घृतमंडल पर्व बज्रेश्वरी मंदिर

By: Jan 11th, 2020 12:21 am

इस पर्व पर बज्रेश्वरी मंदिर कांगड़ा में घृतमंडल तैयार किया जाता है। गर्भगृह से लेकर प्रांगण तक मां के दिव्य भवन में मां के भक्तों का तांता लगा रहता है।  यह परंपरा देवीय काल से चली आ रही है और शक्तिपीठ मां बज्रेश्वरी के इतिहास से संबंधित है…

हिमाचल प्रदेश देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर देवी-देवताओं के कई चमत्कारी मंदिर स्थित हैं, उन्हीं में से जिला कांगड़ा में एक ऐसा अकेला शक्तिपीठ है, जहां माघ मास में आयोजित होने वाले पर्व के बाद मिलने वाले प्रसाद को आप खा नहीं सकते। मान्यता है कि शरीर के चर्म रोगों और जोड़ों के दर्द में लेप करने के लिए यह प्रसाद रामबाण का काम करता है। मकर संक्रांति पर्व पूरे देश के साथ-साथ कांगड़ा के नगरकोट धाम में भी मनाया जाता है। इस पर्व पर बज्रेश्वरी मंदिर कांगड़ा में घृतमंडल तैयार किया जाता है। गर्भगृह से लेकर प्रांगण तक मां के दिव्य भवन में मां के भक्तों का तांता लगा रहता है। यह परंपरा देवीय काल से चली आ रही है और शक्तिपीठ मां बज्रेश्वरी के इतिहास से संबंधित है। कहते हैं कि जालंधर दैत्य को मारते समय माता के शरीर पर कई चोटें लगी थीं। इन्हीं घावों को भरने के लिए देवताओं ने माता के शरीर पर घृत (मक्खन)का लेप किया था। इसी परंपरा के अनुसार देशी घी को 101 बार शीतल जल से धोकर इसका मक्खन तैयार कर, इसे माता की पिंडी पर चढ़ाया जाता है। मकर संक्रांति पर घृतमंडल पर्व को लेकर यह श्रद्धालुओं की ही आस्था है कि हर बार माता की पिंडी पर घृत की ऊंचाई बढ़ती जा रही है। मंदिर में घृत पर्व में माता की पिंडी पर करीब 18 क्विंटल मक्खन चढ़ाया जाता है। मां की पिंडी को मेवों, फूलों और फलों से सजाया जाता है। यह पर्व सात दिन तक चलता है। सातवें दिन माता की पिंडी से घृत उतारने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद घृत प्रसाद के तौर पर श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।  बज्रेश्वरी मंदिर के वरिष्ठ पुजारी कहते हैं कि मंदिर में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। घृत पर्व का प्रसाद चर्म और जोड़ों के दर्द में सहायक होता है। मंदिर में घृत प्रसाद के तौर पर श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। मंदिर के इतिहास पर छपी किताब में भी इस परंपरा का जिक्र है। घृत मंडल पर्व पर माता की पिंडी पर मक्खन चढ़ाने की प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो जाती है। स्थानीय और बाहरी लोगों द्वारा मंदिर में दान स्वरूप देशी घी पहुंचाया जाता है। मंदिर प्रशासन इस घी को 101 बार ठंडे पानी से धोकर मक्खन बनाने के लिए मंदिर के पुजारियों की एक कमेटी का गठन करता है। पुजारियों की यही कमेटी मक्खन की पिन्नियां बनाती है और 14 जनवरी को देर शाम माता की पिंडी पर मक्खन चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो सुबह तक जारी रहती है। मां के मंदिर में 14 जनवरी को मकर संक्रांति को घृतमंडल के उपलक्ष्य में भगवती जागरण का आयोजन भी किया जाता है। इस मौके पर पूरे मंदिर मार्ग को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है और इसके साथ ही मंदिर परिसर में फूलों की साज-सज्जा भी की जाती है, जो देखने में बहुत सुंदर लगती है।

 


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