‘श्री शालग्राम चरितम्’ के पीछे की अंतःप्रे्ररणा

पुरस्कृत साहित्यकारों की रचनाधर्मिता : 4

प्रो. केशव राम शर्मा

मो.-9418133268

श्री शालग्राम शर्मा संस्कृत के महान विद्वान थे। विद्वता के अतिरिक्त उनके अन्य उत्कृष्ट गुणों के कारण उन्हें हिमाचल का समाज एक आदर्श महापुरुष मानता था। मुझे उनके संपर्क में रहने का अवसर मिला और हृदय में अगाध श्रद्धा थी। उनके दिवंगत होने तक मैं पर्याप्त संस्कृत ग्रंथ लिख चुका था। ऐसे महान व्यक्ति को चिरस्थायी रूप देने के लिए मेरी अंतः प्रेरणा ने मुझे उनके जीवन और योगदान के विषय में प्रस्तुत महाकाव्य (श्री शालग्राम चरितम्) रचने के लिए प्रेरित किया। कुछ उन्हीं से सुने हुए, कुछ उनके पुत्र श्री डा. हरिदत्त शर्मा द्वारा बताए उनके जीवन तथा कुछ स्वयं अनुभव में आए तथ्यों के आधार पर मैंने पर्याप्त श्रम द्वारा ग्रंथ को संपन्न किया। जीवन के ऊबड़-खाबड़ पथ पर चलते हुए कई अस्वास्थ्यकर एवं विषम परिस्थितियों के बावजूद अपनी अटूट लग्न और निष्ठा द्वारा यह कार्य पूरा किया। लेखक लिख तो लेता है, पर प्रकाशन कार्य में जो संघर्ष करना पड़ता है उसे वही जान सकता है जो भुक्तभोगी हो। स्तरीय प्रकाशन के लिए सुदूर दिल्ली की अनेक यात्राएं करनी पड़ीं तो इस उक्ति की सार्थकता समझ में आई कि ‘दिल्ली दूर है’। आर्थिक सहयोग केवल आश्वासन तक सीमित रहा। लगभग साठ हजार की अर्थराशि द्वारा ग्रंथ छपा। संस्कृत ग्रंथ की यह विडंबना कि- खरीदने वाले पाठक नहीं मिलते, मुझे भी झेलनी पड़ी। अतः पुरस्कार के रूप में हिमाचल अकादमी का सहयोग मेरी असीम कृतज्ञता का विषय है। इस महाकाव्य का विमोचन उस महापुरुष के पैतृक आवास ग्राम कोडरा, तहसील बंगाणा, जिला ऊना (हि.प्र.) में संस्कृत अकादमी तथा उनके परिवार के सहयोग  से एक विशाल समारोह में हुआ। उसमें प्रदेश तथा दिल्ली के सैकड़ों विद्वान उपस्थित रहे। उनका मैं आभारी हूं। इस ग्रंथ को पूरे भारत में पढ़ा गया और सराहा भी गया। मुझे प्रयाग, काशी आदि विद्वानों के गढ़ों में ‘महामहोपाध्याय’ और ‘अभिनव कालिदास’ जैसी प्रतिष्ठित उपाधि व सम्मानों की प्राप्ति में इस रचना का भी हाथ है, यही उपलब्धि मेरे लिए उत्साहवर्द्धक और पर्याप्त है।

हाल ही में हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने साहित्यकार गंगाराम राजी, बद्री सिंह भाटिया, प्रो. केशव राम शर्मा, इंद्र सिंह ठाकुर, प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल तथा सरोज परमार को साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा की। इन साहित्यकारों की पुरस्कृत रचनाओं के प्रति रचनाधर्मिता क्या रही, संघर्ष का जुनून कैसा रहा, अपने बारे में साहित्यकारों का क्या कहना है तथा अन्य साहित्यकार व समीक्षक इनके बारे में क्या राय रखते हैं, इसी का विश्लेषण हम इस नई सीरीज में कर रहे हैं। पेश है इस विषय में प्रतिबिंब की चौथी और अंतिम किस्तः

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