कड़ी मेहनत ने दूसरे प्रयास में ही बना दिया एचएएस अफसर

Jan 8th, 2020 12:22 am

प्रोफाइल

नाम  : आदित्य बिंद्रा

पिता : स्वर्गीय श्री देवेंद्र बिंद्रा

माता : श्रीमती मधु बिंद्रा

जन्म तिथि : 13 अप्रैल, 1994 (अविवाहित)

शिक्षा : जमा दो तक की शिक्षा सेंट एडवर्ड स्कूल शिमला, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, एनआईटी हमीरपुर से बीटेक सिविल इंजीनियर गोल्ड मेडलिस्ट

बैच : एचएएस मार्च, 2019 

अब तक किन-किन पदों पर काम

अगस्त 2019 में प्रथम नियुक्ति जिला सिरमौर जिला खाद्य आपूर्ति नियंत्रक

उपलब्धियां

 सिरमौर में खाद्य आपूर्ति अधिकारी के पद पर रहते हुए  मात्र तीन माह में उनके नेतृत्व में हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना के तहत 21 हजार 496 गैस कनेक्शन वितरित हो गए हैं, जबकि उनकी ज्वाइनिंग के दौरान यह आंकड़ा मात्र 2301 का था।

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े काके लागो पाए, बलिहारी गुरुआपनो, गोबिंद दियो बताए।

गुरु की  महता को दर्शाती इन पंक्तियों को मूलमंत्र की तरह लेते हुए युवा, एचएएस आफिसर आदित्य बिंद्रा ने छोटी उम्र में ही बड़ा मुकाम हासिल किया है। माता-पिता की इकलौती संतान आदित्य बिंद्रा हिमाचल प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी तथा पिता के आशीर्वाद तथा आदर्श वाक्य, ‘गो अहेड पीछे मुड़ कर मत देखो’  ने इस मुकाम तक पहुंचाया है। युवा अधिकारी आदित्य बिंद्रा ने जिला खाद्य आपूर्ति नियंत्रक के तौर पर जब जिला सिरमौर में पहली पोस्टिंग ली, तो पिता इस पल को देखने के लिए दुनिया में नहीं रहे। 26 वर्षीय युवा अधिकारी आदित्य बिंद्रा ने पिता के हृदयरोग के दौरान भी उनकी सीख के अनुसार अपनी पढ़ाई को जारी रखा तथा दूसरे ही अटैम्पट में एचएएस एग्जाम में सातवें रैंक में पास कर दिया। यही नहीं, युवा अधिकारी आदित्य बिंद्रा एक रिसर्चर रहे हैं, जिन्होंने सॉयल मैकेनिक्स की जियो टेक्नीकल इंजीनियरिंग में रिसर्च किया है। वह सिविल इंजीनियरिंग की बीटेक में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। हमीरपुर के राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में गोल्ड मेडल हासिल करने वाले आदित्य बिंद्रा ने रिसर्च और साइंस विषयों के बावजूद एचएएस के 14 विषयों को पास कर लोक सेवा आयोग की परीक्षा में झंडे गाड़े हैं। युवाओं को संदेश देते हुए युवा अधिकारी कहते हैं कि केवल सेवाभाव से ही  इस क्षेत्र में आना चाहिए, न कि अधिकारी पद के आकर्षण से ऐसा करने से ही सच्ची सेवा और लोगों के दुख तकलीफों को दूर किया जा सकता है। उनका कहना है कि एक अधिकारी सरकार और जनता के बीच की ऐसी दोहरी कड़ी होता है, जिस पर अधिक दायित्व दोतरफा रहता है।

मुलाकात :गंभीरता से की गई पढ़ाई से आप बिना कोचिंग भी सफल हो सकते हैं…

प्रशासनिक अधिकारी बनने का क्या मतलब होता है?

प्रशासनिक अधिकारी बनने का अर्थ है कि आपको सरकार और जनता के बीच में दोहरी जिम्मेवारी को निभाना होता है। सरकार की कल्याणकारी नीतियों को अधिकारियों के माध्यम से ही जमीन पर उतारना होता है। लिहाजा समाज के अंतिम आदमी तक उन कल्याणकारी नीतियों का लाभ पहुंचे, यह दोहरी जिम्मेदारी एक प्रशासनिक अधिकारी की रहती है।

आपने स्कूली शिक्षा, कालेज तथा विश्वविद्यालय की पढ़ाई कहां से पूरी की?

स्कूली शिक्षा सेंट एडवर्ड स्कूल शिमला से ही हुई है, यहां पर जमा दो की शिक्षा नॉन मेडिकल से की, वहीं एनआईटी हमीरपूर से बीटेक सिविल इंजीनियरिंग गोल्ड मेडल के साथ हासिल की। वहीं सॉयल मेकेनिक में रिसर्च भी किया। जर्मनी में रह कर यह कार्य किया।

खुद पर कितना विश्वास है और इसकी ताकत कहां से आती है। पढ़ाई की उपलब्धियां क्या रहीं?

माता-पिता के आशीर्वाद, सच्चाई, दृढ़ निश्चय, गुरु के वचनों को अमल करते हुए आत्मविश्वास से भरा हूं। नैतिकता और सच्चाई से कार्य करने से ही खुद पर विश्वास बना रहता है। पढ़ाई को कभी बोझ समझ कर नहीं किया। यही वजह रही कि स्कूल से ही टॉपर रहकर एचएएस परीक्षा में सातवां रैंक हासिल किया है।

कितने प्रयास के बाद एचएएस के लिए चुने गए और इसके पीछे प्रेरणा?

केवल दूसरे प्रयास में ही हिमाचल लोक सेवा आयोग की परीक्षा को क्रेक किया है। हालांकि पहले प्रयास के दौरान पिता को हृदयरोग के चलते दिल्ली एम्स में रहना पड़ा, तो बीच में ही परीक्षा छोड़नी पड़ी, मगर दूसरे प्रयास में यह परीक्षा पास कर ली।

यह कब और कैसे सोचा कि एचएएस अधिकारी ही बनना है?

पिता का सपना था कि उनका इकलौता बेटा प्रशासनिक अधिकारी बने, लिहाजा उनके अंतिम दिनों के वाक्य..‘गोे अहेड,पीछे मुड़ कर मत देखो’ ने इस मुकाम पर जाने के लिए मंत्र का काम किया।

आपने एचएएस परीक्षा के लिए क्या विषय चुने ?

हिमाचल लोक सेवा आयोग की परीक्षा को पास करने के लिए इंग्लिश साहित्य को मूल विषय रखा। चूंकि पिता हिमाचल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे, तो उनकी गोद से ही यह विषय सीखा है।

सामान्यतः यहां तक पहुंचने के लिए आपकी दिनचर्या क्या रही?

जब एक प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया, तो घर पर पढ़ाई के अलावा कुछ भी ध्यान नहीं दिया। भले ही सुबह लेट उठता था, मगर उसके बाद 14 घंटे की लगातार पढ़ाई की। खुद ही खाना बनाकर पढ़ाई में डट जाता था, क्योंकि इस परीक्षा के लिए 14 विषयों को पढ़ना होता है। मैं साइंस स्टूडेंट रहा तो समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, जीके इत्यदि विषयों को पढ़ने के लिए समय चाहिए था।

परीक्षा की तैयारी के लिए किताबों के अलावा किस सामग्री का सहारा लिया?

प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए पढ़ी गई सामग्री के रिवीजन के साथ, जो सबसे अधिक मुझे फायदा मिला, वह था अनुभवी लोगों के साथ उनके अनुभवों को जानना। वहीं ट्रैवलिंग का शौक है, तो हिमाचल के प्रत्येक हिस्से को घूम कर भी जानकारी हासिल की। साथ ही इंटरनेट से जानकारी हासिल होती रही।

आजकल कोचिंग क्लासेज का चलन बढ़ रहा है। क्या सफलता पाने के लिए कोचिंग क्लास जरूरी है?

भले ही आज कोचिंग का चलन बढ़ गया हो, मगर ऐसा नहीं है कि बिना कोचिंग के आप प्रशासनिक परीक्षा को पास नहीं कर सकते हैं। यदि दृढ़ निश्चय और केवल पढ़ाई पर ध्यान फोकस है तो गंभीरता से स्वयं पढ़ कर भी सफल हो सकते हैं। हालांकि अब अच्छे कोचिंग सेंटर उभर कर आ चुके हैं। मार्गदर्शन लेना है या नहीं यह तैयारी कर रहे अभ्यर्थी पर डिपेंड करता है।

आपकी कार्यशैली आम अधिकारी की  तरह ही है या कि कुछ हट के है?

ईमानदारी, सत्यता और ठीक तरह से काम करते रहें, तो आपकी कार्यशैली में अपने आप एक अलग बदलाव आ जाता है। जो युवा एचएएस अधिकारी बनने का

सपना देख रहे हैं, उनके लिए आपका क्या सुझाव है?

वे युवा जो कि हिमाचल लोक सेवा आयोग की परीक्षा अथवा एचएएस की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं, उन्हें कहना चाहूंगा कि सबसे पहले दृढ़ निश्चय के साथ इस परीक्षा के लिए उतरे वहीं दूसरा जरूरी है कि त्याग होना चाहिए। यदि त्याग नहीं होगा, तो इस परीक्षा को आप सफल करने में कामयाब नहीं हो सकते हैं। मुकाम हासिल होने तक आलस्य का त्याग जरूरी है कि  जनसेवा  की भावना के साथ तैयारी करनी चाहिए। केवल प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पावर हासिल करना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए।

सुभाष शर्मा, नाहन

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