली में आदमी जिंदा कैसे है? बेशक पंजाब और हरियाणा में नई फसल के लिए खेत को नया करने के मद्देनजर किसान फसल के अवशेषों को जलाते हैं। उसे ही पराली कहते हैं। रबी की फसल से पहले जो पराली जलाई जाती है, उसका प्रदूषण इतना खतरनाक नहीं होता, लेकिन सर्दी के मौसम में खरीफ की फसल से पहले पराली जलाने पर प्रदूषण जानलेवा साबित होता है। क्या सरकारें इसका समाधान नहीं ढूंढ सकतीं? पराली के अलावा वाहन, कोयला आधारित बिजली प्लांट, अन्य उद्योग, निर्माण कार्यों से उड़ते धूल कणों आदि से जो प्रदूषण पैदा होता है, उसका नियंत्रण कैसे होगा? पांच लाख छोटे-बौने पौधे या पेड़ लगाने से प्रदूषण नियंत्रित होते हैं क्या? निष्कर्ष यह भी सामने आया है कि दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में छठे स्थान पर है। क्या भारत की खूबसूरत राजधानी को मनुष्य के आवास योग्य न माना जाए? दिल्ली और आसपास के आकाश पर काली धुंध की चादर छाई है। नागरिक मास्क लगाकर घूमते ऐसे लगते हैं मानों किसी और लोक के प्राणी हैं! डाक्टर मास्क को भी उपयोगी नहीं मान रहे हैं। ऐसे हालात में करीब 40 फीसदी दिल्ली वासी यह शहर छोड़कर कहीं और बसने की बात करने लगे हैं। यह एक हालिया सर्वे का निष्कर्ष है। दिल्ली वाले आसमान की ओर भी टुकुर-टुकुर देख रहे हैं कि कब बारिश हो और उससे प्रदूषण के कण दब सकें। सरकारें कृत्रिम बरसात भी करवा सकती थीं, लेकिन किसान, पराली और उन्हें दी जाने वाली कटाई की मशीनों तक ही आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। इस बीच दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सम-विषम योजना को फिर शुरू किया है। दो बार पहले भी यह प्रयोग किया जा चुका है, लेकिन स्थिति यह है कि दिल्ली को स्थायी समाधान चाहिए।

 

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