लक्ष्य से भटका शिक्षक नेतृत्व

संसार राणा 

लेखक, हमीरपुर से हैं

हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में भी कर्मचारी राजनीति का बहुत बड़ा स्थान तथा योगदान रहा है। यहां कर्मचारी राजनीति का एक प्रमुख घटक हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ रहा है जो कि सभी वर्गों के अध्यापकों का प्रतिनिधित्व करता है। वर्ष 1954 में इसके गठन के बाद से ही यह प्रदेश के अध्यापकों के साथ-साथ अन्य सभी कर्मचारियों के लिए भी एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाता रहा है…

राजनीति एक महान कार्य है बशर्ते इसमें जनहित तथा समाजहित को नेतृत्व करने वाले लोगों के स्वहित पर प्राथमिकता मिले। फिर चाहे बात दल आधारित मुख्यधारा की राजनीति की हो या फिर समाज के विभिन्न घटकों जैसे कर्मचारी, मजदूर, किसान, छात्र इत्यादि के संघों व संगठनों द्वारा की जाने वाली राजनीति की। विभिन्न दलों, संघों या संगठनों द्वारा की जाने वाली स्वच्छ राजनीति संबंधित दल, संघ या संगठन के सदस्यों के आचार-व्यवहार, जीवन-यापन तथा कार्य-निष्पादन को तो बेहतर बनाती ही है, साथ ही साथ समाज के ऊपर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में भी कर्मचारी राजनीति का बहुत बड़ा स्थान तथा योगदान रहा है। यहां कर्मचारी राजनीति का एक प्रमुख घटक हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ रहा है जो कि सभी वर्गों के अध्यापकों का प्रतिनिधित्व करता है। वर्ष 1954 में इसके गठन के बाद से ही यह प्रदेश के अध्यापकों के साथ-साथ अन्य सभी कर्मचारियों के लिए भी एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाता रहा है।

1960 तथा 1970 के दशक में लंबे संघर्ष चलाकर अध्यापकों के लिए अच्छे वेतनमान, अच्छी सेवा शर्तें व नीतियां तथा ढेरों अन्य सुविधाएं दिलवाने में हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ  सफल रहा है। यह सब 1960 व 1970 के दशक में संघ द्वारा लड़े गए संघर्षों की बदौलत ही है। इन संघर्षों में संघ के नेतृत्व में अध्यापकों ने कई तरह के उत्पीड़न को सहते हुए अनेक कुर्बानियां दी हैं, परंतु हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ से संबंधित पिछले दिनों घटित घटनाक्रम बहुत  ही दुर्भाग्यपूर्ण है जिससे समस्त शिक्षक जगत हतप्रभ रह गया है। संघ दो गुटों में बंट गया है। आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और वे भी अति गंभीर प्रकृति के, एक-दूसरे के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करवाने की धमकियां दी जा रही हैं। दोनों तरफ  से संघ से निष्कासन के फरमान  सुनाए जा रहे हैं।

शिक्षक समुदाय ठगा सा महसूस कर रहा है। यह सब उस समय हो रहा है जब शिक्षक समुदाय के सामने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पदोन्नति पाने, प्राथमिक स्तर पर अध्यापकों के पर्याप्त पद सृजित करवाने, रिक्त पद भरवाने, पुरानी पेंशन स्कीम बहाल करवाने, आउटसोर्स, पीटीए, पैरा, कम्प्यूटर इत्यादि अध्यापकों को नियमित करवाने जैसी मांगें तथा समस्या मुंहबाय खड़ी हैं। इस स्थिति में जहां जरूरत थी अध्यापकों की एकता व एकजुटता को सुदृढ़ करने की, सबसे बड़ा और पुराना अध्यापक संघ स्वयं बिखराव का शिकार हो रहा है। जब तक मामला न्यायालय में लंबित रहता है, शिक्षक समुदाय अपने हकों से एक या दूसरे बहाने वंचित रहने के लिए मजबूर होगा। यदि वास्तव में ऐसा होता है तो यह शिक्षक तथा शिक्षा जगत की बेहतरी के लिए संघ के पूर्व नेतृत्व द्वारा दी गई हर तरह की कुर्बानियों पर पानी फेरने जैसा होगा। यह सब शिक्षा, शिक्षण, शिक्षक तथा शिक्षार्थी को अंधेरे गर्त की ओर धकेलने का काम ही करेगा। सवाल उठता है कि यह सब क्या अचानक ही हो गया। उत्तर नहीं में है। जो कुछ आज हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ के बारे में देखने व सुनने को मिल रहा है, उसके बीज कोई एक दशक पहले से ही बोने शुरू हो गए थे। पदलोलुपता को बढ़ावा मिल रहा था तथा इसके लिए हर तरह के गलत हथकंडे जैसे फर्जी सदस्यता, फर्जी वोटिंग इत्यादि अपनाए जाने के बारे में सुनने को मिलता रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्यस्तरीय चुनावों में विभिन्न जिलों से आए अध्यापक प्रतिनिधियों के साथ उन्हें चुनाव स्थल तक अपनी टैक्सी में लेकर आए चालकों से भी वोट डलवाने के आरोप लगते रहे हैं। इसी दौरान ऐसा भी हुआ कि परिस्थितिवश कुछ ऐसे अध्यापकों को राज्य तथा जिला स्तर पर संघ का नेतृत्व करने का मौका मिल गया जिनका न तो संघ के लिए और न ही शिक्षक हित के लिए विशेष तो क्या, साधारण योगदान भी नहीं था।

सर्वविदित है कि ये तथाकथित नेता संघ को अपने हित साधने के मंच के रूप में प्रयोग करते रहे। तबादले करवाना एक मुख्य गतिविधि बन गई। इसके लिए राजनेताओं तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों से नजदीकियां बनाना शान की बात समझा जाने लगा। संघ के एक अन्य सम्माननीय पूर्व नेता के अनुसार आजकल संघ के नेतृत्व में कुछ ऐसे अध्यापक आ गए हैं जिन्हें अपना प्रभाव दिखाने के चक्कर में अगर किसी अधिकारी या राजनेता की कार की डिक्की में भी बैठना पड़े तो वे इससे गुरेज नहीं करेंगे।  अभी भी सब कुछ लुटा नहीं है। सही कदम उठाकर सही दिशा में बढ़ने में कभी देर नहीं होती है। दोनों गुटों के नेतृत्व को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वह एक बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

उसकी मान्यता तथा स्वीकार्यता सरकार या शिक्षा विभाग द्वारा उसके पक्ष में जारी किसी पत्र में नहीं बल्कि शिक्षक समुदाय के हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ के प्रति विश्वास तथा सम्मान में है। दोनों गुटों में बंटे संघ के हर सदस्य को अपने-अपने नेतृत्व  पर दबाव बनाना चाहिए कि जिस रास्ते पर वह निकल पड़ा है, पीछे हटे। दोनों ही गुटों के नेतृत्व को चाहिए कि शीघ्रातिशीघ्र एक मंच पर आकर सभी तरह के मतभेद सुलझाएं।

वक्त की मांग है कि वह हरेक व्यक्ति जो हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ तथा शिक्षा जगत का हितैषी है, वह संघ की छवि व प्रतिष्ठा को तार-तार होने से बचाने के लिए अपना योगदान दे अन्यथा शिक्षक समुदाय की आने वाली पीढि़यां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

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