पक्खरू बोलै :लोक व्यवहार को काव्य में पेश किया

मेरी किताब के अंश : सीधे लेखक से

किस्त : 17

ऐसे समय में जबकि अखबारों में साहित्य के दर्शन सिमटते जा रहे हैं, ‘दिव्य हिमाचल’ ने साहित्यिक सरोकार के लिए एक नई सीरीज शुरू की है। लेखक क्यों रचना करता है, उसकी मूल भावना क्या रहती है, संवेदना की गागर में उसका सागर क्या है, साहित्य में उसका योगदान तथा अनुभव क्या हैं, इन्हीं विषयों पर राय व्यक्त करते लेखक से रू-ब-रू होने का मौका यह सीरीज उपलब्ध करवाएगी। सीरीज की 17वीं किस्त में पेश है लेखक रमेश चंद्र मस्ताना का लेखकीय संसार…

साहित्यकार रमेश चंद्र मस्ताना का कहना है कि वह शिक्षा, साहित्य लेखन एवं यायावरी को जीवन का उद्देश्य मानते हुए कई प्रकार के सुखद-असुखद अनुभवों को अनुभूत करके निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। वर्ष 1970-80 के दशक के मध्य से जो साहित्यिक रुचि पैतृक संस्कारों से प्राप्त हुई, वह प्रभाकर एवं एमए करने के साथ निरंतर परिष्कृत हुई और पिताश्री लछमन दास मस्ताना एवं डा. गौतम शर्मा व्यथित जी के सार्थक प्रयासों से इसमें रुचि भी बढ़ती गई और निखार भी आता गया। सर्वप्रथम पहली कविता ‘भाला’ जहां वीर प्रताप में प्रकाशित हुई थी, वहां पहला आलेख – ‘म्हाचले च पिपल-पूजा’ जे एंड के अकादमी की पत्रिका शीराजा डोगरी में प्रकाशित हुई थी। वर्ष 1978-80 के मध्य संपादन का अनुभव भी धर्मशाला महाविद्यालय की पत्रिका भागसू के छात्र-संपादक के रूप में प्राप्त हुआ था।

पारिवारिक विरासत के संस्कारों के कारण क्योंकि दादाश्री ज्ञानचंद जी लाहौर के किसी मदरसे में मुदर्रिस के रूप में उर्दू पढ़ाते थे और असमय ही उनकी सर्पदंश के कारण मृत्यु हो गई थी तथा बाद में पिताजी ने भी अध्यापक के रूप में अपना व्यवसाय किया, इसलिए इसी शौक के कारण वर्ष 1981 में हिंदी प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति होने पर मन की मुराद पूरी तो हो गई, परंतु एडहॉक नियुक्ति ने बहुत-सी वेदनाएं भी दीं। साहित्य लेखन में सर्वप्रथम जहां कविता की तुकबंदी प्रारंभ की, वहां बाद में विभिन्न साहित्यिक विधाओं में भी रुचि बढ़ी और लोक-साहित्य के प्रति विशेष लगाव उत्पन्न होता गया। प्राचीन रीत-परंपराओं और लोक-संस्कारों के प्रति मोह के कारण उनके संरक्षण का प्रयास साहित्य की विभिन्न विधाओं के लेखन में होने लगा। आज भले ही नई एवं युवा पीढ़ी विकास के नित नए आयामों को छू रही है, परंतु वह रीत-परंपराओं, संस्कारों और नैतिक मूल्यों से अनजान व विमुख हो रही है। लोक-संस्कृति के संरक्षण की दिशा में जहां पहले आस्था के दीप : लोकविश्वास, इसके साथ ही दोहा छंद में झांझर छणकै पुस्तकों का प्रकाशन किया, वहां बाद में पच्चीस ललित लेखों को लोकमानस के दायरे पुस्तक में संकलित कर प्रकाशित करवाया।

शोधात्मक कार्य के रूप में जहां शिक्षा जगत से संबंधित कई आलेख एवं प्रपत्र प्रस्तुत किए गए, वहां लोक संस्कृति से संबंधित आलेख भी प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। पंचायती राज व्यवस्था पर हिंदी-पहाड़ी काव्य संग्रह ‘राज पंचैती दा’ के संपादन के साथ-साथ प्रिया संस्था : नई दिल्ली के तत्त्वावधान में सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं पर एक सूचना पैक भी प्रकाशित करवाया। हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग के भाषायी एवं सांस्कृतिक सर्वेक्षण के अंतर्गत पालमपुर के गढ़जमूला क्षेत्र और शाहपुर के पैतृक गांव नेरटी का विस्तृत सर्वेक्षण भी प्रस्तुत किया गया। इसी के साथ कांगड़ा-चंबा जनपद के पारंपरिक शिव पूजन : नुआला पर भी कार्यशालाएं लगाकर समाज सेवा परिषद रैत के तत्त्वावधान में एक पुस्तक का प्रकाशन भी किया गया और एक केंद्रीय योजना के अंतर्गत योजना प्रारूपण एवं विस्तारीकरण हेतु निपसिड लखनऊ में आयोजित कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व भी किया। साथ ही साथ विषय विशेषज्ञ हिंदी के रूप में जहां हि. प्र. स्कूल शिक्षा बोर्ड, एनसीईआरटी की विभिन्न योजनाओं में सहभागिता निभाई, वहां मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सौजन्य से द्रोणाचार्य शिक्षा महाविद्यालय रैत के सहयोग से भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर में राष्ट्रीय परीक्षण सेवा भारत योजना के अंतर्गत हिमाचल का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे ज्यों ही लेखक रूप को यायावरी के शौक ने जकड़ना शुरू किया तो कई दूरस्थ व दुर्गम क्षेत्रों की लंबी यात्राएं भी प्रारंभ हुई। हिमाचल प्रदेश के कोने-कोने से लेकर जम्मू-संभाग, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड, राजधानी दिल्ली के अतिरिक्त बंगलौर-मैसूर, जगन्नाथ-काशी विश्वनाथ और कोलकाता आदि तक की यात्राएं भी कीं और कई दुर्गम एवं सांस्कृतिक महत्त्व के क्षेत्रों से संबंधित जानकारियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं  में प्रकाशित करवाईं। इसी कड़ी में पुस्तकाकार रूप में चंबा जनपद के अति दुर्गम एवं कबायली क्षेत्र : पांगी घाटी की यात्राएं अपने साहित्यिक मित्र प्रभात शर्मा के साथ करते हुए, पांगी की संस्कृति एवं वहां के भोट व पंगवाला समुदायों को नजदीक से देखते हुए ‘पांगी घाटी की पगडंडियां एवं परछाइयां’ पुस्तक भी प्रकाशित की। वर्ष 2019 के स्वागत के क्रम में एक प्रयास करते हुए हिमाचली-पहाड़ी भाषा में अपनी बासठ विविध रंगी एवं विभिन्न रसी कविताओं को एक पुष्प गुच्छ के रूप में संकलित करते हुए ‘पक्खरू बोलै’ – काव्य संग्रह का प्रकाशन किया है। इन बासठ कविताओं में अपने इर्द-गिर्द के परिवेश में व्याप्त खूबियों, खामियों एवं विसंगतियों के साथ-साथ लोक-व्यवहार की बातों को काव्यमयी भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक का नामकरण ‘पक्खरू बोलै’ कविता के आधार पर रखा गया है, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ पक्खरू की बोली को अनुभूत करने का प्रयास किया गया है :-

कुण बुज्झै पक्खरू दी बोली, कुण जांणे पक्खरू दी भाषा।

बणां बडि़यां लाए रौणकां, बड़-मुल्लियां इदीइयां सौगातां।।

काव्य संग्रह की प्रथम कविता ‘पत्त कितणी ढक्कणी’ में सामाजिक विसंगतियों के चित्रण के साथ-साथ एक ऐसी समस्या का चित्रण भी हुआ  है जो एक तथाकथित वर्ग की सच्चाई को बयां करता है :-

डेरे भारी, संगत अणमुक, पंडाल है भरोआ दा।

असलीत सांह्मणें तां ओन्दी, बाबा जां पकड़ोआदा।।

‘मिंजो ही कैंह्’ – कविता में उन लोगों की नीयत का पर्दाफाश करने का प्रयास किया है, जो हमेशा दूसरों को डराते भी हैं और काम भी उन्हीं से ही लेते हुए अपना मतलब निकालते हैं:-

मिंजो ही कैंह् तू जरकान्दा मितरा।

दुआड़े बी तू ही तां पान्दा मितरा।

कदी कोई सलाह नीं गांणी औन्दी।

कम्म फिरि मेरे ते कुरुआन्दा मितरा।।

‘कियां करी’ कविता में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की विभिन्न खामियों को दर्शाया गया है। आधुनिक युग में लोगों की नीयत एवं आदतें कैसी बनती जा रही हैं, इसका उल्लेख ‘माडर्न जमानां’ कविता में किया गया है। ‘भुल्लियां रीतां’ नामक कविता में आधुनिक बनते जा रहे लोगों की मनोदशा के साथ-साथ विलुप्त होती जा रही रीत-परंपराओं पर दुख एवं वेदना प्रकट की गई है। तरहा मिसरा पर आधारित एक गजल के शेर में मयखाने से नाता रखने वाले पियक्कड़ों की मनोदशा एवं भुलक्कड़पन को दर्शाया गया है। इसी प्रकार से टौरू-बींडू एह लोक, टल्लपटाक, जलब बड़ा है, तोते, फणसेड, अणघड़े-लक्कड़, मैं भोले दा भोला, मुंडूए दा ब्याह, कजो गलांदा टाहली मेरी, रंग होए बदरंग, सतरंगी-दुनियां आदि-आदि कविताएं सामाजिकता के रंग में रंगी हुई दिखाई देती हैं। वर्तमान तक लेखन, संपादन, प्रकाशन एवं हिंदी विषय विशेषज्ञ के रूप में जो भी मान-सम्मान, प्रेरणा-प्रोत्साहन प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संस्थाओं, पाठकों, श्रोताओं एवं शिष्यों से आज तक मिला है, वह भी जीवन की अमूल्य निधि के रूप में संचित एवं स्मरण है।

एमए में स्वर्ण पदक प्राप्त करने पर धर्मशाला स्नातकोत्तर महाविद्यालय द्वारा रोल ऑफ ऑनर, जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा आचार्य मानद सम्मान, गुरुकुल शिक्षा संस्था कुल्लू द्वारा गुरुकुल राज्य सम्मान, आथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल द्वारा साहित्य विभूति सम्मान, पहाड़ी विकास संगम पालमपुर द्वारा साहित्य श्री सम्मान, भुट्टिको कुल्लू द्वारा लाल चंद प्रार्थी राष्ट्रीय सम्मान, हि.प्र. सिरमौर कला मंच द्वारा डा. परमार राष्ट्रीय सम्मान और कायाकल्प साहित्य कला फाउंडेशन नोएडा द्वारा साहित्य भूषण सम्मान आदि के साथ-साथ रोटरी शाहपुर द्वारा सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान प्राप्त करने के अतिरिक्त जब-जब भी किसी मंचीय प्रस्तुति पर जो सम्मान प्राप्त होता रहा है, वह भी जीवन में प्रेरणा व प्रोत्साहन प्रदान करता है।

अगले अंक में पढ़ें : हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि

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