तिब्बत में छिपा है तंत्र ज्ञान

वास्तव में वह बहुत ही खूबसूरत गोम्फा था। स्थान-स्थान पर भगवान बुद्ध की आदमकद मूर्तियां बनी थीं। यहां-वहां अनेक लामा दिखे। सिर से कान तक लंबी टोपियां, वही रंग-बिरंगे लंबे चोगे, लगभग सभी के हाथों में धर्म चक्र घूमता हुआ। गोम्फा में ‘ओम पद्मे मणि हुमू’ का मीठा-मीठा स्वर गूंज रहा था…

-गतांक से आगे…

बड़ी-बड़ी चट्टानों की तलहटी को चूमता हुआ वह घुमावदार रास्ता नीचे की ओर चला गया था। थोड़ा आगे जाते ही एक बड़े-से गोल गुंबद वाली इमारत नजर आई। उसके सफेद काले पत्थर और उसकी बनावट ही स्वयं कह रही थी कि वह गोम्फा है। शायद वह तामांग गोम्फा ही हो? मैं उसके संकरे पत्थर वाले द्वार से भीतर चला गया। मैंने उसका अनुसरण किया। वास्तव में वह बहुत ही खूबसूरत गोम्फा था। स्थान-स्थान पर भगवान बुद्ध की आदमकद मूर्तियां बनी थीं। यहां-वहां अनेक लामा दिखे। सिर से कान तक लंबी टोपियां, वही रंग-बिरंगे लंबे चोगे, लगभग सभी के हाथों में धर्म चक्र घूमता हुआ। गोम्फा में ‘ओम पद्मे मणि हुमू’ का मीठा-मीठा स्वर गूंज रहा था। वह लामा सीधे सामने वाले कमरे में चला गया। उस कमरे में भगवान बुद्ध की सर्वथा नग्न आदमकद मूर्ति बनी हुई थी। उसी के नीचे पत्थर की कुर्सियां रखी थीं। एक कुर्सी पर बैठते हुए उसने मुझे भी बैठने का संकेत किया। मैं बैठ गया। ‘यही तामांग गोम्फा है।’ उसने कहा- ‘किससे मिलना है?’ गोम्फा के शांत, धार्मिक वातावरण पर मैं मुग्ध हो गया था। इस प्रश्न पर जैसे मैं स्वप्न से जागा। मैं फौरन बोला- ‘लामा गुरु छेरिंग से, उनके निमंत्रण पर ही मैंने यहां तक आने का साहस किया है।’ लामा के होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कान खिल गई। शायद वह मेरा उपहास था। अचानक मैं नतमस्तक हो गया और बड़ी श्रद्धा से बोला- ‘आपको मेरा नमन है।’ लामा छेरिंग हंस पड़े, फिर बोले- ‘यात्रा तो दुर्गम है, पर कोई विशेष कष्ट नहीं हुआ होगा।’ ‘नहीं, आदरणीय।’ मैं बोला- ‘यात्रा लगभग सकुशल और रोचक रही।’ ‘तुम्हारा पत्र तो गंगटोक जाकर मेरा आदमी ले आया था, पर जानते हो, वह सिक्किम था और यह तिब्बत है।’ मैं मुस्कराया। ‘तुम्हें भिक्षुणी यामा मिली थी?’ ‘हां, मार्ग में भेंट हुई थी। उसने कहा था, आप तामांग में ही हैं।’ ‘आने का इरादा तो तभी था, पर तुम्हारे आगमन के कारण यहां रुक गया था। वैसे चीनियों ने सब कुछ तहस-नहस कर डाला है। मैं यहां से जल्द ही चला जाऊंगा।’ अपने सामने गंभीर हो गए लामा गुरु छेरिंग को मैं आश्चर्य से देखता रह गया। सर्वत्र अंतर्यामी, साधना करने वाले लामा गुरु क्या चीनियों से अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं? क्या तंत्र इतना दुर्बल है? मुझे मौन देखकर लामा गुरु छेरिंग स्वयं बोल उठे- ‘तुम किस ख्याल में हो, वह मैं अच्छी तरह समझ रहा हूं। शायद राह में भी यही बात तुम्हारे मन में थी। पर देखो, हम प्रकृति के कार्यों में बाधा नहीं डालते।

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