ईरान, अमरीका और भारत

कर्नल (रि.) मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

तीन जनवरी को अमरीका ने ईरान के कुछ सैन्य ठिकानों पर हवाई हमला कर उसे नुकसान पहुंचाया, जिसमें ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का जनरल कासिम सुलेमानी भी मारा गया। जनरल सुलेमानी को ईरान में राष्ट्रपति के बाद दूसरे नंबर के रूप में जाना जाता था अपितु वह ईरान के सबसे प्रसिद्ध नेता या अधिकारी था, इसका प्रमाण उनकी अंतिम यात्रा में पहुंचे हजूम से पुख्ता होता है। इसके प्रतिरोध में 8 जनवरी को ईरान ने अमरीका पर भी करीब 12 बैलेस्टिक मिसाइल दाग दी और लगभग 80 अमरीकी सैनिकों की मौत का दावा किया, जबकि इसको अमरीका ने यह कहकर नकार दिया कि उन्हें किसी भी तरह कोई नुक्सान नहीं हुआ है। ईरान और अमरीका के बीच की तल्खी 1953 में शुरू हुई थी और पिछले 65 साल में दोनों के रिश्तो की कड़वाहट जग जाहिर है। 2015 में अमरीका के तब राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ एक परमाणु संधि की थी, जिससे दोनों देशों के बीच रिश्ते कुछ मधुर हुए थे, पर मई 2018 में वर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बिना किसी पुख्ता कारण के ईरान को इस संधि से बाहर करने की घोषणा कर दी, उसके बाद दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ती गई। अमरीका का  ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को एक आतंकवादी संगठन घोषित करना, ईरान द्वारा अमरीका के एक ड्रोन को बर्बाद करना, सऊदी अरब के तेल रसायन संयंत्र पर हमला, जिसके लिए अमरीका ईरान को दोषी मानता है और उसके बाद ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की मौत। अगर सारे तथ्यों का ढंग से आकलन किया जाए तो यह सब उसी तरह से इतिहास दोहराया जा रहा है जिस तरह से जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति काल में अमरीका ने सद्दाम हुसैन के शासन को खत्म करने के लिए इराक के साथ किया था। मध्य एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से पूरा विश्व दो समूहों में बंटता दिख रहा है, जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आहट सुनाई दे रही है। अगर यह तनाव बढ़ जाता है तो भारत किसका साथ देगा, यह तय करना बड़ा मुश्किल होगा। भारत अधिकतम तेल मध्य एशिया से आयात करता है, दूसरा बहुत सारे भारतीय मध्य एशिया में जैसे सऊदी अरेबिया, कुवैत, ईरान, इराक तथा अन्य देशों में मजदूरी या घरेलू कर्मचारी के रूप में काम कर रहे हैं जिनको वहां से निकालना भारत के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज होगा। दूसरी तरफ  भारत के रिश्ते अमरीका के साथ भी बहुत सुदृढ़ हैं और इस समय भारत अमरीका का साथ भी नहीं छोड़ सकता। ऐसी स्थिति में यह दोनों ही देश भारत के लिए बहुत अहम हैं। इस सब के आकलन के बाद ही भारत ने दोनों देशों को हर मसले को शांतिपूर्ण हल करने की सलाह दी है और शायद ऐसा करने से न केवल इससे भारत का फायदा होगा बल्कि इन दोनों देशों के साथ-साथ यह सुझाव विश्व शांति के लिए भी आवश्यक होगा।

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