तेरे कूचे से हम निकले…

By: Dec 3rd, 2019 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

पंडित जॉन अली अपने पुत्र को पूरे जोश-ओ-खरोश से महाराष्ट्र प्रहसन की मिसाल देकर प्रबंधन का पाठ पढ़ा रहे थे। उत्सुकता में, मैं भी उनकी खिड़की के पास कान लगा कर खड़ा हो गया। गीता के कर्म और फल सिद्धांत को उद्धृत करते हुए पंडित जी बोले, ‘महत्त्वकांक्षा तो ठीक है, लेकिन अति महत्त्वकांक्षी होना व्यक्ति या संस्था के लिए हमेशा खतरनाक होता है। अति महत्त्वकांक्षा, अंधे उत्साह से लबरेज होती है। पूरे भारत को जीतने के अति महत्वकांक्षी मंसूबे से लैस दल अभिमन्यु की तरह विरोधियों के सरदार के चक्रव्यूह में ऐसे उलझा कि इज्जत का फालूदा बना कर ही लौटा। इधर, मीडिया उसके नेता को आधुनिक चाणक्य की संज्ञा से नवाजते समय भूल रहा था कि चाणक्य ने कभी दुर्याेधन की तरह अनैतिकता का दामन नहीं थामा था। मीडिया तो इस प्रहसन को देखते हुए अपनी मर्यादाएं वैसे ही भूल बैठा था, जैसे विराट कोहली के दर्शनीय स्ट्रोक्स को देखकर कोई दर्शक अधनंगा होकर मैदान में उसके पांव छूने के लिए दौड़ा चला आता है।  यह तो सुप्रीम कोर्ट ने श्री कृष्ण की तरह अवतरित होकर संविधान को तार-तार होने से बचा लिया, वरना हमारा मीडिया तो उसके सनी लियोनी होने पर भी गली के आवारा लड़कों की तरह सीटियां बजाने से भी नहीं चूकता।’ ‘लेकिन डैड, सपने देखना तो बुरी बात नहीं? ‘उनके बेटे ने पूछा। ‘सपने देखना बुरी बात नहीं, लेकिन जब पांव चादर के बाहर निकल जाएं तो आदमी विजय माल्या की तरह मुंह छिपाता फिरता है।’, उनके दार्शनिक विचारों को सुनने के बाद जब मुझसे बाहर खड़ा रहना मुश्किल हो गया तो मैं बिना घंटी बजाय ही उनके दरवाजे के भीतर प्रवेश कर गया। मुझे देखते ही पंडित जी बोले, ‘‘अमां यार! अच्छा हुआ जो तुम खुद ही चले आए। नहीं तो मैं आवाज देकर बुलाने वाला ही था कि क्यों चुपके-चुपके बाप-बेटे की बातें सुन रहे हो, भीतर चले आओ।’’ अब परेशान होने की बारी मेरी थी, मैं बोला, ‘आपको कैसे पता चला कि मैं बाहर हूं।’ पंडित जी पूरे मूड में थे, बोले, ‘सीसीटीवी लगाने के बावजूद मैं सुरक्षा एजेंसियों की तरह सोया थोड़े ही हूं कि तमाम इनपुट्स होते हुए भी आतंकवादी संसद भवन में बजाकर चले जाएं।’ उनके तीर से खिसियाए मैंने बात बदलने के लिए पूछा, ‘पंडित जी, ऐसा क्या था कि जिस नाई पर उस्तरा चुराने के आरोप लगाए थे, उसी से दाढ़ी बनाने के चक्कर में दूल्हे मियां अपना चेहरा लहूलुहान करवा बैठे?’ मेरी बात सुनकर पंडित मुस्कराते हुए बोले, ‘अति महत्त्वकांक्षा वत्स, अति महत्वकांक्षा। जैसे सावन के अंधे को हरा-हरा दीखता है, वैसे ही महत्त्वकांक्षा के मारे को कर्म के स्थान पर केवल फल ही फल दिखता है। पिछली बार कर-नाटक के नाटक में पटकनी खाने के बावजूद अति महत्वकांक्षा ने इस बार भी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया। जब आदमी पर महत्त्वकांक्षा हावी हो जाती है तो वह अंधे प्रेमी की तरह लड़की के बाप या भाइयों को देखकर भी नहीं देखता और बुरी तरह पिटता है। अति महत्त्कांक्षा के फेर में बेचैन आदमी मुंह अंधेरे शपथ लेते समय भूल गया कि अंधेरे में ठोकर ही लगती है और वह भी तब विरोधी लंगड़ी लगाए बैठे हों। कहां तो बावला अपनी बहिश्त बसाने की सोच रहा था और कहां बेचारे को बे-आबरू होकर कूचा ही छोड़ना पड़ा।’

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