सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट

Nov 16th, 2019 12:06 am

राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्त्वपूर्ण फैसले आए हैं। न्यायिक पीठ ने सभी पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दी हैं और फैसला सुनाया है कि राफेल पर जांच और एफआईआर की जरूरत नहीं है। हालांकि भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17ए के तहत सीबीआई चाहे, तो प्राथमिकी दर्ज कर सकती है, लेकिन उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी। बहरहाल सुप्रीम अदालत का निर्णय है कि राफेल सौदा रद्द करने की भी जरूरत नहीं है। याचिकाओं में दर्ज दलीलों में कोई दम नहीं है। दूसरे फैसले में शीर्ष अदालत ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का माफीनामा मंजूर किया है, लेकिन आगाह किया है कि राजनीतिक बयानबाजी में अदालतों को न घसीटें। भविष्य में भी सावधान रहें कि अदालत की आड़ में कोई बयान न दें। ध्यान रहे कि राहुल गांधी ने बयान दिया था कि सर्वोच्च अदालत ने भी स्पष्ट कर दिया है कि राफेल सौदे में ‘चौकीदार’ चोर है। यह गलतबयानी थी, लिहाजा राहुल के खिलाफ  अवमानना का केस दर्ज किया गया था। उन्हें बीती 8 मई, 2019 को बिना शर्त तीन पन्नों का माफीनामा सुप्रीम कोर्ट में देना पड़ा था। अदालत ने माफीनामा तो मंजूर कर लिया, लेकिन राफेल सौदे पर मुंह की खानी पड़ी। राहुल गांधी ने पूरे लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ‘चौकीदार’ चोर है’ नारे का इस्तेमाल किया, रैलियों में अपने कार्यकर्ताओं से इसे दोहराने को कहा, लेकिन जनादेश सिर्फ  52 सांसदों  तक ही सिमट कर रह गया। वह खुद अमेठी सीट से चुनाव हार गए। ‘चौकीदार’ के मायने प्रधानमंत्री मोदी से थे, लिहाजा ऐसे दुष्प्रचार के जरिए उन्होंने देश की गरिमा को ही तार-तार किया था। राहुल के अवचेतन में राफेल को नया ‘बोफोर्स’ बनाने की इच्छा थी, ताकि चुनावी फायदा हो सके। सर्वोच्च न्यायालय ने 14 दिसंबर, 2018 को भी राफेल की खरीद प्रक्रिया, कीमत आदि पहलुओं के मद्देनजर मोदी सरकार को क्लीनचिट दी थी, लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्रियों यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण तथा ‘आप’ के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने पुनर्विचार याचिकाएं दी थीं। अदालत ने उन्हीं पर यह फैसला सुनाकर एक बार फिर स्पष्ट किया है कि राफेल विमान सौदे में कुछ भी गड़बड़ी नहीं है। इस फैसले के बावजूद कांग्रेस और राहुल गांधी ने नए सिरे से जांच और साझा संसदीय समिति के गठन की मांग की है। हालांकि संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने जेपीसी की जरूरत और मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। गौरतलब यह है कि चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने गंभीर आरोप लगाए थे कि अनिल अंबानी प्रधानमंत्री के दोस्त हैं, लिहाजा इस सौदे में 30,000 करोड़ रुपए उनकी जेब में डाल दिए गए हैं। सुप्रीम अदालत ने ‘आफसेट पार्टनर’ के इस बिंदु को भी खारिज किया है। सिर्फ  यही नहीं, राहुल गांधी कहा करते थे कि खुद फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें कान में बताया था कि अंबानी की कंपनी को पार्टनर बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने आग्रह किया था। दरअसल इन गंभीर और हास्यास्पद आरोपों के लिए राहुल गांधी के खिलाफ  नया केस चलना चाहिए अथवा उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए, लेकिन आश्चर्य तो यह है कि शीर्ष अदालत के अंतिम फैसले के बावजूद कांग्रेस के अनामी प्रवक्ता टीवी चैनलों की बहस में या ब्रीफिंग के दौरान जांच की मांग को लेकर उछल रहे हैं। कइयों के आरोप हैं कि यह 85,000 करोड़ रुपए का घोटाला है, जबकि सौदा ही करीब 58,000 करोड़ रुपए का है। कांग्रेस अब भी राफेल डील में अपना चुनावी भविष्य आंक रही है। वह अदालती फैसले में अपनी जीत मान रही है। इस व्याख्या का कानूनी आधार क्या है? बहरहाल अब तो सर्वोच्च अदालत से भी राफेल सौदे को हरी झंडी मिल गई है। राफेल विमान भारत में आने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। यह भी साबित हो चुका है कि देश का ‘चौकीदार’ चोर नहीं है। फिर भी कांग्रेस को आपराधिक जांच की दरकार है, तो अदालत का दरवाजा खटखटाए। साफ हो जाएगा कि अदालत उसे सुनती है अथवा नहीं…।

 

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