दंड प्रक्रिया में परिवर्तन की जरूरत

सुनील वासुदेवा

लेखक, शिमला से हैं

लोग गंभीर मामलों में त्वरित न्याय चाहते हैं, लेकिन वास्तव में देश की न्याय प्रक्रिया जटिल है, जिस में पीडि़त को एक लंबी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। अंग्रेजी में एक मशहूर कहावत है कि ‘न्याय में देरी यानी न्याय का न मिलना’। फौजदारी मामलों में एफआईआर यानी प्राथमिकी दर्ज होने व मुकद्दमे की जांच, अभियोजन की एक लंबी न्याय प्रणाली है। आमतौर पर ऐसी धारणा बन गई है कि अपराधी न्यायालयों से आरोप मुक्त हो जाते हैं तथा पीडि़त पक्ष को न्याय नहीं मिल पाता। कानून में अपराधी को सजा देने के कठोर प्रावधान हैं, लेकिन अपराधी न्यायालयों में साक्ष्यों व अन्य तकनीकी कारणों से आपराधिक मामलों में आरोपमुक्त हो जाते हैं, दूसरी ओर पीडि़त व आमजन का तर्क होता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद त्वरित कार्रवाई हो ताकि मामलों में न्याय हो सके…

पिछले कुछ समय से हमारे देश में न्याय प्रणाली विशेषतौर पर दंड प्रक्रिया में अमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आपराधिक मामलों में अब समाज अति संवेदनशील हो रहा है व लोग ऐसे गंभीर मामलों में त्वरित न्याय चाहते हैं, लेकिन वास्तव में देश की न्याय प्रक्रिया जटिल है, जिस में पीडि़त को एक लंबी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। अंग्रेजी में एक मशहूर कहावत है कि ‘न्याय में देरी यानी न्याय का न मिलना’। फौजदारी मामलों में एफआईआर यानी प्राथमिकी दर्ज होने व मुकद्दमें की जांच, अभियोजन की एक लंबी न्याय प्रणाली है। आमतौर पर ऐसी धारणा बन गई है कि अपराधी न्यायालयों से आरोप मुक्त हो जाते हैं तथा पीडि़त पक्ष को न्याय नहीं मिल पाता। कानून में अपराधी को सजा देने के कठोर प्रावधान है, लेकिन अपराधी न्यायालयों में साक्ष्यों व अन्य तकनीकी कारणों से आपराधिक मामलों में आरोपमुक्त हो जाते हैं, दूसरी ओर पीडि़त व आमजन का तर्क होता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद त्वरित कार्रवाई हो ताकि मामलों में न्याय हो सके। समाज अब आपराधिक मामलों खासतौर पर महिलाओं व बच्चों के साथ दुष्कर्म, हत्या, चोरी-डकैती, आर्थिक अपराध, नशे के कारोबार से जुड़े मामलों, घरेलू हिंसा, पंचायत स्तर पर वित्तीय घोटालों, साईबर क्राइम जिसमें फेसबुक व मोबाइल से लोगों के साथ ठगी करके उन के खातों से पैसा गायब करना, डाटा चोरी, बैंकों, सरकारी पैसे में धोखाधड़ी जैसे मामलों में तुरंत कार्रवाई लोग सरकार से चाहते हैं, लेकिन वास्तव में इनमें तत्काल कार्रवाई करने के लिए संसाधन व आधारभूत ढांचे को मजबूत करना होगा व कानून में भी सुधार की जरूरत है। जनसंख्या बढ़ने के साथ आपराधिक मामलों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है, वहीं फौजदारी मामलों में दोषियों की सजा दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, जो चिंता का विषय है। आपराधिक मामलों में अपराधी को सजा उस के जुर्म के अनुसार मिले तथा पूरे देश में सजा दर में सुधार होने के लिए पुलिस आयोग व मलिमथ समिति का गठन किया गया, जिसने आपराधिक मामलों की जांच से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर कई सुझाव दिए हैं, लेकिन उन पर पूरी तरह से धरातल पर अमल नहीं हो पाया है। एक कल्याणकारी राज्य में लोगों के जानमाल की सुरक्षा व मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व सरकार का है। पुलिस एक आपराधिक मामला किसी अपराधी के विरुद्ध इसलिए दर्ज करती है क्योंकि उस व्यक्ति ने एक व्यक्ति विशेष और खासकर पूरे समाज के खिलाफ अपराध किया होता है।

आपराधिक मामलों की पुलिस तत्काल कार्रवाई करके मामले को हल करे। यह जरूरी है कि जांच तेजी से हो ताकि अपराध करने वाले को अदालत के कटघरे में खड़ा किया जा सके। अपराधी को भी अदालत में शीघ्र विचारण का अधिकार कानून में प्राप्त है। फौजदारी मुकदमों के निपटान में देरी हर मामले के तथ्यों और स्थिति पर निर्भर करती है। वर्तमान समय में अपराधी नई तकनीक तथा दस्तावेजों में इस तरह हेरा-फेरी करते हैं ताकि जांच अधिकारी उन्हें आसानी से न पकड़ सके। पुलिस जांच दस्तावेजों पर आधरित होने के कारण कई बार जांच में लंबा समय लग जाता है, लेकिन पुलिस को ऐसे मामलों की जांच को लंबे समय तक नहीं लटकाना है कि मामले की सच्चाई सामने आने में कठिनाई होने लगे। आपराधिक मामलों में अगर अदालतों में तेजी से कार्रवाई हो तो उस के परिणाम अलग हो सकते हैं साथ ही अपराधी को भी न्याय प्राप्त करने में देरी नहीं होगी। समय व्यतीत होने से अदालतों में गवाही देने वाले पीडि़त व अन्य गवाहों को भी घटना का पूरा विवरण याद नहीं रहता, जिस का विपरीत प्रभाव फौजदारी मुकदमों पर पड़ता है व अपराधी दोषमुक्त हो जाते हैं इस आपराधिक न्याय प्रणाली में फौजदारी मामलों की जांच कर रहे पुलिस अधिकरियों की अभियोजन के प्रति कोई जिम्मेदारी तय नहीं की गई। न्यायालय में अभियोजन पक्ष को ट्रायल के दौरान पुलिस द्वारा बनाए गए गवाहों की उदासीनता का सामना करना पड़़ता है। गवाह पुलिस को दिए गए अपने बयान से मुकर जाते हैं,कई बार पीडि़त भी अपने पुलिस बयान से विपरीत बयान अदालत में देते हैं। वास्तव में आपराधिक मामलों में पेशी के लिए किसी की भी जिम्मेदारी तय नहीं की गई। अभियोजन अधिकारियों के रिक्त पद भरने की प्रक्रिया भी सुस्त है। वर्तमान में आपराधिक न्याय प्रणाली में कई सुधारों की जरूरत है, जिन पर विचार करना बेहद जरूरी बन गया है। अपराध रोकना तथा अपराधी को कानून के अनुसार सजी दी जा सके, इस के लिए पुलिस न्यायपालिका व अभियोजन पक्ष को व्यापक तौर पर आपसी तालेमल की आवश्यकता है। अभियोजन पक्ष को और सशक्त करने और उन की गुणवत्ता बढ़ाने की ओर भी ध्यान देना होगा।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे। 

-संपादक

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