भोपाल गैस त्रासदी के खतरे

By: Dec 4th, 2019 12:05 am

नरेंद्र चौधरी

स्वतंत्र लेखक

पिछले तीन दशक में 20,000 से अधिक लोग इसके प्रभाव से मारे गए हैं। इस फैक्टरी के आसपास का क्षेत्र व जलस्रोत प्रदूषित हैं और वहां के रहवासी आज भी भारी धातुओं, जैसे-आर्सेनिक, पारा, कैडमियम आदि से उत्पन्न प्रदूषण का खतरा झेल रहे हैं। हादसे में जीवित बचे लोग व उनके बच्चे कैंसर, क्षय रोग (टीबी), जन्मजात विकृतियों और दीर्घकालीन स्वास्थ्य समस्याओं की पीड़ा झेल रहे हैं…

सर्दी की आहट के साथ दिसंबर का महीना एक और कारण से हमारे भीतर सिहरन पैदा करता है। दो-तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात को ‘यूनियन कार्बाइड’ की भोपाल स्थित कीटनाशक फैक्टरी के गैस संग्रहण टैंक से जहरीली ‘मिथाइल आयसोसाइनेट’ (मिक) गैस का रिसाव हुआ था जिसने भोपाल को एक गैस-चैंबर में बदल कर रख दिया था। इस गैस का उपयोग ‘सेविन’ नामक एक अत्यधिक जहरीले कीटनाशक को बनाने में किया जाता है, जिसे ‘यूनियन कार्बाइड’ की सहायक कंपनी ‘डाउ केमिकल्स’ बनाती थी। विश्व इतिहास की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटनाओं में दर्ज इस त्रासदी को पर्यावरणविद और ‘नवधान्य’ की संस्थापक वंदना शिवा दुर्घटना नहीं, ऐसा नरसंहार मानती हैं जो आज भी जारी है। इस दुर्घटना में 3,000 निरपराध लोगों की तुरंत मृत्यु हो गई थी, लगभग 8,000 लोग कुछ ही दिनों में मौत की चपेट में आ गए थे और लाखों लोग घायल हुए थे जिनमें से कई आज भी तिल-तिलकर मरते जा रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार पिछले तीन दशक में 20,000 से अधिक लोग इसके प्रभाव से मारे गए हैं। इस फैक्टरी के आसपास का क्षेत्र व जलस्रोत प्रदूषित हैं और वहां के रहवासी आज भी भारी धातुओं, जैसे-आर्सेनिक, पारा, कैडमियम आदि से उत्पन्न प्रदूषण का खतरा झेल रहे हैं। हादसे में जीवित बचे लोग व उनके बच्चे कैंसर, क्षय रोग (टीबी), जन्मजात विकृतियों और दीर्घकालीन स्वास्थ्य समस्याओं की पीड़ा झेल रहे हैं। इलाके की माताओं के दूध में पारा एवं विषाक्त पदार्थ खतरनाक स्तर तक पाए गए हैं। आज भी गर्भस्थ भ्रूण के विकास पर इस प्रदूषण का प्रभाव पड़ रहा है और विकृत बच्चे पैदा हो रहे हैं। इस घटना के 35 वर्ष हो जाने पर भी हम इस फैक्टरी से निकले कचरे के निपटारे का कोई रास्ता नहीं खोज पाए हैं। कंपनी के साथ समझौते के तहत जो मुआवजा मिला वह कंपनी द्वारा पहुंचाए गए नुकसान, घायल एवं मारे गए लोगों की तुलना में नगण्य था। बात सिर्फ भोपाल में जहरीली गैस के रिसाव के दुष्परिणामों तक ही सीमित नहीं है।

इन कंपनियों के जहरीले उत्पादों से लोगों के बीमार होने, उनकी मृत्यु होने, पानी के प्रदूषित होने के खतरे पूरे देश पर मंडरा रहे हैं। इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी हमारी जान की कीमत पर पैसा कूट रही है और अपनी सहयोगी कंपनियों के साथ विलय और विघटन के हथकंडों के जरिए दुष्प्रभावों की भरपाई से भी बच जाती है। कृषि-रसायन बेचने वाली इन कंपनियों की शुरुआत ऐसे रसायनों के निर्माण के लिए हुई थी जिनका उपयोग हिटलर ने ‘कंसन्ट्रेशन केंप’ और ‘गैस चेंबर’ में लोगों को मारने के लिए किया था। ‘डाउ’ कंपनी ने प्रथम विश्वयुद्ध में ‘मस्टर्ड’ नामक एक विषाक्त गैस बनाई थी जिसे रासायनिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था। वियतनाम युद्ध में भी नॉपाम बम बनाकर सैनिकों व नागरिकों पर बेरहमी से प्रयोग किया गया था। इसी युद्ध में ‘डाउ’ ने ‘एजेंट ओरेंज’ नामक विषैला पदार्थ बनाया था जिसका उपयोग शत्रु देश की खाने योग्य फसलों को नष्ट करने में किया गया था। युद्ध समाप्त होने के बाद इन कंपनियों ने जहरीले रसायनों को खेती में उपयोग करना शुरू कर दिया। इन रसायनों की दम पर के जाने वाली खेती से कुछ खाद्यान्नों का उत्पादन तथाकथित रूप से बढ़ा भी, किंतु अब इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ में ‘भोजन के अधिकार‘ विषय के प्रतिवेदक हिलाल एलवर के अनुसार कीटनाशकों के जहर के कारण प्रति वर्ष दो लाख मौतें होती हैं। कीटनाशकों के संपर्क में रहने से कैंसर, अल्जाइमर व पार्किंसंस रोग, हारमोन-असंतुलन, विकास संबंधी विकार और बांझपन की समस्या हो सकती है।

किसानों, खेतिहर मजदूरों, गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को इन रसायनों से अधिक खतरा होता है। खेती में उपयोग किए जाने वाले इन रसायनों के प्रभाव से होने वाली मौतें दुनिया में सभी कारणों से होने वाली मौतों का 16 प्रतिशत है। यह मलेरिया, टी.बी. और एच.आई.वी (एड्स), तीनों को मिलाकर होने वाली कुल मौतों से तीन गुना अधिक है और युद्ध तथा अन्य प्रकार की हिंसा से होने वाली मौतों से 15 गुना अधिक। एक अनुमान के अनुसार विषाक्त प्रदूषण असामयिक मृत्यु का अकेला सबसे बड़ा कारण है। एक तरह से समूची पृथ्वी को हमने जहरीले गैस चैंबर में बदल दिया है। इसके अलावा कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि और जलस्रोत प्रदूषित होते हैं, जैव-विविधता घटती है, कीटों के प्राकृतिक शत्रु नष्ट होते हैं और भोजन की पोषण-क्षमता कम हो जाती है। वर्ष 2014 में हुए विश्व की 452 कीट-प्रजातियों के अध्ययन में पाया गया कि पिछले 40 वर्षों में कीटों की आबादी में 45 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी। अमरीका की कृषि-भूमि मधुमक्खियों जैसे कीटों के लिए अब 48 गुना अधिक जहरीली हो गई है।

इस जहर से लाखों प्रजातियां विलुप्त होने की स्थिति में हैं और प्रतिदिन 200 प्रजातियां समाप्त हो रही हैं।  कंपनियां किसानों में यह भ्रम फैला पाने में सफल रही हैं कि इन रसायनों और ‘अनुवांशिक रूप से परिवर्तित बीजों’ (जीएम) के बिना खेती संभव नहीं है। इस दुष्चक्र ने किसानों को कर्ज के जाल में फंसाकर आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया है। मध्यप्रदेश में किसानों द्वारा आत्महत्या डरावनी व स्तब्ध करने वाली है। लोकसभा में 2018 में कृषिमंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़े दर्शाते हैं कि किसान आत्महत्या के मामले में पूरे देश में मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है। इन कंपनियों ने खाद्य आपूर्ति पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है जिससे गैर-संक्रामक बीमारियों, जैसे-हृदय व रक्तवाहिनियों संबंधी रोग, मधुमेह, कैंसर और दीर्घ अवधि के श्वास संबंधी रोग तेजी से फैल रहे हैं। इनमें ज्यादातर का संबंध बाजार के खाद्य-उद्योग के अस्वास्थ्यकर आहार से जुड़ा पाया गया है। ‘भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान’ के अनुसार भारत में लगभग 1300 लोग प्रतिदिन कैंसर से मरते हैं। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में मधुमेह के 10.1 करोड़ रोगी हो जाएंगे। इन सारी बातों से हम समझ सकते हैं कि कैसे भोपाल की त्रासदी का परोक्ष रूप से पूरे देश में विस्तार हो गया है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के विशेष प्रतिवेदक की वर्ष 2019 में ‘मानवाधिकार और हानिकारक पदार्थ एवं विषाक्त कचरे’ पर सामान्य सभा के सामने प्रस्तुत रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह बात विशेष जोर देकर समझाई गई है कि विषाक्त पदार्थों को रोकना हर देश का कर्त्तव्य है। जहर युक्त खाद्य पदार्थों की रोकथाम से जीवन तथा स्वास्थ्य का अधिकार, आत्म-सम्मान व गरिमा युक्त जीवन तथा शरीर की अखंडता आदि मुद्दे जुड़े हैं। रसायन-मुक्त खेती से हम बीज-स्वराज, अन्न-स्वराज, भू-स्वराज व जल-स्वराज के साथ-साथ किसान को आत्महत्या व कर्ज से मुक्ति दिला सकते हैं। भोपाल गैस त्रासदी में जीवन गंवाने वालों को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

 

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