ऊर्जा- दिशा व दशा-2

By: Dec 11th, 2019 12:05 am

चंद्रशेखर

लेखक, मंडी से हैं

विकास के सफर में हमारा विनाश या नुकसान का बही खाता क्या है, इसकी जानने तक की कोशिश भी हमने नहीं की। नदी-नालों के बदलते रुख व उनसे पैदा होता भूमि कटाव तथा जल व जमीन में विलुप्त होते जीव व वनस्पति, बाढ़ों व फटते बादलों के प्रकोप में तहस-नहस होती इनसानी मानसिक संवेदनाएं किस दर्दनाक स्तर पर पहुंचती हैं वे इनसानियत को झकझोर कर रख देती हैं। इस फेहरिस्त में परियोजनाओं के चलते विस्थापन का दंश झेलते हुए लोगों ने न जाने कितने जख्म अपने सीने पर लेकर इस जमाने से रुखसत हुए…

अपने प्राकृतिक सौंदर्य, साफ.-सुथरे वातावरण, ऊंचे पर्वतों, विशाल वनों व हरे-भरे नजारों, हिमालय से निकलती नदियों-नालों तथा अपनी शानदार पहाड़ी परंपराओं से अपनी पहचान को कायम रखते हुए हिमाचल प्रदेश ने देश के विकसित राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य व ऊर्जा के क्षेत्र में प्रमुख तौर पर खास स्थान बनाया है। इसे कायम रखते हुए क्या ऊर्जा उत्पादन के दौरान हमारे सरोकार पर्यावरण संरक्षण पर अपनी खामियों को सही मायने में दुरुस्त कर पाएंगे? चूंकि हासिल की हुई ऊर्जा दोहन की प्रक्रिया में पर्यावरण का भी कहीं न कहीं नुकसान कर गए हैं शायद ही किसी सरकारी एजेंसी ने इनके पर्यावरणीय प्रभाव की पड़ताल में कोई रुचि दिखाई हो हालांकि हमें यह मालूम है कि किस परियोजना से कितनी बिजली का उत्पादन हुआ है। विकास के इस सफर में हमारा विनाश या नुकसान का बही खाता क्या है इसकी जानने तक की कोशिश भी हमने नहीं की। नदी-नालों के बदलते रुख व उनसे पैदा होता भूमि कटाव तथा जल व जमीन में विलुप्त होते जीव व वनस्पति, बाढ़ों व फटते बादलों के प्रकोप में तहस-नहस होती इनसानी मानसिक संवेदनाएं किस दर्दनाक स्तर पर पहुंचती है वे इनसानियत को झकझोर कर रख देती हैं। इस फेहरिस्त में परियोजनाओं के चलते विस्थापन का दंश झेलते हुए लोगों ने न जाने कितने जख्म अपने सीने पर लेकर इस जमाने से रुखसत हुए इस विकास पथ पर उनका दर्द किसी भी सरकारी योजनाओं के आंके जा रहे मापदंडों से कोसों दूर है। आए दिन मुद्दा उठता है कि ऊर्जा कंपनियां क्या स्थापित नीति के तहत रोके हुए जल का 15 प्रतिशत जल छोड़ने की शर्त को पूरा कर पाई हैं? जिसके बहुत ज्यादा साक्ष्य नहीं मिलते। इसी तरह  दो परियोजना के बीच 2  किलोमीटर का फासला होना पर्यावरण मंत्रालय के आदेशानुसार अनिवार्य था वह भी मात्र कागजों की लीपापोती तक ही ज्यादा सीमित रहा। पर्यावरण संरक्षण की चिंता के प्रति सरकार का रुख उस वक्त दयनीय व हंसी का पात्र हो गया जब वर्ष 2005 से 2010 में विभिन्न नदी-नालों में बन रहे प्रोजेक्ट्स को पहले ही तय करके आबंटित कर दिया और उसके 2012 में सब नदियों के बेसिन में पर्यावरण के हो रहे नुकसान का आकलन शुरू किया। 84 लाख योनियों में जीवन की सत्यता को प्रमाणिक तौर पर स्वीकारने वाले देश में नीतियों पर अवैज्ञानिक व अदूरदर्शी दृष्टिकोण में सरकारों का लक्ष्य विकास तो है, लेकिन वहीं विनाश को बराबर अपनाकर व नजरअंदाज कर भविष्य के प्रति यमराज बनकर भयावह स्थिति को भी अंजाम देने पर आमादा है। बढ़ती बेरोजगारी का ग्राफ लगातार प्रगति पर है और शायद 70 प्रतिशत रोजगार इन परियोजनाओं से जुटाकर हिमाचल प्रदेश सरकार बेरोजगारी के दबाव से कुछ हद तक निकलना चाहती है, लेकिन पूर्व व वर्तमान में विभिन्न प्रोजेक्ट्स में काम करने वाले कामगारों में ज्यादातर बाहरी राज्यों व विशेष रूप से नेपाली मूल के रहे हैं, लेकिन नेपाल में भी नए 2 प्रोजेक्ट्स के सृजन से वहां से कामगारों का पलायन अब काफी कम हो चुका है। अनुमानतः 100 मेगावाट की बिजली परियोजना में 500 से 700 कामगार कार्यों को अंजाम देते हैं ऐसे में हम हिमाचल युवाओं से कार्यों को अंजाम देने की उम्मीद रख सकते हैं लेकिन सनद रहे हिमाचल प्रदेश  शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य है और यहां  तकनीकी हुनरमंद कम व अकादमिक व डिग्री धारक शिक्षा की परंपरा मुख्य तौर पर खास रही है और उसका विस्तृत कारण ज्यादातर युवाओं का सरकारी सेवा में रहकर ही नौकरी की उम्मीद लगाए रखने पर केंद्रित रहती है परिणामस्वरूप शिक्षित लोग बेरोजगारी की लंबी फेहरिस्त में शामिल हो रहे हैं।

चूंकि प्रदेश की युवा पीढ़ी काम के मामले में चयनशील है तथा परियोजनाओं में कामगार के रूप में कितना खुद को ढाल पाएगी यह देखना भी भविष्य के गर्भ में है। आज जबकि केंद्र व राज्य में भाजपा पूर्ण समर्थन के रूप में सत्तासीन है। ‘डबल इंजन सरकार’ के नाम पर सरकार दुहाई दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार दशकों से केंद्र सरकार से विद्युत उत्पादन की सम्मानजनक हिस्से की पैरवी करते आ रहे हैं इस से बढ़कर सुनहरी मौका और क्या हो सकता है! मौजूदा शासन को चाहिए कि बीबीएमबी से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिमाचल को आदेशित 4500 करोड़ की हिस्सेदारी केंद्र से अपने खजाने में करवाने में अपनी पूरी ताकत दिखाए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय पहले ही केंद्र बीबीएमबी को 7.19 प्रतिशत के हिसाब से विभिन्न परियोजनाओं के तहत राज्य सरकार की हिस्सेदारी तय करते हुए अदा करने के आदेश कर चुका है। राज्य के प्रतिभाशाली नेतृत्त्व को इस दिशा में कार्य करने के लिए हिम्मत जुटाते हुए केंद्र के समक्ष लगातार अपना पक्ष रखकर इस भारी-भरकम अदायगी की गुराही करे ताकि अपने खजाने से प्रदेश के इन्फास्ट्रक्चर को और मजबूत कर निवेशकों व पर्यटकों के लिए आधारभूत संरचना का मजबूती से माहौल बनाया जाए।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।

-संपादक

 

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