हिमाचली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उठी आवाज

 आयोजन

‘बोलियां हमारी धरोहर हैं, हमारी संपत्ति हैं और इनका संरक्षण करके आप साहित्यकार बंधु बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। किसी व्यक्ति व सभ्यता का मूल्यांकन करना हो तो वह हम बिना भाषा ज्ञान के प्राप्त नहीं कर सकते। अतः भाषा का संरक्षण करना बहुत जरूरी है।’ यह बात बिलासपुर सदर के विधायक सुभाष ठाकुर ने भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय पहाड़ी भाषा दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधन करते हुए कही। उन्होंने इस आयोजन को बिलासपुर में आयोजित किए जाने पर आयोजकों का हार्दिक आभार भी व्यक्त किया और कहा कि वे पहाड़ी हिमाचली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने के संबंध में मुख्यमंत्री महोदय से भी बात करेंगे। इससे पूर्व भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश के सहायक निदेशक त्रिलोक सूर्यवंशी ने उपस्थित सभी साहित्यकारों एवं मुख्य अतिथि का समारोह में उपस्थित होने पर आभार व्यक्त किया और पहाड़ी हिमाचली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए विशेष प्रयत्न करने का आग्रह किया। इस अवसर पर आयोजित समारोह के प्रथम सत्र में डा. गौतम शर्मा व्यथित ने कांगड़ा जनपदीय क्षेत्र की पहाड़ी कविता के परिदृश्य पर सारगर्भित शोध पत्र पहाड़ी हिमाचली भाषा में प्रस्तुत किया और बताया कि कांगड़ा के अधिकतर कवियों ने पहाड़ी हिमाचली कविता को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दिशा में उन्होंने पहाड़ी हिमाचली भाषा के उत्थान में डा. पीयूष गुलेरी  के महत्त्वपूर्ण योगदान की चर्चा की और डा. प्रेम भारद्वाज द्वारा संपादित सीरां (पहाड़ी काव्य संग्रह प्रकाशन) को भी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताया। इसके साथ-साथ इस सत्र में हिमाचल प्रदेश के सुपरिचित लेखक सुदर्शन वशिष्ठ ने भी पहाड़ी हिमाचली भाषा के संबंध में एक शोध पत्र प्रस्तुत किया और पहाड़ी हिमाचली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उसकी पैरवी की। प्रस्तुत शोध पत्रों पर डा. प्रत्यूष गुलेरी, अमरदेव आंगिरस और विद्यानंद सरैक ने भी अपने बहुमूल्य सुझाव और विचार प्रकट किए। इस सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रभात शर्मा ने उपस्थित सभी पहाड़ी हिमाचली रचनाकारों से पहाड़ी भाषा में बोलने व लिखने की अपील की और नई पीढ़ी को भी हिमाचली पहाड़ी भाषा की प्रगति हेतु आगे आने का आह्वान किया। दूसरे सत्र में पहाड़ी हिमाचली कवि सम्मेलन में बिलासपुर जिला के उपायुक्त राजेश्वर गोयल मुख्य अतिथि के रूप में शरीक हुए।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भाषा का विकास एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है और पहाड़ी भाषा का प्रचार करने हेतु बहुमुखी प्रयत्न करने होंगे तथा नई पौध को भी इसके लिए तैयार करना पड़ेगा। इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में सर्वप्रथम रमेश चंद मस्ताना ने अपनी पहाड़ी हिमाचली कविता प्रस्तुत की। उसके उपरांत सत्या शर्मा, जय देव विद्रोही, चंचल सरोलवी, रूपेश्वरी शर्मा, सुखदेव शास्त्री, हेमा ठाकुर, अशोक दर्द, प्रकाश चंद धीमान, सुरेंद्र मिन्हास, हेमंत अत्री, राजीव शर्मन, नवीन हलदूणवी, अरुण डोगरा, मुनीष  शर्मा, राजपाल डोगरा, रविंद्र कुमार शर्मा, डा. सूरत ठाकुर,  रिखी राम भारद्वाज, किरण गुलेरिया, हरिप्रिया, बलवंत, प्रतिभा शर्मा, डा. प्रशांत आचार्य, पंकज सहगल, सुशील पुंडीर, प्रभात शर्मा, डा. गौतम व्यथित, मदन हिमाचली और  प्रत्यूष गुलेरी आदि कवियों ने अपनी एक से बढ़कर एक पहाड़ी कविताएं प्रस्तुत करके वाहवाही लूटी।

अध्यक्षीय संबोधन करते हुए डा. प्रत्यूष गुलेरी ने कहा कि पहाड़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का यह बहुत अच्छा समय है और इस दिशा में वर्तमान हिमाचल सरकार को तुरंत आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए व हिमाचली पहाड़ी भाषा के साहित्यकारों को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए। इस अवसर पर बिलासपुर जिला की भाषा अधिकारी नीलम चंदेल व लेखक रत्न चंद निर्झर भी उपस्थित रहे। अनुसंधान अधिकारी कुसुम संघायिक तथा सहायक निदेशक त्रिलोक सूर्यवंशी ने क्रमशः दोनों सत्रों का बखूबी मंच संचालन किया।

-प्रकाश चंद धीमान, बल्ह, मंडी

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