जलियांवाला बाग नरसंहार के खलनायक

राजेंद्र राजन

लेखक, हमीरपुर से हैं

देश की स्वतंत्रता की दिशा व दशा को तय करने में जलियांवाला बाग कांड की अहम भूमिका रही है। करीब 500 या 1000 निर्दोष लोगों की नृशंस हत्या को कौन भुला सकता है? लेकिन इस हत्याकांड के बाद की पटकथा में पंजाब, खासकर अमृतसर के बेशुमार जयचंद और मीरजाफर भी शामिल थे…

भारतीय इतिहास में जलियांवाला बाग नरसंहार एक ऐसा काला अध्याय है जिसकी स्मृतियां सौ साल के बाद भी जनमानस के दिलो-दिमाग में रची बसी हैं। जनरल डायर हमारे लिए एक ऐसा खलनायक है जिसकी क्रूरता, बर्बरता और जघन्य अपराध इतिहास के पन्नों में यूं दर्ज है मानो वह कल की ही बात हो। फिर हो भी क्यों न ब्रिटिश हुकूमत के पतन काल की नींव जलियांवाला कांड से पुख्ता हुई। देश की स्वतंत्रता की दिशा व दशा को तय करने में जलियांवाला बाग कांड की अहम भूमिका रही है। करीब 500 या 1000 निर्दोष लोगों की नृशंस हत्या को कौन भुला सकता है? लेकिन इस हत्याकांड के बाद की पटकथा में पंजाब खासकर अमृतसर के वे बेशुमार जयचंद और मीरजाफर भी शामिल थे जिन्होंने इस बलिदान का जश्न मनाया और अंग्रेजों को शाबाशी दी। ये सब लोग भारतीय ही थे। ये वही लोग थे जो मुगलों और अंग्रेजों के आक्रमण के बाद रियासतों के राजा-महाराजाओं को यह सलाह देते थे कि अगर उन्हें चैनो-सुकून की जिंदगी जीनी है तो आक्रमणकारियों के समक्ष दंडवत रहो। जलियांवाला नरसंहार के उपरांत ऐसे गद्दारों ने जनरल ओ डायर के लिए चंदा ही इकट्ठा नहीं किया, अपितु ब्रतानी हुकूमत के नियंत्रण में छपने वाली अनेक अखबारों ने इस चंदे में योगदान किया। यह अत्यंत खेदजनक है कि विरोध या विद्रोह करने की बजाय ये अखबारें जनरल डायर के प्रति नतमस्तक हो गईं, लेकिन इनमें लाहौर से छपने वाली ‘दी ट्रिब्यून’ अपवाद थी जिसके संपादक कालीनाथ रे ने जलियांवाला बाग नरसंहार से पूर्व की व बाद की घटनाओं का जबरदस्त विरोध किया था और लंबे वक्त तक उन्हें कारावास में भी रहना पड़ा।

ब्रिटिशर्स सहित कुछ भारतीय भी मानने लगे थे कि इस गोलीकांड ने पंजाब को बचा लिया। पंजाब में हत्याकांड की खुशी में कुछ लोगों के द्वारा कहीं भोज का आयोजन किया गया तो कहीं जनरल डायर को सम्मानित किया गया। सुंदर सिंह मजीठिया द्वारा जलियांवाला बांग हत्याकांड होने की खुशी में जनरल डायर को 13 अप्रैल 1919 की रात्रि को ही शाही भोज पर आमंत्रित किया गया। 21 अप्रैल 1919 को जनरल डायर तथा ब्रिगस को सुंदर सिंह मजीठिया, आरूढ़ सिंह एवं कुछ अन्य लोगों ने स्वर्ण मंदिर में आमंत्रित किया एवं सिरोपा भेंटकर सम्मानित किया गया। मजीठिया ने लिखा ‘‘यह अफसोस की बात है कि कुछ बुरे इरादे वाले लोगों की तरफ से इस धरती के अमन को तबाह करने के लिए शरारतपूर्ण कोशिशें की गई। कई स्थानों पर ऐसी हरकतें की गई जिससे राज्य के पवित्र नाम को धब्बा लगा, पर हजूर ने हालत पर शक्ति से काबू पाकर अच्छे तरीके से काम करके इस बुराई का खात्मा कर दिया। इनका मानना था कि ‘जनरल डायर ने बाग में गोलियां चलाकर पूरे अमृतसर को दंगाग्रस्त होने से बचा लिया था।’ बाद में चलकर अंग्रेजों द्वारा पुरस्कारस्वरूप मजीठिया को 1926 में ‘नाइट’ की उपाधि दी गई थी। एक दूसरी घटना में महाराजा भूपिंदर सिंह ने जनरल डायर को टेलीग्राम के जरिए हत्याकांड पर बधाई भेजते हुए कहा था ‘‘आपके द्वारा की गई गोलीबारी सही है और गवर्नर-जनरल भी इससे सहमत है।’’ मजीठिया एवं भूपिंदर सिंह सरदार के अलावा 27 सिक्ख, 24 मुसलमान एवं 42 हिंदूओं ने ओ. डायर के तारीफों के पुल बांधे थे कि ‘उसने बाग में गोलियां चलाकर पूरे अमृतसर को दंगाग्रस्त होने से बचा लिया था।’ जहां एक ओर डायर की आलोचना हो रही थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार एवं कुछ स्थानीय लोगों के द्वारा उसे निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा था। ब्रिटेन के अखबार मॉर्निंग पोस्ट ने एक फंड की स्थापना की। दस हजार पाउंड का चंदा एकत्र किया। भारत में भी इन्होंने एक डायर फंड की स्थापना की। चंदे की रकम इलाहाबाद बैंक लिमिटेड की शाखा में जमा करवाई गई। इसमें संग्रहीत चंदा डायर श्लाघा निधि, मंसूरी में भेजा गया।

भारत के कई समाचार पत्रों ने इस फंड में हजारों रुपए जमा करवाए। स्टेट्समैन ने 20 हजार, पायनियर ने 10 हजार, इंगिलशमैन ने 10 हजार तथा टाइम्स ऑफ इंडिया ने 20 हजार रुपए का सहयोग दिया। चंदा देने वालों के नाम समाचार- पत्रों में भी प्रकाशित किए गए। इस प्रकार जनरल डायर को 26,317 पाउंड की थैली भेंट की गई। एजुटेंट जनरल ने इस तरह की निधि बनाकर एक सरकारी ऑफिसर के लिए किसी तरह का चंदा इकट्ठा करना राजकीय विनियमों के अनुच्छेद 443 के तहत गैर-कानूनी बताया और संलग्न अन्य अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया, लेकिन आश्चर्य था कि किसी ने इसकी परवाह ही नहीं की। 12 अप्रैल 1919 को हिंदू सभा स्कूल में एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें सभी गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग की गई, लेकिन इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य सरदार सुंदर सिंह मजीठिया ने इस सभा का विरोध किया। जलियांवाला कांड का एक और गद्दार हंस राज नामक युवक था जो एक कांग्रेसी नेता गोपाल दास भंडारी का उद्दंड भांजा था। वह सत्यपाल किचलू के मुंह लगा हुआ था और अंग्रेजों के लिए मुखबरी करता था। सही मामलों में पंजाब में गद्दारी किन लोगों ने की, वह खुफिया विभाग के भारतीय कारिंदों की करतूत देखने से पता चलता है। हंसराज और खुशहाल सिंह नाम के व्यक्ति खुफिया विभाग को सूचनाएं देते रहते थे और आंदोलनकारियों के फैसलों पर नजर रखते थे। यह खेदजनक है कि जलियांवाला कांड के गद्दारों के खिलाफ शायद कोई कार्रवाई नहीं हुई जबकि आजादी से पहले स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा उन्हें बेनकाब किया जाना चाहिए था। यही नहीं आजादी के बाद ऐसे गद्दारों की पहचान कर उन्हें हवालात भेजने के लिए भी कुछ नहीं किया गया। कल्पना कीजिए अगर आज देश का जो माहौल है उसमें ऐसे गद्दार सामने आते तो उनकी मौबलींचिंग हो जाती। इतिहास गवाह है कि खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह ने शहीद भगत सिंह के विरुद्ध अदालत में गवाही दी थी जो उन्हें फांसी पर लटकाने के लिए हथियार बनी।

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