सायं संध्या के बाद ही तुरीय संध्या करें

उपर्युक्त पांचों काल काम्य कर्मों की विविध साधनाओं और आम्नायों के अनुसार कर्मभेद का सूचन करते हैं। महर्षियों का कथन है कि संध्या में काललोप का उतना दोष नहीं लगता जितना कि क्रियालोप करने से लगता है। इसलिए विशेष कारणवश अथवा परिस्थितिवश यदि कदाचित समय में सम-विषम स्थिति आ जाए तो उसमें निम्नवत रूप से क्रिया करनी चाहिए : प्रातःकाल की संध्या पूर्ण करने के बाद ही मध्यान्हकाल की संध्या करें अथवा सायंकाल में सायंकालीन संध्या से पहले मध्यान्ह संध्या करके सायं संध्या करें। सायं संध्या के बाद ही तुरीय संध्या करें। यदि पंचमी संध्या मध्य रात्रि में न हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में शैयाकृत्य से पहले ही कर लें…

-गतांक से आगे…

उपर्युक्त पांचों काल काम्य कर्मों की विविध साधनाओं और आम्नायों के अनुसार कर्मभेद का सूचन करते हैं। महर्षियों का कथन है कि संध्या में काललोप का उतना दोष नहीं लगता जितना कि क्रियालोप करने से लगता है। इसलिए विशेष कारणवश अथवा परिस्थितिवश यदि कदाचित समय में सम-विषम स्थिति आ जाए तो उसमें निम्नवत रूप से क्रिया करनी चाहिए : प्रातःकाल की संध्या पूर्ण करने के बाद ही मध्यान्हकाल की संध्या करें अथवा सायंकाल में सायंकालीन संध्या से पहले मध्यान्ह संध्या करके सायं संध्या करें। सायं संध्या के बाद ही तुरीय संध्या करें। यदि पंचमी संध्या मध्य रात्रि में न हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में शैयाकृत्य से पहले ही कर लें।

विशेष : प्रातः संध्या सब कालों में तथा सब कर्मों में प्रधान है क्योंकि इस संध्या को करने के पश्चात ही अन्यान्य साधनाओं का मार्ग प्रशस्त होता है।

पंचमकार का महत्त्व

वे तंत्र साधक जो वाममार्ग की दीक्षा से युक्त हैं, इस पंचमकार का उपयोग कर सकते हैं। पंचमकार समर्पण और उपयोग का विधान गूढ़ रहस्यों से परिपूर्ण तंत्र शास्त्रों में मिलता है। यह साधारण तंत्र साधकों के लिए नहीं है। जिन्होंने तंत्र का जटिल साधना मार्ग पार कर लिया है, उन्हें ही इसके समर्पण का अधिकार तथा पंचमकार स्तोत्र का पाठ करने का निर्देश दिया गया है। इस पंचमकार स्तोत्र में पार्वती जी भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं ः

देवदेव जगन्नाथ, कृपाकर, मयि प्रभो।

आगमोक्त-मकारांश्च ज्ञानमार्गेण ब्रूहि मे।।

अर्थात हे जगन्नाथ, देवों के देव प्रभु, कृपा करके मुझे आगमोक्त मकारों को ज्ञानमार्ग से परिभाषित करके समझाइए। प्रत्युत्तर में भगवान शिव कहते हैं ः

कलाः सप्तदश प्रोक्ता अमृतं स्राव्यते शशी।

प्रथमा सा विजानीयादितरे मद्यपायिनः।।

हे देवि, सप्तदश कलाएं कही गई हैं और चंद्रमा अमृत का स्रवण करता है। वही प्रथम मकार- मद्य है। शेष अन्य तो मदिरा मात्र हैं।

कर्माकर्मपशून हत्वा ज्ञानखड्गेन चैव हि।

द्वितीयं विंदते येन इतरे मांसभक्षकाः।।

जो ज्ञान खड्ग के द्वारा कर्म और अकर्म रूप पशुओं का हनन करता है, वह द्वितीय मकार- मांस है। अन्य तो केवल मांसाहारी ही हैं।

मनोमीनं तृतीयं च हत्वा संकल्पकल्पनाः।

स्वरूपाकार वृत्तिश्च शुद्धं मीनं तदुच्यते।।

मन रूपी मत्स्य का दमन करके व्यर्थ के संकल्पों को नष्ट कर स्वरूपाकार वृत्ति का संकल्प करना तृतीय मकार- मत्स्य है। यही शुद्ध मीन कहलाता है। 

You might also like