जीवन का लक्ष्य

श्रीश्री रवि शंकर

बहुधा सम्मान देने अथवा प्राप्त करने के लिए एक दूरी की आवश्यकता होती है। क्योंकि हम अपने निकट के लोगों को गंभीरता से नहीं लेते हैं। जो अपने हैं उनकी अवहेलना कर हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं। अर्थात सम्मान, अपनापन कम करके दूरी बढ़ा देता है, किंतु संत, ज्ञानी व सतपुरुष के सान्निध्य में ऐसा नहीं होता है। जितना तुम समीप जाते हो सम्मान में उतनी वृद्धि होती है। ऐसा ही जनक के साथ भी हुआ। अष्टावक्र पर दृष्टि पड़ते ही जनक के मन में उनके प्रति आदर व अपनापन जागा। ऐसे विचारों के वशीभूत होकर ही तुम ज्ञानियों को सुनते हो और उनके निर्देषों का अनुपान करते हो। अगर विचार ऐसे न हों, तो तुम ज्ञानियों को सुनोगे कैसे? अध्यात्म अज्ञात की ओर ले जाने वाला वह क्षेत्र है,जहां कोई हाथ पकड़कर ले चले, तभी पहुंच पाओगे। किसी साथ देने वाले मार्गदर्शक की आवश्यकता होगी और उस पर भरोसा तभी होगा, जब सम्मान व आत्मीयता दोनों विद्यमान हों। किसी के कहने से उसके प्रति सम्मान व अपनापन नहीं जागता। वह किसी विशेष से मिलते ही स्वतः सहजरूप से उत्पन्न होता है। प्रायः संतों और ज्ञानियों के निकट ऐसा घटित होता ही है। ऐसे ही भाव से जनक ने अष्टावक्र को ममप्रभु कहकर संबोधित किया। पुरुषार्थ के चार अंग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हैं। धृति जिससे जीवन को लक्ष्य प्राप्त होता है। किसी कार्य को करने के लिए जीवन में कुछ जानने के लिए जिसकी आवश्यकता होती है, वही धृति है। क्षमाशीलता, सहनशीलता व निग्रह करना जीवन में अति आवश्यक है। जो मन में आए अनायास नहीं बोलना चाहिए,बल्कि सोच समझकर विवेकपूर्ण प्रलाप करना चाहिए। कार्य करने की बुद्धि,ईमानदारी,निष्ठा और गरिमा जो सभी धर्मों के लक्षण हैं, जीवन के लिए भी आवश्यक है। इन गुणों के अभाव से जीवन नहीं चल सकता। जिस मात्रा में ये गुण हमें प्राप्त होते हैं, उसी मात्रा में जीवन का सुख अनुभव करते हैं। क्रोध की मात्रा जितनी कम होगी, तुम जीवन में उतने ही सुखी रहोगे। धर्म, अर्थ व काम तीनों बंधन के कारण हैं। इन बंधनों का अनुभव होने पर ही मुक्ति की इच्छा उपजती है। बंधन महसूस किए बिना मुक्ति की कामना कैसे होगी। जिस प्रकार दौड़ते हुए व्यक्ति को तकिए की आवश्यकता महसूस नहीं होती,थक कर विश्राम की इच्छा जागने पर तकिए की आवश्यकता समझ में आती है। जीवन में जब तक तुम्हारी दौड़ जारी है,तब तक मुक्ति की इच्छा भी नहीं जागती है। जब तुम जीवन की आपाधापी से थकते हो, दुःखी होते हो, तभी बंधन को महसूस भी करते हो और बंधन का अनुभव होते ही मुक्ति की चाह होती है। होश बढ़ने पर अथवा दुःखों से कलांत होने पर मुक्ति की लालसा होती है। दुःखों से बेझिल मन उससे छुटकारा चाहता है एवं प्रज्ञावान अर्थात होश में जीने वाला व्यक्ति भी सोचता है कि बस सांसारिक गतिविधियां बहुत हो गईं अब इससे मुक्ति होनी चाहिए। अष्टावक्र गीता ज्ञान का विहंगम मार्ग है, जो विरलों के लिए ही है। राजा जनक ऐसे ही सुपात्र शिष्य थे। अष्टावक्र को देखकर वे समझ गए कि यह ब्रह्मज्ञानी है। मैं अपनी जिज्ञासा इनके समक्ष रख सकता हूं। कुछ प्रश्न सबसे पूछे नहीं जाते। विषय के जानकार से ही संपर्क साधना चाहिए।

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