सरोज परमार पर टिप्पणियों का शेष भाग

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न सरोज परमार हिंदी की वरिष्ठ विभूतियों में गणनीय ऐसी कवयित्री हैं जिनका काव्य-लेखन उत्कृष्टता के स्तर को स्पर्श करता है। इनकी कविताएं जितनी सरल, सहज हैं, अपने प्रभाव में उतनी ही व्यंजक हैं। घर, सुख और आदमी, समय से भिड़ने के लिए तथा मैं नदी होना चाहती हूं – इनके बहुचर्चित काव्य संग्रह हैं। ‘मैं नदी होना चाहती हूं’ काव्य संग्रह के माध्यम से कवयित्री जनसरोकारों से मुखातिब हैं। तीखे तेवरों से लैस कविता में कहीं स्वीकार हैं, कहीं विषाद, कहीं गहरा प्रतिरोध-नाराजगी और विक्षोभ कवि मन में उतरकर मुकम्मल शक्ल में पहुंचे हैं…तुम्हारी पेशानी पर खुदी हैं चिंताएं, तुम्हारी आंखों में उबलता हुआ लावा, तुम्हारे भिंचे हुए जबड़े, तुम्हारे आक्रोश को जाहिर करने के लिए काफी हैं। सरोज परमार के कविता संसार और उसमें विन्यस्त समाज की व्याप्ति को किसी भौगोलिक सीमा में आंकना संभव नहीं। सरोज के कवि समय में कवि स्वर, स्वप्नों में घर, आंगन, परिवार, नदी, मछली, आंधी, बारिश, बर्फ, पुलवामा, घडि़याल, सैलानी, जूते, इबारतें, चाय बागान, पोस्टर, लद्दूघोड़ा, यीशू, परिंदे, पहाड़, सभ्यता, प्रकृति-विकृति, मूल्य ध्वंस, निर्माण बाजार, पयार्वरण…विशाल विशाल फैला हुआ परिदृश्य जो कविताओं में बिखरा पड़ा है…इन सब के मध्य गुजरता प्रश्नाकुल लेखन कहीं सहज, कहीं वक्र, कही व्यंग्य, कहीं शिकवे, कहीं उलाहना, कहीं संदेश, कहीं संवाद, कहीं विवाद करता समकालीन जीवन के मूल्य लोपी मरुस्थलों के मध्य ऐसे सपनों को टांकने का उद्यम भी करता है जिसके फलीभूत होने पर बराबर टकटकी सभ्यता लगाए हुए है। भले ही हमने नए रास्ते नहीं बनाए, पर खोजा है उन गुम हुए रास्तों को जिनके मील पत्थर तक गुम हो गए हैं, हमारे पुरखों के कदमों से रौंदी हुई ये राहें मंजिल का पता जानती हैं। कविता का रचाव उस डूबते जहाज को बचाने के उपक्रम जैसा है जिसमें हमारा समय, मूल्य, संकल्प, संबंध,  संघर्ष, इतिहास जिस शक्ल में है, जैसे भी है, सब लदे फदे हैं…मजमों में निरंतर तालियां पीटते, हम अगली पीढि़यों को धकेल रहे हैं, अभावों की भट्टी में। परिवेशगत यह तल्खी, यह सख्ती सूचित कर रही है कि कविता अंततः मूल्य संरक्षण और मूल्य रचाव का व्यापार है। कवयित्री का मनपसंद विषय स्त्री विमर्श जाने-पहचाने मध्यवर्गीय इतर-बितर बिखरे अवशेषों के मध्य आवाजाही करता हुआ आत्मविमुग्ध है। प्रस्तुत काव्य संग्रह पर हिमाचल अकादमी का पुरस्कार मात्र एक प्रेरक परैन है, जो आपको शिखरों का स्पर्श करने में महती भूमिका निभाएगा। शत-शत नमन्।                         — डा. आशु फुल्ल, समीक्षक

सरोज परमार जी से पहले पहल संपर्क लगभग सहत्तर के दशक में अंतर-महाविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के आयोजनों के बीच भाग लेने के समय हुआ। बतौर हिंदी प्राध्यापिका वहां होने वाले सभी कार्यक्रमों के आयोजनों के संपन्न करवाने के उत्तरदायित्व को निभाते उनके भीतर विद्रोही एवं संवेदनशील साहित्यकार, कलमकार से भी साक्षात्कार हुआ। प्रकृति से लिए अनेकोंनेक बिम्बों के प्रयोग से समाज में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों, रीतियों, रूढि़यों, कुरीतियों भरी व्यवस्था पर प्रहार कर उनका निदान व उपचार ढूंढने में उनके भीतर का कलमकार सदैव समर्पित दिखा। समाज की उस वेदना, भेदभावपूर्ण रवैये को स्वयं अनुभूत कर मुखर किया। ‘मैं नदी होना  चाहती हूं’ कविता संग्रह सरोज परमार की उत्कृष्ट कृति है जिसके लिए उनको इस वर्ष पुरस्कृत भी किया गया है। उनकी रचनाओं में सदैव एक नैरंतर्य, वेग एवं भावनाओं का निर्मल प्रवाह बहता सा प्रतीत होता है। विलक्षण प्रतिभाओं व संभावनाओं की स्रोत सरोज परमार जी के स्वास्थ्य की मंगल कामना के साथ ताकि कलम का पैनापन व धार निरंतर बनी रहे।

— शक्ति चंद राणा ‘शक्ति’, समीक्षक

You might also like