मोदी को महंगाई की चुनौती

By: Jan 22nd, 2020 12:05 am

बाल मुकुंद ओझा

स्वतंत्र लेखक

महंगाई ने एक बार फिर से देश में दस्तक देकर लोगों का जीना हराम कर दिया है। इसने मोदी द्वारा जनता से किए वादों पर सवाल खड़ा कर दिया है। लोगों ने विभिन्न मोर्चों पर राहत पाने के लिए भाजपा के हाथों में सत्ता सौंपी थी, लेकिन महंगाई सरकार की छवि पर सवालिया निशान लगा रही है। ऐसे में जनता के भरोसे पर खरा उतरने और सरकार को महंगाई की आंच से बचाने के लिए मोदी को कमर कसनी होगी। खुदरा मुद्रास्फीति की दर दिसंबर, 2019 में जोरदार तेजी के साथ 7.35 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर से कहीं अधिक है। खाद्य वस्तुओं जैसे प्याज, टमाटर और खाद्य तेलों की महंगाई ने खुदरा महंगाई की दर को उछाल दिया है…

भारत की राजसत्ता दूसरी बार संभालने के बाद भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगता है महंगाई से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। जन साधारण को फिलहाल महंगाई से राहत मिलती नहीं दिख रही है। महंगाई ने एक बार फिर से देश में दस्तक देकर लोगों का जीना हराम कर दिया है। इसने मोदी द्वारा जनता से किए वादों पर सवाल खड़ा कर दिया है। लोगों ने विभिन्न मोर्चों पर राहत पाने के लिए भाजपा के हाथों में सत्ता सौंपी थी, लेकिन महंगाई सरकार की छवि पर सवालिया निशान लगा रही है। ऐसे में जनता के भरोसे पर खरा उतरने और सरकार को महंगाई की आंच से बचाने के लिए मोदी को कमर कसनी होगी। खुदरा मुद्रास्फीति की दर दिसंबर, 2019 में जोरदार तेजी के साथ 7.35 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर से कहीं अधिक है। खाद्य वस्तुओं जैसे प्याज, टमाटर और खाद्य तेलों की महंगाई ने खुदरा महंगाई की दर को इतना उछाल दिया है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो साल दर साल आधारित महंगाई दर में यह करीब 5.24 प्रतिशत के लगभग की बढ़ोतरी आंकी जा रही है। सोमवार को भारत सरकार ने ये आंकड़े जारी किए। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी की वजह से खुदरा मुद्रास्पफीति में उछाल आया है। यह लगातार तीसरा महीना है कि खुदरा महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक के मध्यावधि लक्ष्य 4 फीसदी से ऊपर रही है। इससे अब भविष्य में केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति में राहत मिलने की उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है।

रिजर्व बैंक अपनी नकदी में बढ़ोतरी कर महंगाई को काबू में करने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिलहाल रसोई की हालत खस्ता है क्योंकि गैस सिलेंडर से लेकर प्याज, आलू, दाल, दलहन और हरी सब्जियों तक सब के भाव बढ़ रहे हैं। सामान्य दिनों में दस रुपए किलो मिलने वाले प्याज का मूल्य 100 से ऊपर पहुंच गया। मोदी राज में देश में महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसकी सबसे ज्यादा मार दिहाड़ीदार मजदूरों और गरीबों पर तो लाजिमी रूप से पड़ी ही है, साथ ही मध्यम वर्ग भी इसकी बेरहम मार से अछूता नहीं रहा है। हालांकि भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक लगाम लगाने में मोदी सरकार कामयाब रही है। मगर महंगाई के मोर्चे पर सरकार को आम आदमी के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। हमारे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि देश में महंगाई की मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें हैं जिन पर चाहकर भी काबू पाने में सरकार नाकाम साबित हुई है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डालर तक पहुंचाने के केंद्र सरकार के लक्ष्य को गहरा धक्का लग सकता है। विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का अनुमान 6.5 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया। वर्तमान में भारत की विकास दर 5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। विश्व बैंक ने कहा है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से पैदा हुई क्रेडिट कमजोरी गिरावट के प्रमुख कारणों में से एक है। इस भांति एक साल में जीडीपी विकास दर के अनुमान में 2 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। महंगाई दर लक्ष्य की राह में सबसे बड़ी बाधा है। महंगाई दर बढ़ने का अर्थ है कि वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे। महंगाई दर में बढ़ोतरी के साथ रुपए की क्रय शक्ति घटेगी, जिससे खपत घटेगी और जीडीपी ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जिससे लक्ष्य अपनी राह से भटक सकता है। आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि महंगाई और बढ़ सकती है क्योंकि पेट्रोल और डीजल के भाव लगातार बढ़ते जा रहे हैं और अमरीका-इरान तनातनी से इसमें और वृद्धि की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

भारत सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति नवंबर, 2019 में 5.54 प्रतिशत और दिसंबर, 2018 में 2.11 प्रतिशत के स्तर पर थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर में खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति बढ़कर 14.12 प्रतिशत पर पहुंच गई। दिसंबर, 2018 में यह शून्य से 2.65 प्रतिशत नीचे थी। नवंबर, 2019 में यह 10.01 प्रतिशत पर थी। जब तक कालाबाजारी, मुनाफाखोरी और जमाखोरी पर सरकार रोक नहीं लगाती, कृत्रिम महंगाई बढ़ती रहेगी। किसानों को जागरूक करके संसाधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि उपज का सही दाम मिले। तभी उपभोक्ताओं को भी राहत मिलेगी। देश में जितनी भी समस्याएं हैं, चाहे महंगाई हो, जमाखोरी, मुनाफा-खोरी अथवा काला बाजारी, इन सबकी जड़ों में भ्रष्टाचार रूपी दीमक लगा हुआ है, जिसका पोषण व संरक्षण राजनीतिक लोग करते हैं। सरकार किसी भी दल की आ जाए, यह काले कारनामें बंद नहीं हो सकते क्योंकि सत्ता बदलते ही बेईमान लोगों की आस्था भी बदल जाती है। इनके सुर भी बदल जाते हैं। इसलिए कोई परिवर्तन नहीं आता। हालात जस के तस ही रहते हैं। अमीरी-गरीबी की खाई चौड़ी होती जा रही है। यानी सिस्टम में सुधार की आवश्यकता है। प्याज, टमाटर से लेकर खाद्य वस्तुओं के दामों का आकाश छूना हैरानी की बात है। इस दौरान खुफिया तंत्र व कृषि विपणन बोर्ड की बाजारों में सक्रियता बढ़ाकर जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने के आदेश जारी करने चाहिए। अधिक बरसात, बाढ़ या सूखे जैसी परिस्थितियों में उत्पादन में कमी या फसल की बर्बादी से महंगाई में बढ़ोतरी होना आम बात होती है, लेकिन सामान्य परिस्तिथियों में सब्जियों के दाम बढ़ना हैरान करता है। दूसरी तरफ  किसानों को भी बढ़ती कीमतों का लाभ नहीं मिल पाता है। सरकार भी इस मामले में कोई कदम नहीं उठाती है। सरकार बिचौलियों की समाप्ति का तरीका निकाले या फिर इनकी खबर ले।

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