वेदांत की शिक्षा

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

प्रचार कंपनी के तत्वावधान में प्रचार देना यद्यपि आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त लाभदायक था,लेकिन स्वामी जी को यह नहीं सूझा। उन्होंने घोषणा की कि भविष्य में वे बिना कुछ शुल्क लिए ही व्याख्यान तथा उपदेश करेंगे। ब्रुकलिन तथा ग्रीनकट में गिने-चुने व्यक्तियों को स्वामी जी ने शिष्य बनाया था,वे योग और वेदांत की कक्षा में नियमित रूप से सम्मलित होने लगे। अब स्वामी जी की प्रवृत्ति इस बात की तरफ हुई कि व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षा और अभ्यास द्वारा कुछ उत्साही शिष्यों का निर्माण किया जाए, जो भविष्य में इस कार्य के संचालन में सहायक हो सकें। उन्होंने महसूस किया कि भाषण में भीड़ तो इकट्ठी हो जाती है,लेकिन प्रभाव स्थायी नहीं होता। यही सोचते हुए उन्होंने अपनी कार्यविधि में परिवर्तन कर लिया था। जबकि इस परिवर्तन की वजह से उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा,क्योंकि भाषणों के लिए निमंत्रण दाताओं का आग्रह बारंबार बना रहता था और उन्हें टालने के लिए मुश्किल भी होती थी। इसी कारण कई मित्रों को यह बात अजीब लगी कि प्रचार के शुल्क से होने वाली आय को स्वामी जी ने क्यों छोड़ दिया। इस अर्थप्रधान समाज में भारतीय संन्यासी को समझ पाना कोई आसान बात नहीं थी। स्वामी जी को व्याख्यानों के शुल्क से जो आमदनी होती थी,उसे वे दान में देते थे। अमरीका और भारत की अनेक सेवाभावी संस्थाएं स्वामी जी से असंभावित आशातीत सहायता पाकर चकित चमत्कृत हुई। अर्थ प्रधान पाश्चात्य जगत में जहां पग-पग पर प्रचुर धन की आवश्यकता पड़ती है। स्वामी जी सदा कल की चिंता किए बिना भारतीय संन्यासी की अपरिग्रह वृत्ति का पालन करते रहे। उन्होंने कभी भी कल की चिंता नहीं की थी। कल की कल देखेंगे, यही व्रत उनका रहा। जैसा कि सर्वत्र होता है,पहले पहल तो जोश के अतिरेक में अमरीका वासियों ने उनकी खूब तारीफ की, उन्हें मित्र भाव से ग्रहण किया और उनसे स्नेह किया,लेकिन उन्हें गुरु और आचार्य नहीं माना। वास्तव में वहां की जीवन पद्धति में भारतीय ढंग की गुरु शक्ति या शिष्य भाव प्रचलित नहीं था और स्वामी जी उनके मानस को भारतीय ढंग की धर्म साधना के अनुकूल चिंतन में ढालना चाहते थे। जब उनके पास आने वाले अमरीका के लोगों ने देखा कि इस संन्यासी का जीवन अंदर-बाहर से एक जैसा है,इनके मन भाव कर्म में कहीं कोई विरोध नहीं है और भौतिक सुखों के लिए जरा सी कामना नहीं, तो उनकी निष्ठा बढ़ने लगी। वे समझ रहे थे कि हमारे ही कल्याण के लिए यह संन्यासी हिंदू धर्म के सार रूप वेदांत का अमृत फल लेकर हमारे देश में आया है। इस तरह कुछ सात्विक उदारवृत्ति के लिए लोग उनसे धर्म तत्त्व की शिक्षा लेने के लिए आने लगे।            

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