जिज्ञासा की प्रवृत्ति

By: Dec 14th, 2019 12:17 am

श्रीश्री रवि शंकर

जिज्ञासा की प्रवृत्ति ही इस ग्रह में हो रहे प्रत्येक महान अन्वेषण का कारण है। जब यह जिज्ञासा बाहर की ओर निर्देशित होती है तब, यह क्या है? यह कैसे हुआ? प्रश्न उठते हैं और यही विज्ञान है। जब यह अंदर की ओर निर्देशित होती है तब मैं कौन हूं? मैं यहां क्यों हूं? मैं वास्तव में क्या चाहता हूं? आदि प्रश्न उठते हैं और यही आध्यात्मिकता है। प्रत्येक संध्या कुछ सत्संग के बाद हमारी एक अनौपचारिक सभा होती है, जिसमें मैं वहां उपस्थित लोगों के प्रश्नों के उत्तर देता हूं। इतने वर्षों में मुझसे विभिन्न विषयों पर हजारों प्रश्न पूछे जा चुके हैं। हालांकि संभावित प्रश्नों की संख्या विशाल है, परंतु मुख्यतः पांच प्रकार के ही प्रश्न होते हैं।

दुःख से उदित प्रश्न- बहुत बार जब लोग दुःखी होते हैं तब प्रश्न पूछते हैं। सामान्यतः वे प्रश्न इस प्रकार के होते हैं, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? मैंने ऐसा क्या किया था, जो मुझे यह मिला आदि। जब तुम देखते हो कि कोई व्यक्ति पीड़ा में प्रश्न पूछ रहा है, तो तुम उसकी बात सुन लो। वह केवल चाहता है कि कोई उस की बात सुने। उनको उस समय वास्तव में उत्तर पाने की कोई चाह  नहीं होती।

क्रोध से पैदा हुए प्रश्न- मैंने कुछ गलत नहीं किया था,मैं सही था, फिर मुझ पर दोष क्यों लगाया गया? ऐसा क्यों हो रहा है? क्रोध के कारण इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं। यहां पर भी वह व्यक्ति अपनी भावनाओं और संवेदनाओं के भंवर में फंसे होते हैं और स्वयं को न्यायोचित ठहराने के लिए ऐसे प्रश्न पूछते हैं। जब कोई ऐसी अस्थिर मानसिक अवस्था में होता है, तो आप कोई भी उत्तर दो, वह उसके भीतर नहीं जाता। इसके विपरीत उससे अनेक नए प्रश्न व तर्क उठ खड़े होते हैं। ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रश्न – कुछ लोग केवल इसलिए प्रश्न पूछते हैं, जिससे सब को उनकी उपस्थिति का पता लग जाए। उनको उत्तर पाने की अपेक्षा प्रश्न पूछने में संतुष्टि मिलती है, जिससे सब लोग उनको देख लें।

परीक्षा लेने के लिए – कुछ लोग केवल यह परीक्षा लेने के लिए कि सामने वाले को कुछ ज्ञान भी है या नहीं प्रश्न पूछते हैं। उनके पास पहले से ही प्रश्न का उत्तर होता है और मन ही मन वह अपने उत्तर से उस व्यक्ति के उत्तर की तुलना करते हैं कि दूसरों का उत्तर उनके उत्तर की तुलना में सही है या गलत।

निष्कपटता से पूछा प्रश्न– पांचवी प्रकार के प्रश्न वे हैं लोग निष्कपटता से जिसका उत्तर जानना चाहते हैं और उनको विश्वास होता है कि जिस व्यक्ति से यह प्रश्न पूछा जा रहा है, उसको इसका उत्तर मालूम है और वह हमें ठीक प्रकार से बताएगा। केवल इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर वास्तव में देने योग्य होते हैं। हमारे अधिकांश प्राचीन शास्त्र चाहे वह भगवद्गीता हो, योग वशिष्ट हो, अष्टावक्र गीता हो, त्रिपुरा रहस्य हो या उपनिषद हों, इनका आरंभ प्रश्न पूछने से ही होता है। यहां पूछे गए प्रश्न केवल जिज्ञासा से ही नहीं, बल्कि निकटता की भावना से भी उत्पन्न होते हैं। उपनिषद का अर्थ ही है गुरु के निकट बैठना, केवल शारीरिक तौर पर ही नहीं अपितु गुरु से निकटता अनुभव करना। ज्ञान को फलने-फूलने के लिए सामीप्य के वातावरण के होने की आवश्यकता होती है। तुम स्वयं को जितना गुरु के अधिक समीप महसूस करोगे उतना अधिक ज्ञान स्वतः ही तुम्हारे भीतर प्रकाशित होता जाएगा।

 

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