हिमाचल में हिंदी कहानी के विकास का टिप्पड़ा

डा. सुशील कुमार फुल्ल

मो.-9418080088

हिमाचली साहित्य वार्षिकी : भाग-दो

वर्ष 2019 में हिमाचल में साहित्य के क्षेत्र में क्या उपलब्धियां रहीं, इसका लेखा-जोखा हम प्रतिबिंब में देने जा रहे हैं। कहानी लेखन की दृष्टि से यह साल कैसा रहा, अन्य साहित्य का कितना सृजन हिमाचल में हुआ, इसका ब्योरा भी हम इस अंक में दे रहे हैं। साथ ही साहित्य सृजन की दृष्टि से इस साल को विभिन्न साहित्यकार कैसे देखते हैं, इस पर भी नजर डालेंगे। पेश है साहित्य वार्षिकी पर प्रतिबिंब की दूसरी किस्त:

हिमाचल की हिंदी कहानी समय-समय पर पर्याप्त चर्चा में रही है, कभी इसलिए कि यहां के लेखकों ने हिमाचली परिवेश को चित्रित करते हुए बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में विषयगत मौलिकता के कारण पाठकों को नए आस्वाद की कहानियां पढ़ने को दीं और कभी प्रचार-प्रसार में दक्षता के बल पर वाहवाही लूटी। यह समय का रंग है और आज का ढंग भी कि ईमानदारी से लिखो लेकिन उससे भी ज्यादा ईमानदारी से अपनी रचनाओं की चर्चा भी करवाओ। यह हिमाचल के कुछ कहानीकारों ने भी इस प्रकार से अपना जलवा दिखाया भी है, जिसे कुछ टिप्पणीकारों ने आतिथ्य शालीनता का नाम दिया है और कुछ ने इसे आदान-प्रदान स्वीकार किया है। हिप्प हिप्प हुर्रे कहानीकार बंधुओ। वर्ष 2019 में कहानी की पताका हिमाचल के बूढ़े सारथियों ने ही लहराई है। कुछ बैह्ड़ू कहानीकार भी हैं, जिन्होंने छिटपुट कहानियां लिख कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। मुझे यह कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं कि बूढे़ बैल कहानी के छकड़े को वर्षभर दौड़ाते रहे हैं। वरिष्ठ कथाकारों में योगेश्वर शर्मा सबसे ज्यादा सक्रिय रहे और उनके दो-दो कहानी संग्रह छप कर आए। बसावं आदि कहानी संग्रहों में उन्होंने दार्शनिक अंदाज में कहानियां लिखी हैं। ‘पीलिया’ जैसी प्रगतिशील कहानी लिखने वाले शर्मा जी ने ‘सड़क पर पहाड़’ जैसी कहानी लिख कर अपनी समकालीन वक्र दृष्टि का परिचय दिया है। पीसीके प्रेम का हिंदी कहानीकार ‘पीसीके प्रेम की चुनी हुई कहानियां’ में छटपटाता दिखाई देता है और पुकार-पुकार कर कहना चाहता है कि सुनो मैं अंग्रेजी में ही नहीं, हिंदी में भी कहानियां लिखता हूं, परंतु आज के आपाधापी के युग में कौन किसको सुनता है।

सुदर्शन वशिष्ठ तो प्रकाशन का जादूगर है ही। अब नयनाभिराम रूप में पंडित जी का संग्रह ‘मेरी प्रिय कहानियां’ के रूप में आया है। पहले संपूर्ण कहानियां आई थीं। लगे रहो मुन्ना भाई। केशव कहां पीछे रहने वाला है। प्रभात प्रकाशन की ‘मेरी लोकप्रिय कहानियां’ शृंखला में अपने दोस्त फुल्ल के अनुगामी के रूप में प्रकट हो गया है। ऐसा हो नहीं सकता कि एसआर हरनोट कोई जलवा न बिखेरें। लमही पत्रिका में हरनोट और राकेश की उपस्थिति हमें गौरवान्वित कर जाती है। बद्रीसिंह भाटिया, निरंजनदेव, चंद्ररेखा ढडवाल की कहानियां भी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी सक्रियता को रेखांकित करती हैं। यहां स्वर्गीय नरेश पंडित की कहानी ‘जहर की खेती’ का विशेष उल्लेख करना उचित होगा। पंडित की कहानियां यथार्थपरक प्रगतिशील कहानियां हैं, जो अपने कथ्य एवं संप्रेषण की चुभन के कारण सदा सराही जाएंगी। पहाड़ी एवं हिंदी के सक्षम कवि स्वर्गीय कृष्णगोपाल पीयूष गुलेरी का कहानी संग्रह ‘एक तथ्य अटका हुआ’ अभी हाल में ही आया है। पीयूष ने कुछ अच्छी चुभती हुई व्यंग्यपरक कहानियां भी लिखी हैं जैसे ‘महाफ्रौड’। वह यथार्थ घटनाओं के संयोजन से कहानी बुनता है और जहां वह कुल्हाड़ी चलाना चाहता है, निर्ममता से चला ही देता है। मेरा भी यह मानना है कि अधिकांश कहानियां वस्तुतः जीवन से उठाई घटनाओं पर ही आधारित होती हैं और यथार्थमय होने के कारण ही वे प्रभावशाली बन पाती हैं। कभी अवसर मिला तो मैं अपनी कहानियों के नायक-नायिकाओं को उधेड़ कर अपने पाठकों के समक्ष नंगा करूंगा, लेकिन फिलहाल नहीं। आरसी शर्मा, डा. सत्यपाल शर्मा, सुदर्शन भाटिया भी अपने रचनाकर्म में निरंतर व्यस्त हैं। हां, सुंदर लोहिया का चुप होना अखरता है। त्रिलोक मेहरा का ‘अंतिम राय का सच’ कहानी संग्रह उनके नए अवतार को रेखांकित करता है। कथानकों में उलझा रहने वाला कथाकार मेहरा अब शब्दों का जादूगर बन गया है। वाक्य विन्यास के माध्यम से भी वह पाठक को आतंकित करना चाहता है। ऐसा अक्सर होता है कि लेखक कई प्रकार से अपने शिल्प का कौशल दिखाना चाहता है। ‘लेखक की मौत’ जैसी अच्छी कहानी लिखने वाले वरिष्ठ लेखक राजेंद्र राजन ने यशपाल जयंती के अवसर पर जम्मू-कश्मीर में चल रही कनेक्टिविटी पर एक पिलपिली सी कहानी पढ़ी जो अच्छा थीम होने के बावजूद कहानी नहीं बन पाई, लेकिन राजन कब किसी की बात मानते हैं और घरवालों यानी हिमाचलियों की तो बिल्कुल नहीं।

अजय पाराशर भी कई तरह की कहानियां लिखने के कारण चर्चा में हैं। पौंगबांध विस्थापितों पर आधारित उनकी कहानी ‘अल्ला दित्ता उर्फ  देवीदित्ता हाजिर हो’ भी एक गोष्ठी में पढ़ी गई। मुरारी शर्मा का ‘ढोल पर थाप’ कहानी संग्रह कुछ हिमाचली आस्वाद को लेकर आया है। संदीप शर्मा बहुत कुछ कहना चाहता है अपनी कहानियों में, अच्छी बात है, लेकिन बड़ा अच्छा लगता है जब वह विस्तार के चक्कर में बद्रीसिंह भाटिया की तरह टेढे़-मेढ़े रास्तों में फंस जाता है। सुरेश शांडिल्य लगभग दो दशक से कहानियां लिख रहा है, परंतु अभी कोई संग्रह नहीं आया है। इस वर्ष उसकी कहानियां नास्तिक और काल विशेष चर्चित रहीं। एक लंबे अंतराल के बाद ज्ञान वर्मा ने फिर कथा-कहानियां लिखनी शुरू की हैं। दिल्ली में बस गए हैं मंडी जनपद के रहने वाले, इसलिए हिमाचल एवं महानगर के जीवन का मिला-जुला आस्वाद स्वाभाविक है। प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक की इस वर्ष छपी दो-तीन कहानियां ‘रिकवरी एजेंट’, ‘जो उसे मंजूर’ तथा ‘प्रतिशोध’ लेखक के कहानीकार को जीवित होने का प्रमाणपत्र देने के लिए काफी हैं। गुरमीत बेदी, कैलाश आहलूवालिया, रजनीकांत, हंसराज भारती, शेर सिंह, गंगाराम राजी, कृष्ण महादेविया, पवन चौहान, अशोक सरीन, कल्याण जग्गी, सुमन शेखर, रवि सांख्यान आदि भी कहानी कला में सक्रिय रहे। हिमाचल की कहानी निरंतर सरक रही है। कभी-कभी कहानीकार छलांगें भी लगाते हैं, परंतु कहानी के छकड़े को बूढ़े बैल ही दौड़ाए लिए जा रहे हैं, भले ही वे अपने-अपने ककून में बंद हैं, जहां तक उनके कथ्य और शिल्प की बात है। उमेश कुमार अश्क एक सितारा उभरा था, लेकिन घर-गृहस्थी एवं नौकरी में उलझ कर रह गया।शायद चुपचाप लिख भी रहा हो। हैट्स आफ  टू ओम भारद्वाज जो तेज-तेज दौड़ने और ज्यादा-ज्यादा लिखने के लिए व्यग्र है। विक्रम गथानिया, मनोज कुमार शिव और अतुल अंशुमान भी उदीयमान कहानीकार हैं। अनजाने में कोई महत्त्वपूर्ण नाम छूट गया हो, तो उसे आगामी चर्चा में शामिल करने का वादा रहा।

 

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