नौणी के दम से बागबाग

Jan 13th, 2020 12:10 am

गांवों में बसे हिमाचल की सुबह कभी बैलों के गले में खनकती घंटिंयों से होती थी, लेकिन आज प्रदेश का स्मार्ट किसान-बागबान पूरे देश को आय दोगुनी करने का मंत्र देने की कुव्वत रखता है। इस कामयाबी का एक बड़ा कारण डा. यशवंत सिंह परमार बागबानी एवं वानिकी विश्विद्यालय, नौणी के वे शोध हैं, जिनसे आज हिमाचली किसान-बागबान अन्य प्रदेशों से दो कदम आगे हैं। बात फलों की हो या बेमौसमी सब्जियों की, किसानों की हर डिमांड पर नौणी यूनिवर्सिटी से तुरंत एक्शन होता है। पहली दिसंबर, 1985 को पहचान में आए बागबानी एवं वानिकी विश्विद्यालय की हमारी संवाददाता मोहिनी सूद के साथ इस शानदार सफर की कहानी….

पहली दिसंबर, 1985 से स्थापित डा. यशवंत सिंह परमार बागबानी एवं वानिकी विश्विद्यालय, नौणी निरंतर किसानों-बागबानों के उन्नति में कार्यरत है। विश्वविद्यालय के तीनों मुख्य अंग शिक्षा, अनुसंधान एवं विस्तार शिक्षा प्रदेश व देश में बागबानी एवं वानिकी के विकास हेतु मानव संसाधन विकास, प्रौद्योगिकी उत्पादन और इसके प्रसार एवं अनुप्रयोग के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के मुख्यालय नौणी स्थित विस्तार शिक्षा निदेशालय एवं प्रदेश के पांच जिलों चंबा (सरू), (रिकांगपिओ), शिमला (रोहडू), सोलन (कंडाघाट) एवं लाहुल-स्पीति (ताबो) में कृषि विज्ञान केंद्र हैं। विभिन्न प्रसार कार्यक्रमों के माध्यम से अधिकारी निरंतर बागबानो के संपर्क में रहते हैं, ताकि बागबानी व वानिकी फसलों से संबंधित नवीनतम जानकारियां शीघ्र खेतों तक पहुंच सकें। इसके लिए प्रसार के विभिन्न कार्यक्रमों का समय-समय पर आयोजन किया जाता है, जिनमें मुख्य तौर पर संसिंर्गत एवं सिंर्न विशेष प्रशिक्षण, कृषिक भ्रमण, प्रदर्शनियां, किसान मेले, किसान गोष्ठियां, किसान के खेतों पर प्रदर्शनी लगाना, किसान-अधिकारी-वैज्ञानिक परिचर्चा, वैज्ञानिकों द्वारा रेडियो व टेलीविजन वार्ताएं आदि सम्मिलित हैं। इनके अलावा पत्राचार व टेलीफोन के माध्यम से भी वैज्ञानिकों द्वारा बागबानों की समस्याओं के समाधान हेतु जानकारी दी जाती है। विभिन्न फसलों से संबंधित खेत साहित्य प्रकाशन से भी प्रदेश में बागबानी व वानिकी के विकास में योगदान दिया जाता है। प्रशिक्षणों व अन्य प्रसार कार्यक्रमों के दौरान फल उत्पादन, सब्जी उत्पादन, पुष्प उत्पादन, सुगंधित व औषधीय पौधों की खेती, विभिन्न बागबानी व वानिकी फसलों के पौधों की नर्सरी उगाना, बागीचों का प्रबंधन, फल पौधों में कांट-छांट व सिधाई, मधुमक्खी पालन, कृषि वानिकी, फलों एवं सब्जियों का संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं इसका महत्त्व, फसल बीमा योजना आदि विषयों में हिमाचल प्रदेश व अन्य राज्यों के किसानों/ बागबानों को नवीनतम जानकारी प्रदान की जाती है तथा आधुनिक बागबानी उत्पादन हेतु बागबानों की क्षमता वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जाता है। कई सालों से लगातार विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक ‘मेरा गांव मेरा गौरव’ स्कीम के माध्यम से किसानों के खेतों पर जाकर उनकी समस्याओं का मौके पर ही समाधान कर रहे हैं।

पांच साल में 250 बागबान ट्रेनिंग प्रोग्राम

बागबानी व वानिकी विकास हेतु विस्तार शिक्षा निदेशालय ने पांच साल में विभिन्न विषयों पर लगभग 250 किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिनसे लगभग 7000 किसान-बागबान लाभान्वित हुए। इसके अलावा बागबानों की समस्याओं के समाधान हेतु इस दौरान लगभग 350 निर्देशित भ्रमण (एक्सपोजर विजिट)/पादप निदान संबंधी भ्रमण, 1200 टेलीफोन सेवाओं, 250 पत्राचार (कुरीयर सेवा), 15 किसान मेलों व प्रदर्शनियों, फसल सेमिनार आदि का आयोजन किया गया, जिनके माध्यम से लगभग 15000 किसानों ने लाभ उठाया।

यूनिवर्सिटी ने इजात की कई तकनीकें

– सब्जियों व फलों को सोलर ड्रायर से सुखाने की तकनीक

– अखरोट के पौधों के शीघ्र प्रवर्धन और बेहतर सफलता के लिए 15-20 दिन की आयु के मूलवृंत में अप्रैल के पहले सप्ताह में पॉलीहाउस के अंदर एपिकोटाइल, ग्राफ्टिंग टेक्नीक

– हाड्रोपॉनिक में पोषक तत्त्व फिल्म तकनीक के अंतर्गत लेट्यूस उत्पादन के लिए आदर्श पत्र का मानकीकरण

– व्यावसायिक फसलों की जैविक खेती के लिए वनस्पति, जैवरक्षक वाहक, माइकोराइजल फफूंद, मृदा संशोधन एवं मृदा सौर्यकरण जैसे पर्यावरण हितैषी पौध संरक्षण तकनीक

– बेमौसमी सब्जियों जैसे कि टमाटर, बैंगन, भिंडी और खीरा वर्गीय सब्जियों को पॉली ट्यूब में उगाने की तकनीक

– खरीफ प्याज की खेती के लिए सेट का उत्पादन करने के लिए प्रौद्योगिकी

– हरड़ पौध उत्पादन की विनीयर ग्राफ्ंिटग टेक्नीक

– आर्किड और अश्वर्ग का महत्वपूर्ण घटक-जीवक (मलेक्सिस एक्यूमिनाटा) की एक अनूठी और स्थिर किस्म का विकास और पंजीकरण।

– बड़े पैमाने पर बांस उगाने के लिए किसान उपयोगी तकनीक

– बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा एमआईडीएच परियोजना के तहत अदरक, लहसुन, मेथी, धनिया मसाला फसलों की जैविक खेती पर दस किसानों के खेतों में लगाई अग्रिम पंक्ति फसल प्रदर्शनी, लाभान्वित हुए कई किसान

– अखिल भारतीय समन्वयक अनुसंधान परियोजना अभियांत्रिक एवं प्रौद्योगिक के तहत किसान मेले का आयोजन, पहुंचे 218 किसान

– विस्तार शिक्षा निदेशालय द्वारा करसोग मंडी में एक दिवसीय संगोष्ठी, पहुंचे 378 किसान-बागबान

– कृषकों को व्यावसायिक फसलों के रोग एवं प्रबंधन के विषय में अवगत करवाने हेतु विभाग ने तैयार की ई-पत्रिका ‘तकनीकी नोट्स’

दूरदर्शन-आकाशवाणी से दूर हो रही दिक्कतें

आकाशवाणी व दूरदर्शन के माध्यम से समय-समय पर वैज्ञानिकों द्वारा ज्वलंत समस्याओं के विभिन्न विषयों पर नवीनतम जानकारी देने हेतु समयोजित रेडियो व टेलीविजन वार्ताएं भी प्रसारित की गई हैं। इसी प्रकार विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों व क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्रों द्वारा भी बागबानी व वानिकी की उन्नति हेतु बहुत से प्रसार कार्यक्रम चलाए गए, जिनके माध्यम से प्रदेश के हजारों किसान-बागवान लाभान्वित हुए। इसके अलावा क्षमता वृद्धि हेतु विस्तार शिक्षा निदेशालय द्वारा 30 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 700 विस्तार अधिकारियों ने भाग लिया।

समझौते भी कई हुए

नौणी यूनिवर्सिटी और मैसर्ज हाईलैंड ग्रोवर्स शिमला के बीच मूल्यवर्धन के लिए सेब के गुद्दे के उपयोग की तकनीक, मैसर्ज शिवम ट्रेडर्स के बीच सेब के चक्राकार पदार्थ बनाने की तकनीक के लिए समझौता पत्र पर हस्ताक्षर। शिमला के बीरबन सिंह रावत के साथ सेब का सिरका बनाने की तकनीक के लिए समझौता पत्र पर हस्ताक्षर।

नौणी यूनिवर्सिटी देश भर में 12वें नंबर पर

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की कृषि विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में नौणी यूनिवर्सिटी को वर्ष 2018-19 में देश भर में 12वां स्थान प्राप्त हुआ। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में 80वां स्थान प्राप्त हुआ। विश्वविद्यालय को लगभग 1143.59 लाख रुपए की 33 परियोजनाएं विभिन्न वित्तीय एजेंसियों से स्वीकृत हैं। औद्योनिकी एवं वानिकी महाविद्यालय नेरी को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नेशनल एग्रीकल्चरल एजुकेशन एक्रीडिटेशन बोर्ड द्वारा पांच साल के लिए मान्यता दी गई।

अखरोट, आड़ू की नई किस्में भी तैयार

अखरोट की खेती के लिए अनुशंसित किस्म, आड़ू की दो ‘ट्रॉपिक्स स्नो’ किस्मों को अनुमोदित किया गया। ‘ट्रॉपिक्स स्नो’ आडू़ की नई अनुमोदित किस्म, सेब की चार किस्में रेडलम गाला, रेड विलोक्स, रेड केप वालटोड तथा जेरोमाइन और आड़ू की ‘ट्रॉपिक्स स्नो’ किस्म को प्रदेश में व्यावसायिक खेती के लिए अनुमोदित किया गया।

जननद्रव्य संग्रहण में पुष्प निदेशालय

जम्मू एवं कश्मीर से ट्यूलिप की 42 किस्मों को लाया गया, ताकि उनमें से गमले, फूल एवं स्थल-सौंदर्य के लिए उपयुक्त किस्मों का चयन किया जा सके। पुष्प एवं स्थल वास्तुकला विभाग में ट्यूलिप का जर्मप्लाजम ब्लॉक सेब की आठ नई किस्में, जिनमें रेड कैप वाल्टोड, सुपर चीफ, स्कारलेट स्पर-2, जैरोमाइन, रेडलम गाला, रेड विलोक्स, गेल गाला और औविएल अर्ली फुजी का मूल्यांकन नौणी की परिस्थितियों में उच्च घनत्व रोपण के अंतर्गत किया गया। सेब पौधों की सिधाई की विभिन्न प्रणालियों में पाया गया कि सेब के उच्च घनत्त्व रोपण के लिए टाल स्पिंडल प्रणाली सबसे उत्तम है।

वैज्ञानिकों को राष्ट्र स्तर पर सम्मान

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विश्वविद्यालय के मधुमक्खी और परागण और पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी पर केवीके चंबा को देशभर में सर्वश्रेष्ठ चुना गया। लग्गा गांव में सफल कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र चंबा को कृषि कल्याण अभियान-1 में वर्ष 2018 में 112 जिलों में पहला स्थान हासिल और 2019 में तीसरा स्थान मिला। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र शिमला को सभी कृषि विज्ञान केंद्रों में वर्ष 2018-19 में पहला स्थान प्राप्त हुआ है। निचले क्षेत्रों में अनुसंधान गतिविधियों को सुदृढ़ करने के लिए अखिल भारतीय अनुसंधान परिषद द्वारा आम, लीची और अमरूद पर एक नई अखिल भारतीय समन्वयक अनुसंधान परियोजना औद्योनिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, नेरी, हमीरपुर को स्वीकृत की गई है। सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती को किसानों में लोकप्रिय बनाने हेतु विश्वविद्यालय में एक प्रदर्शनी प्रक्षेत्र विकसित किया गया है।

मंदिरों में चढ़े फूलों से तैयार हो रही अगरबत्ती

मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना के तहत विश्वविद्यालय में इस वर्ष आठ आईडिया आए, इनमें से चार ने अपना स्टार्टअप आईडिया पूर्ण कर लिया है। ऊना के रविंद्र-शर्मा ने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के तकनीकी मार्गदर्शन में मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों से जैविक अगरबत्ती विकसित की है। इस अगरबत्ती का विमोचन विश्वविद्यालय के रोज फेस्टिवल के दौरान किया गया। इसके अलावा पांच ने फल सब्जियों का प्रसंस्करण तथा बिक्री उत्पाद पर डिप्लोमा स्टार्टअप योजना के तहत विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान विभाग से हासिल किया। इनमें से एक ने अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया है। एग्रो एन्वायरनमेंटल डिवेलपमेंट सोसायटी (एईडीएस) ने विश्वविद्यालय के सहयोग से कृषि, पर्यावरण और अनुप्रयुक्त विज्ञान में अग्रिम विकास के लिए हाल ही में दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 27-29 सितंबर को किया, जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों के लगभग 500 शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और छात्रों ने भाग लिया।

पश्चिम बंगाल और नागालैंड तक पहुंच

खीरे की सोलन सृजन किस्म, जो बिजाई के 50-60 दिन बाद पक कर तैयार हो जाती है, को निचले व मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के लिए अनुमोदित किया गया है। अदरक का एक स्वदेशी क्लोन सोलन गिरिगंगा, जिसकी उपज हिमगिरी (124.95 क्विंटल/हेक्टेयर) के मुकाबले 186.40 क्विंटल/हेक्टेयर दर्ज की गई है, जिसे बहुस्थानीय परीक्षण के बाद पश्चिम बंगाल, नागालैंड और हिमाचल में खेती के लिए अनुमोदित किया गया है।

पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए शोधपत्र

डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी व वानिकी विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। ये पत्र विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित किए गए हैं, जिसमें एनएएएस मान्यता प्राप्त पत्रिकाओं में प्रकाशित पत्रों की सूची में  2013-14–202, 2014-15– 274, 2015-16–189, 2016-17–290, 2017-18– 465 शामिल हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कई पुस्तक अध्याय, पुस्तकें और लोकप्रिय लेख भी प्रकाशित किए हैं। वैज्ञानिकों ने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों व सम्मेलनों में शोध कार्य भी प्रस्तुत किए हैं।

सेब के लिए टॉल स्पिंडल सिस्टम

विभिन्न योजनाओं के बारे में नौकरी पेशा महिलाओं की जागरूकता के बारे में अध्ययन करवाया गया। इसमें पाया गया कि नौकरीपेशा महिलाओं को इन कार्यक्रमों की उपयोगिता के बारे में पूरी जागरूकता है और सभी महिलाएं इन योजनाओं के हक में हैं। ज्यादातर महिलाएं इन योजनाओं को व्यापक स्तर पर शुरू करने के पक्ष में हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इसका लाभ मिल सके। यह भी पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के बारे में विशेष रूप से जानकारी दी जानी चाहिए। किसानों की आय में वृद्धि के लिए समय-समय पर आयोजित कार्यक्रमों में वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी किसानों के साथ साझा की।

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