अन्‍नादाता से सच्चा नाता

गांवों में बसे हिमाचल की सुबह कभी बैलों के गले में खनकती घंटिंयों से होती थी, लेकिन आज प्रदेश का स्मार्ट किसान पूरे देश को आय दोगुनी करने का मंत्र देने की कुव्वत रखता है। इस कामयाबी का सबसे बड़ा कारण कृषि विश्वविद्यालय के वे शोध हैं, जिनसे आज हिमाचली किसान अन्य प्रदेशों से दो कदम आगे हैं। बात पारंपरिक फसलों की हो या फिर कैश क्रॉप की, किसानों की हर डिमांड पर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से तुरंत एक्शन होता है। पहली नवंबर, 1978 को पहचान में आए कृषि विश्वविद्यालय की हमारे संवाददाता जयदीप रिहान के साथ इस शानदार सफर की कहानी…

पहली नवंबर, 1978 से पहचान में आए चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर 41 वर्षों से कृषि शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार शिक्षा में उत्कृष्ट योगदान दे रहा है। इस अवधि में प्रदेश ने कृषि, पशुपालन, फल एवं सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। कृषि विश्वविद्यालय शिक्षा तथा अनुसंधान के अतिरिक्त प्रदेश के किसानों व कृषि अधिकारियों के लिए विभिन्न प्रसार गतिविधियों का आयोजन भी करता है तथा इस उद्देश्य के लिए प्रसार शिक्षा निदेशालय मुख्यालय तथा प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर स्थित कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से प्रसार कार्यक्रमों का आयोजन करता है। इन कार्यक्रमों द्वारा नवीनतम कृषि तकनीकों पर प्रशिक्षण, परीक्षण व अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों का आयोजन करता है, जिससे तकनीकी जानकारियां किसानों तक शीघ्र हस्तांतरित होती हैं। विश्वविद्यालय ने प्रदेश के कृषि परिदृश्य को बदलने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसके फलस्वरूप प्रदेश में फसल विविधिकरण हुआ तथा कृषकों की आय में समुचित वृद्धि के साथ-साथ उनका सामाजिक आर्थिक उत्थान भी हुआ है।

अब तक 7000 छात्र कमा चुके नाम

कृषि एवं संबंधित विषयों जैसे पशुचिकित्सा विज्ञान, गृह विज्ञान इत्यादि में भी विश्वविद्यालय का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। विश्वविद्यालय में चार घटक महाविद्यालय हैं, जिनमें स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा छात्रों को प्रदान की जाती है। अब तक कृषि विश्वविद्यालय से लगभग 7000 छात्र शिक्षा ग्रहण कर कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, उद्यान विभाग, बैंकों, विश्वविद्यालयों व अनुसंधान संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं। प्रदेश के कृषि व पशुपालन विभाग में विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण छात्र प्रदेश व केंद्र सरकार के प्रसार कार्यक्रमों को किसानों तक पहुंचाकर कृषि अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि हिमाचल प्रदेश को तीन साल से लगातार केंद्र सरकार द्वारा स्थापित ‘कृषि कर्मण्य पुरस्कार’ मिल रहा है।

वैज्ञानिकों ने तैयार की फसलों की 170 से ज्यादा किस्में

विश्वविद्यालय ने अनुसंधान के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी है तथा अब तक विभिन्न फसलों की लगभग 170 किस्मों का विकास वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसके अतिरिक्त लगभग सौ कृषि प्रौद्योगिकियां भी विकसित कर किसानों के लिए अनुमोदित की गई हैं। पिछले एक दशक से कृषि विश्वविद्यालय ने जैविक खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय अनुसंधान कार्य किया है और अब विश्वविद्यालय में ‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती’ के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण पहल की है। कृषि आय को वर्ष 2022 तक दोगुना करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय ने 20 कृषि आधारित मॉडल विकसित किए हैं, जिन्हें कृषि एवं पशुपालन विभाग के साथ सहभागिता से किसानों तक पहुंचाया जा रहा है।

एसजेवीएन के साथ समझौता, 3000 किसानों को दिया प्रशिक्षण

कृषि विश्वविद्यालय का सतलुज जल विद्युत निगम के साथ समझौता पत्र हस्ताक्षरित हुआ, जिसके अंतर्गत प्रदेश के विभिन्न स्थानों के किसानों के लिए प्रतिवर्ष 32 प्रशिक्षणों का आयोजन किया गया। इस प्रकार के 116 प्रशिक्षणों में लगभग 3000 किसानों को छह दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कृषि के विभिन्न आयामों के प्रति जागरूक किया गया तथा साथ ही विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों का भ्रमण भी करवाया गया। किसानों ने ये टिप्स खेतों में अपनाए और अपनी आमदन में वृद्धि की।

हर कृषि विज्ञान केंद्र ने गोद लिए दो गांव

प्रसार शिक्षा निदेशालय वर्ष 2022 तक कृषक आय दोगुना करने की तरफ भी जागरूक है और इसके लिए प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र ने दो गांवों को गोद लिया है तथा चयनित गांवों में कृषि की सभी उन्नत तकनीकें प्रदर्षित की जाएंगी, जिससे किसान ऐसी तकनीकें अपनाएं और अपनी आय दोगुनी करें। इसके लिए फसल उत्पादन के साथ-साथ मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन इत्यादि तकनीकियों को प्रदर्षित किया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों ने ‘मेरा गांव, मेरा गौरव’ योजना के अंतर्गत प्रत्येक जिला में एक-एक गांव अंगीकृत किया है, जहां विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकियां किसानों को प्रदर्षित की जा रही हैं, जिन्हें अपनाकर किसनों ने फसलों की पैदावार में 20-25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी प्राप्त की है।

दूध उत्पादन के लिए गांवों में शिविर

दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पशु चिकित्सा शिविरों का गांव में आयोजन किया गया और चारा उत्पादन एवं उत्तम पशु आहार बनाने एवं खिलाने पर भी बल दिया गया। इससे दुग्ध उत्पादन में 1.1/5 किलोग्राम वृद्धि प्राप्त हुई। भूमिहीन किसानों को स्वरोजगार के लिए मशरूम की 78 इकाइयां एवं मधुमक्खी की 20 इकाइयां भी गांव में लगाई गई। मशरूम से प्रति बैग 5.03 किलोग्राम मशरूम उत्पादन तथा मधुमक्खी से 4.5 किलोग्राम शहद प्रति पेटी उपलब्ध हुआ और अनुपात 2.7 से 4.4 रहा।

एग्रीकल्चर नॉलेज बढ़ाने के लिए कई आयोजन

फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के अंतर्गत ही पिछले पांच वर्षों से किसानों का कृषि संबंधी ज्ञान बढ़ाने के लिए 30 किसान प्रशिक्षणों का आयोजन किया गया, जिसमें 1500 किसानों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त 90 किसानों को प्रदेश के अन्य जिलों का भ्रमण भी करवाया गया, जिससे किसानों ने नवीनतम कृषि तकनीकें सीखीं और पैदावार में वृद्धि की। इसके अलावा विश्वविद्यालय के कुछ कृषि विज्ञान केंद्रों में ग्रामीण युवाओं को कृषि संबंधी व्यवसायों से जोड़ा गया है, जिससे वह अपनी आजीविका स्वयं अर्जित करते हुए अन्य बेरोजगार युवाओं को भी कृषि व्यवसायों में रोजगार दे सकें।

हर क्षेत्र में अहम रोल

विश्वविद्यालय द्वारा संचालित शैक्षणिक, शोध एवं प्रसार शिक्षा कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन द्वारा प्रदेश में न केवल अनाज उत्पादन, सब्जी व फल उत्पादन, दुग्ध उत्पादन व अन्य कृषि उत्पादों में बढ़ोतरी हुई है, बल्कि प्रदेश के किसानों के जीवन स्तर में भी उल्लेखनीय उत्थान हुआ।

यहां से सीख युवाओं ने खोले मशरूम यूनिट कइयों को दी नौकरियां

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत कृषि में उद्यम विकास के लिए पांच साल में 16 दीर्घकालीन प्रशिक्षणों (25-30 दिन) का आयोजन भी मशरूम तथा कृषि विज्ञान केंद्र में किया गया और 220 किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। इन प्रशिक्षण शिविरों में युवा किसानों का चयन किया गया, ताकि वे कृषि आधारित स्वरोजगार की ओर बढे़ं। अधिकतम किसानों ने मुर्गीपालन, डेयरी उत्पादन, जैविक खेती, मशरूम उत्पादन इत्यादि विषयों पर प्रशिक्षण लेकर प्रमाण पत्र प्राप्त किया, जिससे बैंकों ने भी उन्हें उदारता से ऋण दिया। ऐसे युवा ‘नौकरी लेने वाले’ के स्थान पर ‘नौकरी देने वाले’ उद्यमी बन गए हैं। प्रदेश के युवा मशरूम उत्पादन की वातानुकूलित इकाइयां लगा रहे हैं तथा वर्ष भर मशरूम की खेती कर रहे हैं तथा प्रतिवर्ष दो से तीन लाख शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। इसी प्रकार पशुपालन की ओर भी युवाओं का रुझान गया है तथा प्रति लघु इकाई (10 से 15 गाय) से वर्ष भर में तीन से चार लाख की आमदन प्राप्त कर रहे हैं।

पॉलीहाउस के लिए 75 प्रोग्राम, 1500 हुए ट्रेंड

प्रदेश के किसानों के लिए हरित गृह निर्माण योजना भी सरकार चला रही है, जिसमें 85 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है, क्योंकि पॉलीहाउस की खेती बाहर की कृषि से भिन्न है। अतः प्रदेश सरकार उन्हीं किसानों को इसका लाभ देती है, जिन्होंने विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त किया हो। अतः इस योजना के अंतर्गत 75 प्रशिक्षणों का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1500 लोगों को प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण उपरांत कृषकों ने प्राप्त जानकारी को अपने हरित गृहों में प्रयोग किया, जिससे बेमौमसी व अन्य उच्च मूल्य वर्ग की फसलों जैसे चैरी टमाटर, रंगीन शिमला मिर्च, बीज रहित खीरा, फूल इत्यादि फसलें बाजार में पहुंची व किसानों की आमदन में कई गुणा वृद्धि हुई। प्रदेश के कुछ प्रगतिशील किसान 500 वर्गमीटर के हरित गृह से उच्च मूल्य वर्ग की फसलें उगाकर एक से डेढ़ लाख तक की आय अर्जित कर रहे हैं।

पांच साल में 4109 ट्रेनिंग प्रोग्राम

पांच सालों (2014-2019) के दौरान प्रसार शिक्षा निदेशालय ने कृषि की आधुनिक व स्वरोजगार उन्मुख उद्यमों जैसे हरित गृह में पौध व सब्जी उत्पादन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, डेयरी फार्मिंग इत्यादि विषयों पर प्रदेश के किसानों को जागरूक एवं प्रशिक्षित किया। इस अवधि में प्रसार शिक्षा निदेशालय द्वारा 4109 प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1.20 लाख किसानों ने भाग लिया। इस प्रकार के प्रशिक्षणों के बाद कृषकों ने नई तकनीक अपने खेतों में इस्तेमाल की, जिससे उनकी फसलों की पैदावार तथा आमदन में बढ़ोतरी हुई। कुछ प्रगतिशील कृषकों ने नकदी फसलों की तरफ रुझान किया, जिससे न केवल अपने परिवार के सदस्यों अथवा अन्य लोगों को रोजगार भी दिया, क्योंकि सब्जी उत्पादन में कामगारों की अधिक आवश्यकता होती है।

किसानों तक पहुंच रही हर नई टेक्नीक

किसानों को कृषि की नवीनतम जानकारी देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित योजनाओं जैसे फार्मर फर्स्ट प्रोग्राम, आतमा इत्यादि भी प्रसार निदेशालय द्वारा संचालित किया जा रहा है। इन परियोजनाओं से किसान फसल विविधिकरण की ओर अग्रसर हुए हैं तथा अन्य कृषि आधारित व्यवसाय जैसे मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, सब्जी उत्पादन, जैविक खेती, मुर्गी पालन, पशुपालन इत्यादि अपनाकर अपनी आय में बढ़ोतरी कर रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित किसान प्रथम कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2016 से बैजनाथ ब्लॉक के सेहल-धरेड़ गांव के 500 किसानों को आधुनिक कृषि एवं कृषि आधारित व्यवसायों पर प्रशिक्षित किया गया और उनके खेतों में प्रदर्शनी भी लगाई गई। धान, मक्की तथा गेहूं में सुधरी किस्मों एवं सुधरी सस्य क्रियाओं पर प्रदर्शनियों से क्रमशः 32.7, 33.5 तथा 33.1 प्रतिशत उपज में वृद्धि प्राप्त हुई। किसान अब इन सुधरी किस्मों के बीज स्वयं ही पैदा कर इन खाद्यान्न फसलों से भरपूर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

बेमौसमी सब्जियों से चौखी कमाई कर रहे किसान

फसल विविधिकरण कार्यक्रम के अंतर्गत बेमौसमी सब्जियों जैसे मटर, फूलगोभी, मूली, खीरा, फ्रांसबीन, टमाटर, मिर्च तथा भिंडी इत्यादि सब्जियों की खेती को लोकप्रिय बनाया गया। गांवों के किसान इन सब्जियों से अच्छी पैदावार लेकर भरपूर लाभ कमा रहे हैं। इसके अतिरिक्त ‘न्यूट्री गार्डन’ को भी हर घर में लोकप्रिय बनाया गया, जिससे किसनों को ताजा एवं उच्च गुणवत्तायुक्त सब्जी अपनी गृह वाटिका से निरंतर प्राप्त हो रही है।

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