नेरवा में गेहूं नहीं, अब टमाटर है फेवरेट फसल

नेरवा –क्षेत्र के किसानों द्वारा टमाटर, सब्जियों व अन्य नकदी फसलों की ओर रुख करने से भले ही किसानों की आर्थिकी सुदृढ़ हुई हो परंतु किसानों के इस कदम से क्षेत्र की पहचान मानी जाने वाली परंपरागत फसलें लगभग हो चुकी हैं। अधिकांश किसान टमाटर, सब्जियों व अन्य नकदी फसलों से जुड़ कर अपनी आर्थिकी सुदृढ़ करने में जुटे हुए हैं। एक समय था जब लोग बाजार से राशन बिलकुल भी नहीं खरीदा करते थे। किसान खेतों खलिहानों में जी तोड़ मेहनत कर गेंहू, मक्की, ज्वार, बाजरा, चौलाई व कोदा (मँढ़वा) आदि उगाकर अपने परिवार का पूरे साल का राशन तो पैदा कर ही लिया करते थे। अतिरिक्त पैदा किये गए अनाज को हाट बाजारों में बेच कर इस पैसे से नमक मसाले एवं घर के इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं भी बाजार से खरीद लिया करते थे। किसानों द्वारा पैदा किये गए यह अनाज पूरी तरह जैविक हुआ करते थेए इनमें रसायनों का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं होता था। जब किसान इस प्रकार के अनाज उगाते थे तो पानी से चलने वाले घराटों की भी अपनी एक अलग पहचान थी। किसान खेतों में तैयार इस अनाज को नदी नालो के किनारे पानी से चलने वाले इन घराटों में ही पिसवाते थे। घराट में पीसे गए अनाज को अभी भी काफी पौष्टिक माना जाता है। अनाज की पैदावार कम होने के साथ ही इन धरोहर रुपी घराटों का अस्तित्व भी लगभग समाप्त हो चुका है। अब कहीं कहीं नदी नालों के किनारे इक्का दुक्का ही ये घराट नजर आते हैं। ज्यों-ज्यों गांव-गांव तक सड़कें व अन्य सुविधाएं पंहुचती गई लोग परंपरागत फसलों से विमुख होकर नकदी फसलों से जुड़ते गए। इन फसलों से किसानों के विमुख होने का एक कारण खेत खलिहानों में बंदरों का आतंक भी है। बंदर खेतों में बीजी गई फसलों को तबाह कर देते हैं जबकि टमाटर व सब्जियों पर इनका आतंक काफी हद तक कम रहता है। क्षेत्र के अधिकांश किसान बीते दो दशक से टमाटर की खेती से जुड़ चुके हैं। टमाटर की खेती से जुड़े किसानों को भी कई उतार चढ़ाव देखने को मिलते है। टमाटर की फसल पूरी तरह मौसम पर निर्भर रहती है। यदि मौसम ने साथ दिया तो किसान मालामाल अन्यथा सब गोलमाल। इस साल टमाटर उत्पादकों को इसके औसतन दाम मिले हैं। किसानों को इस साल टमाटर के दाम आठ सौ रुपए तक मिले जोकि बाद में घट कर दो अढ़ाई सौ रुपए तक रह गए थे। इसके आलावा किसानों ने बेमौसमी नकदी सब्जियां भी उगानी शुरू कर दी है। किसानों के इस ओर रुझान का सब से बड़ा कारण यह है कि एक तो टमाटर व सब्जियां उगाने में मेहनत कम लगती है दूसरे इससे कम भूमि पर कम समय में ज्यादा औसत निकलती है। इसके अलावा टमाटर व सब्जियों की  मंडियों में मांग भी अधिक रहती है व इनके नकद दाम हासिल हो जाते हैं। दूसरी तरफ  अन्य परम्परागत फसलों में एक तो मेहनत ज्यादा लगती है व इसके लिए भूमि भी ज्यादा चाहिए होती है। इनमे  मेहनत के हिसाब से किसान को औसत भी नहीं मिल पाती। यह भी एक वजह है कि किसान परंपरागत फसलों से विमुख होकर  नकदी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। 

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