काम वह करें, जिस पर सबको नाज हो

By: Dec 4th, 2019 12:21 am

मेरा भविष्‍य मेरे साथ-15

करियर काउंसिलिंग कर्नल (रिटायर्ड) मनीष धीमान, मो. 9419061580

अधिकारी प्रशिक्षण की आखिरी कड़ी सभी कैडेट का पासिंग आउट परेड  में हिस्सा लेना होता  है, इसका आयोजन गणतंत्र दिवस परेड के समान भव्य होता हैै। इस परेड की तैयारी करीब एक से डेढ़ महीने तक की जाती है। इस परेड के दौरान जोश, समन्वय एवं तालमेल का अनूठा संगम देखने लायक होता है, माता-पिता के अलावा हर कैडेट्स के कम से कम पांच सगे संबंधियों या पहचान वालों को आयोजन  में अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है, जबकि भारत के राष्ट्रपति स्वयं ही ज्यादातर मौकों पर इस भव्य समारोह के मुख्य अतिथि होते हैं। आर्मी बैंड की धुन वाली परेड का समापन चैटवुड हाल के एक दरवाजे पर उकेरे शब्द अंतिम पग को लांघने से होता है, जिस तक पहुंचना हर कैडेट का सपना होता है। जैसे ही कैडेट्स ‘अंतिम पग’ की तरफ  बढ़ते हैं, तो हवाई जहाज से उन पर फूल बरसाए जाते हैं। इस नजारे एवं सम्मान से हर कैडेट्स अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता है। ‘अंतिम पग’ पार करते ही सभी कैडेट्स परेड में इस्तेमाल हुए हथियारों को संबंधित जगह पर जमा करवा कर, कसम परेड के लिए पहुंचते हैं। आग, पानी और वायु हर जगह और हर स्थिति में देश को सर्वोपरि रख कर सेवा करने की कसम खाते हैं। इसके बाद का आयोजन हर कैडेट्स और उनके  परिवार के लिए अविस्मरणीय होता है, एक ऐसा पल जिसे मुल्क का हर नौजवान जीना चाहता है, ऐसा पल जिसको अनुभव करने का मौका सेना में अधिकारी बनने वाले नौजवानों के अलावा और किसी को भी नसीब नहीं होता। चाहे वह प्रशासनिक अधिकारी हो, वैज्ञानिक हो, बिजनेसमैन, खिलाड़ी, राजनेता हो या अभिनेता, जब हर कैडेटस के  माता-पिता उनके कंधों पर सितारे लगाकर अपने बच्चों को भारतीय सेना में अधिकारी बना कर भारत माता की सेवा का आर्शीर्वाद देते हैं और बदले में नया बना अधिकारी अपने माता-पिता को पहला सैल्यूट करता है। इस दौरान लगभग हर अधिकारी एवं उसके माता-पिता की आंखों में खुशी के आंसू होते हैं और शायद हर मां बाप अपने बच्चे पर गर्व महसूस कर रहे होते हैं। हिमाचली युवाओं और सेना का एक विशेष रिश्ता है। अगर हम अपने आस-पड़ोस में देखें तो हर घर में एक सैनिक मिलेगा और ज्यादातर सैनिक सेना में सिपाही या सूबेदार हैं और उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान अधिकारी बनने की परेड एवं  समारोह को अकसर देखा होता है और यकीनन मन ही मन में अपने बेटे को इस जगह पंहुचने का सपना देखा होगा। मैंने अपने सिपाही व सूबेदार से चर्चा के दौरान अकसर सुना है कि साहब भगवान ने चाहा तो जब मैं अपने बेटे को सितारे लगाऊंगा तो उससे पहले, मैं उसको सैल्यूट करूंगा,।साहब अपने बेटे को सैल्यूट करने का जो आनंद है, उसे सिर्फ  एक पिता ही समझ सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिमाचली युवाओं की पुराने समय से ही पहली पसंद सेना में सेवा करना रहा है। भूतकाल में हमारे परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने तथा शिक्षा के र्प्याप्त संसाधन एवं अधिकारी बनने के लिए जरूरी ज्ञान न होने की वजह से कैलिवर और टेलेंट होने के बावजूद हिमाचली  सेना में अधिकारी बनने के बजाय सिपाही बनते थे, पर आज समय बदल गया है। आर्थिक स्तर पहले से कहीं बेहतर है तथा सीबीएसई एवं आईसीएसई माध्यम की शिक्षा शहर, गांव व हर नुक्कड़ तक पहुंचने से लगभग सारे देश की शिक्षा प्रणाली एक सी होने के साथ उच्च दर्जे की हो गई है, जिससे शहर व गांव तथा अमीर व गरीब की शिक्षा एवं ज्ञान में ज्यादा फर्क नहीं है। मोबाइल व इंटरनेट की पहुंच से हर परीक्षा, उसकी योग्यता एवं तरीके की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है। इसलिए आज के दौर में सेना में अधिकारी बनने की इच्छा रखने वाले बच्चों के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जरूरत है तो बस सही रास्ता चुनने और मेहनत करने की। मेरा मानना है कि वर्तमान में सेना में अधिकारी बनना, सिपाही बनने से आसान है और अगर हमारे युवा सिपाही बनने के बजाय अधिकारी बनने की कोशिश करें तो सेना में शामिल होने की पारिवारिक परंपरा के साथ अपने माता-पिता को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करवा सकते हैं।

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