वीर चक्र की वीर गाथा

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

वीरभूमि हिमाचल जिसकी धरा ने देश के सैन्य क्षेत्र में अनेक शूरवीर रणवांकुरे दिए जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में जान दांव पर लगाकर अपने पराक्रम की कई मिसालें पेश करके अपनी शौर्यगाथाओं से सैन्य इतिहास के कई सुनहरे पन्ने भर दिए। 3 दिसंबर 1971 को पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने भारत के 11 हवाई ठिकानों पर हवाई हमले करके युद्ध का ऐलान कर दिया था। निःसंदेह 1971 के युद्ध का मुख्य महाज पूर्वी पाकिस्तान व मौजूदा बांग्लादेश था, लेकिन आजादी के बाद भारत-पाक के बीच हुए युद्धों में पाक सैन्य हुक्मरानों ने जम्मू-कश्मीर को हथियाने की हसरत कभी नहीं छोड़ी और भारतीय सेना के जांबाजों ने तमाम सैन्य अभियानों में पाक सेना को उसकी हिमाकतों का मुहतोड़ जबाब देकर बुरी तरह पस्त करके उसकी हैसियत व औकात का ऐहसास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी इसी युद्ध से जुड़ी एक वीरगथा 5 दिसंबर 1971 की रात की है जब पाक सेना ने 1965 के युद्ध की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर को हथियाने की मंसूबाबदी को अंजाम देने के लिए भारत की पश्चिमी सीमा पर छम्म सेक्टर से अखनूर की तरफ भारतीय सीमा में अपनी टैंक रेजिमेंट के साथ हमला बोल दिया था। छम्म सेक्टर को पाक सेना भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ का द्वार मानती है पाक सेना के उस घातक टैंकों के हमले का सामना करने के लिए सरहद पर भारतीय सेना के 9 डक्कन हॉर्स के आर्म्ड ट्रूप का नेतृत्व अनुभवी योद्धा रिसालदार ब्रह्मनंद राणा कर रहे थे जिन्होंने उस मोर्चे से पीछे हटने के बजाय अपने फौलादी इरादों से अपने सैनिक दस्ते के साथ मिलकर पाक सेना के उस घातक आक्रमण पर जोरदार काउंटर अटैक करके अपने अचूक प्रहारों से पांच पाकिस्तानी टैंक वहीं तबाह करके दुश्मन की सेना को न सिर्फ  स्तब्ध कर दिया बल्कि पाक सेना पर किसे गए मुफीद पलटवार से उनकी पूरी रणनीति को ध्वस्त कर दिया दुश्मन के कुछ टैंकों ने वापस पाक सीमा का रुख किया जिसके चलते अखनूर पुल को कब्जाने निकली पाक तानाशाह आगा याहिया खान की सेना के ख्वाब हकीकत में तबदील नहीं हुए। इस युद्ध के उच्च दर्जे के सैन्य नेतृत्व व निर्भिकता से दुश्मन को नेस्तानाबूत करके अदम्य साहस के प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने रिसालदार ब्रहमनंद राणा को ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया था। हिमाचल के उस जांबाज योद्धा का संबंध पालमपुर से था हालांकि 1971 के युद्ध से पहले इन्होंने देश के लिए तीन बड़े युद्धों में भी भाग लिया था। इस युद्ध में भारतीय शीर्ष सैन्य नेतृत्व की रणनीति के आगे पाक सैन्य पैरोकारों की युद्धनीति बौनी साबित हुई। 3 दिसंबर 1971 को पाक सेना द्वारा भारत के खिलाफ  युद्ध के आगाज को भारतीय सेना ने अपने अलग अंदाज से अंजाम तक पहुंचाया था जब पाक सेना भारतीय सैन्य पराक्रम तथा रणनीति के चक्रव्यूह में घिर जाने के बाद 16 दिसंबर 1971 के युद्ध के महज 13वें दिन घुटनों के बल बैठ गई थी। इसके अलावा उनके पास दूसरा विकल्प भी नहीं था। बांग्लादेश में ढाका का ‘रामना रेसकोर्स गार्डन’ भारतीय सेना की उस ऐतिहासिक विजय के क्षणों का गवाह बना जब पूर्वी पाकिस्तान के पाक सैन्य कमांडर ले.ज. आमिर अब्दुल्ला नियाजी ने भारतीय सेना की पूर्वी कमान के प्रमुख तथा इस युद्ध के महानायक ले.ज. जगजीत सिंह अरोड़ा ‘पंजाब रेजिमेंट’ के समक्ष 93 हजार पाक सैनिकों ने युद्धबंदियों के रूप में हथियार डाल दिऐ थे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इतने बड़े पैमाने का वो दूसरा बड़ा आत्मसमर्पण तथा इतनी सीमित अवधि में लड़े गए युद्ध में पहला मौका था जब किसी देश की सशस्त्र सेना ने इतनी बड़ी तादाद में हथियार डाल दिए थे। उस युद्ध के अंजाम तथा उसकी ऐतिहासिक विजय की शौर्यगाथा को शब्दों या तकरीरों से बयां करने की जरूरत नहीं पड़ी। पाक सेना के सिरेंडर की जिल्लतभरी तस्वीरों ने भारतीय सैन्य पराक्रम की लड़ाकू ताकत व युद्ध क्षमता तथा शौहरत का दुनिया को तफसील से पैगाम दे दिया। हिंद की सेना ने पाक सेना से पूर्वी पाकिस्तान छिनकर उसे दुनिया के मानचित्र पर नए मुल्क बांग्लादेश के रूप में पहचान दे दी थी मानों बांग्लादेश की अ्वाम को पाक सेना की सितमगिरी से अपनी आजादी के उन सुनहरे लम्हों का मुद्दतों से इंतजार था। भारत के तत्कालीन सियासी नेतृत्व को कमतर आंकना पाक सिपहसालारों की भारी जहालत साबित हुआ। पाक के साथ उसके सहयोगी देशों को भी विश्व समुदाय के समक्ष फजीहतों का ही सामना करना पड़ा। 16 दिसंबर पाकिस्तान को उसके तकसीम की न भूलने वाली तारीख है। युद्ध की शर्मनाक शिकस्त ने पाक सेना के जहन में खौफ  पैदा करके उसके हुक्मरानों के मनोबल पर भी गहरा आघात किया जिसके सदमें से उसके पैरोकार आजतक नहीं उबरे। 1971 युद्ध के उपजे जख्मों की टीस उन्हें लंबे समय तक महसूस होती रहेगी। इस युद्ध के परिणाम से पाक के सुल्तानों को इस बात का इल्म हो गया कि प्रत्यक्ष युद्ध में पाक सेना भारतीय सैन्यशक्ति के आगे कभी नहीं टिक सकती। बहरहाल, इस युद्ध में भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशा, ब्रिगेडियर जैकब, मे.ज. गंधर्व नागरा तथा ले.ज. जगजीत सिंह अरोड़ा मुख्य रणनीतिकार थे। काबिलेगौर रहे चारों शीर्ष सैन्य अधिकारी अलग-अलग धर्म समुदाय से थे मगर उससे पहले वे भारतीय सैनिक थे। इस युद्ध में 3843 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे जिनमें 195 शहीद जांबाजों का संबंध हिमाचल से था। वीरभूमि के रणवांकुरों ने 3 महांवीर चक्र, एक शौर्य चक्र, 18 वीर चक्र तथा 22 सेना मेडल अपने नाम करके राज्य को अपने शौर्य से गौरवान्वित किया था। अतः लाजिमी है कि युद्ध के विजय दिवस के अवसर पर राष्ट्र 1971 के उन योद्धाओं की अजीम कुर्बानियों को याद करें जिन्होंने उस शदीद जंग की तारीख अपने रक्त से लिखने में मजीद किरदार अदा करके पाकिस्तान का भूगोल बदली करके बांग्लादेश को तामीर किया था। पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांटकर उसके तकसीम की पटकथा लिखने की कुवत सिर्फ भारतीय सेना के मिजाज में थी और है। अपना आजादी दिवस मनाने वाले बांग्लादेश की आवाम को युद्ध के रक्तरंजित इतिहास से अवगत होना चाहिए। विजय दिवस पर देश युद्ध के जांबाजों को शत-शत नमन करता है।

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