गोरखनाथ मंदिर

By: Jan 11th, 2020 12:21 am

उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मंदिर नाथ संप्रदाय का प्रमुख केंद्र है। हिंदू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है। संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देखरेख यहीं से होती है। गोरखनाथ मंदिर का निर्माण- गोरखनाथ मंदिर  में अनवरत योग साधना का क्रम प्राचीन काल से चलता रहा है। ज्वालादेवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए गोरखनाथ जी ने आकर भगवती राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में तपस्या की थी और उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहां वर्तमान में श्री गोरखनाथ मंदिर स्थित है। नाथ योगी संप्रदाय के महान प्रवर्तक ने अपनी अलौकिक आध्यात्मिक गरिमा से इस स्थान को पवित्र किया था, अतः योगेश्वर गोरखनाथ के पुण्य स्थल के कारण इस स्थान का नाम गोरखपुर पड़ा। महायोगी गुरु गोरखनाथ की यह तपस्या भूमि प्रारंभ में एक तपोवन के रूप में रही होगी और जनशून्य शांत तपोवन में योगियों के निवास के लिए कुछ छोटे-छोटे मठ रहे, मंदिर का निर्माण बाद में हुआ। आज हम जिस विशाल और भव्य मंदिर का दर्शन कर हर्ष और शांति का अनुभव करते हैं, वह ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज जी की ही कृपा से है। वर्तमान पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी महाराज के संरक्षण में श्री गोरखनाथ मंदिर विशाल आकार-प्रकार, प्रांगण की भव्यता तथा पवित्र रमणीयता को प्राप्त हो रहा है।

अखंड ज्योति- मुस्लिम शासन काल में हिंदुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केंद्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।  अठारहवीं सदी में धार्मिक कट्टरता के कारण औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया, परंतु शिव गोरख द्वारा त्रेता युग में जलाई गई अखंड ज्योति आज तक अखंड रूप से जलती हुई आध्यात्मिक, धार्मिक आलोक से ऊर्जा प्रदान कर रही है। यह अखंड ज्योति श्री गोरखनाथ मंदिर के अंतरवर्ती भाग में स्थित है।

भव्यता और रमणीयता – करीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। इसके निर्माण का श्रेय संस्कृति के कर्णधार योगीराज महंत दिग्विजयनाथ जी व उनके शिष्य वर्तमान में गोरखपीठाधीश्वर महंत जी महाराज को है, जिनके प्रयास से भारतीय वास्तुकला के क्षेत्र में मौलिक इस मंदिर का निर्माण हुआ।

मंदिर के भीतर देव प्रतिमाएं- मंदिर के भीतरी कक्ष में मुख्य वेदी पर शिवावतार अमरकाय योगी गुरु गोरखनाथ जी महाराज की श्वेत संगमरमर की दिव्य मूर्ति, ध्यानावस्थित रूप में प्रतिष्ठित है। श्री गुरु गोरखनाथ जी की चरण पादुकाएं भी यहां प्रतिष्ठित हैं, जिनकी प्रतिदिन विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। परिक्रमा भाग में भगवान शिव की भव्य मांगलिक मूर्ति, विघ्नविनाशक श्री गणेशजी, मंदिर के पश्चिमोत्तर कोने में काली माता, उत्तर दिशा में कालभैरव और उत्तर की ओर पार्श्व में शीतला माता का मंदिर है। इस मंदिर के समीप ही भैरव जी, इसी से सटा हुआ भगवान शिव का दिव्य शिवलिंग मंदिर है।

खिचड़ी मेला- प्रतिदिन मंदिर में भारत के सुदूर प्रांतों से आए पर्यटकों, यात्रियों और स्थानीय लोगों की भीड़ दर्शन के लिए आती है। मकर संक्रांति के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है जो खिचड़ी मेला के नाम से प्रसिद्ध है।

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