देवभूमि के दाग

मंदिरों में चोरियां बढ़ रही हैं या देवभूमि में दाग, यह विषय चर्चाओं में स्थायी रूप से आने लगा है। सुंदरनगर में दो मंदिरों के ताले टूटे, तो इससे पूर्व धर्मशाला के कुनाल पथरी मंदिर में भी चोरी हो गई। आए दिन ऐसी घटनाओं के माध्यम से आस्था प्रताडि़त होती या देवभूमि के सरोकार परास्त हो जाते हैं। हम इसे कानून के दायरे से देखें, तो कारणों की फेहरिस्त में चौकसी के इंतजाम व सतर्कता पर बात होगी, लेकिन यहां तो देवभूमि के दाग गिने जा रहे हैं। वे भी दिन थे जब घरों में ताले नहीं लगते थे और देव की इच्छा पर प्रजा अपने भविष्य की कामना करती थी। अब नाम की देवभूमि में आस्था बिकने लगी है। सरकाघाट की घटना को अगर बहुचर्चित आयाम मिला, तो हम सभी बिके। मंदिर में चोरी नामुमकिन नहीं, लेकिन आस्था के नाम पर भी हिमाचल बदनाम होने लगा है। देव समाज को घूमते देखिए या देवता के नाम पर फेरी लगाने का माहौल, समाज से सत्ता तक जो मांग रहा है, उसे हम कैसी आस्था कहें। आश्चर्य यह कि जहां से देवभूमि की आस्था निकलती थी, वहां से माफिया निकल रहा है, लेकिन देवता के द्वार को खबर तक नहीं। गुमनाम पन्नों की सियाही बन कर धर्मशास्त्र विलुप्त है, लेकिन आज भी हम देवता की शरण में अंगारों पर चलने को तैयार हैं या मोटे सांगल से शरीर पर प्रहार सह सकते हैं। कह नहीं सकते कि देव समाज हमें किस कर्म की परिभाषा की ओर धकेल रहा है, क्योंकि प्रगति के मायनों में समाज और संस्कृति की कोई सीमा दिखाई नहीं देती। यहां सभी की आंखें अंधी हैं और गुलेल से सिर फोड़े जा रहे हैं। अमर्यादित जीवन की चरागाहों में बिकता नशा और समाज के धुंधलते में आंख मूंदे बैठे धर्मस्थल। मंदिर की चोरी तो फिर भी समाज की उफ और आह निकाल देती, मगर जिसने आस्था की तिजोरी में हाथ डाला उसको अपराधी किसने बनाया। क्या वह कोई नशाखोर था, जो ईश्वर के दरबार में अपने गुनाह की गवाही कबूल रहा था। ऐसा कोई बेटा या बेटी भी हो सकती है जो अपने ही घर की सेंधमारी में अपनी सांसों को कुर्बान करते हुए चिट्टा कबूल कर रहे हैं। जब कभी ओवरडोज में बुझते किसी घर के चिराग की चीख निकलती होगी, तो कौन सा मंदिर और कौन सी आस्था सन्न रहती होगी। कौन सी पंक्तियां थम जाती होंगी या मंदिर की घंटियों से हमारे सामाजिक अंधेरे दूर हो जाते हैं। अगर हम एक मूर्ति को संपत्ति मानेंगे, तो इसकी चोरी अवश्य होगी और हो भी यही रहा है। शक है तो पुलिस रिपोर्ट की शब्दावली पढ़ लें, जहां मंदिर की चोरी महज एक अपराध है। विडंबना यह कि जुर्म इससे भी कहीं आगे जीवन की आस्था व विश्वास की चोरी से जुड़ा है। एक पढ़ा-लिखा नौजवान मंदिर के बजाय जब जीवन की आस्था को खोता है, तो अपराध के पांव मंदिर को मंदिर नहीं रहने देते, जीवन के पांव जीवन को जीवन नहीं रहने देते। क्या हिमाचल में मंदिर के पांव दोषी हैं या जीवन के पांव निरंकुश हो गए। जिन नदियों की हम पूजा करते हैं, उनकी हालत के दुश्मन हम ही तो हैं। रेत माफिया हो या नशा माफिया, हर दिन मर्यादा का कोई न कोई मंदिर टूट रहा है। हमारी प्रगति का वर्तमान ढर्रा मंदिर की घंटियों को अधमरा कर रहा है और सबूत उस गुल्लक में ढूंढा जा रहा है, जहां देवता के नाम पर चढ़ावा चढ़ा कर हम पाप धोना चाहते हैं। क्या गुल्लक अधिक पवित्र है या उसमें आ रहा पैसा । ठीक वैसे ही जैसे लोकतंत्र में उम्मीदवार की जीत ज्यादा पवित्र है या जीत के लिए लुटाया गया धन। हस उस आस्था का विश्लेषण करें, जिस पर भरोसा करके जनता सत्ता बनाती है और सत्ता नियम बनाकर हमें कानून सिखाती है। कहां है कानूनों की फेहरिस्त। आखिर इन्हीं में से कुछ चुनकर हम अपने हारे हुए मकसद या चुराए हुए मंसूबों की जंग लड़ेंगे। मंदिर की चोरी में हमारी कोई जंग नहीं, सिर्फ यह जिक्र भर होगा कि अब देवता भी आंख मूंद कर बैठा है, जैसे सत्ता के सामने देश और प्रदेश लुट रहा है।

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