अहा ! मैंने गधे का गधा बनाया

अशोक गौतम

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यार! बात तो कोई जरूर है। वर्ना गधे सुबह सुबह यों ही किसी को दर्शन दे कृतार्थ नहीं करते। गधा नजदीक आया तो अतिथि देवो भवः दिखाने की अपसंस्कृति के चलते पूछा,  नमस्कार बंधु! चाय पिओगे।

कौन सी है, आर्गेनिक या,

क्या बात है, जो आज सुबह- सुबह पड़ोसन के बदले तुमने दर्शन दिए। मैंने चाय की लंबी घूंट ले कप किनारे रखते उससे पूछा, तो उसने अपनी पूंछ मुझ पर फटकारते पूछा, ये क्या करते रहते हो तुम लोग। अब क्या कर दिया हम लोगों ने, असल में मुझे भी पता नहीं था कि अब हम लोग क्या कर गए, सो उससे हैरान होते पूछा तो वह समाज सुधारक की तरह गुस्साते बोला, आदमी-आदमी को तो तुमने बांट कर रख ही दिया, पर अब लीद-लीद में भी राजनीति करने लगे। मतलब मैं समझा नहीं दोस्त! मैंने उसके सामने गधा होते उसके कान सहलाते कहा ताकि वह माहौल को और लदीला न बना डाले तो वह अपने कान झटकता बोला, ये मत समझो कि गधे अभी भी गधे ही हैं। गधों के बारे में अपनी शताब्दी पहले बनाई सोच बदलो। अब देश के साथ-साथ गधा भी बदल रहा है। नहीं तो, मैंने ऐसा कब कहा कि गधे अभी भी गधे ही हैं। बल्कि अब तो तुम्हारे आचार व्यवहार से प्रसन्न होकर आदमी भी धीरे-धीरे गधे हो रहे हैं। तुमने हमारी लीद में दरार डालते हुए घोड़ों की लीद से तो मिथेन, सीएनजी बनाने की योजना बना घोड़ों को कहने को तो गधों से जुदा तो कर दिया पर, वह चेतावनी की मुद्रा में। ओह यार! अब समझा! क्या है न उनकी लीद वातावरण को प्रदूषित कर रही थी सो.

और जो हमारी उनकी लीद से अधिक तुम्हारी सोच वातावरण को प्रदूषित कर रही है, उसके बारे में भी सोचा कभी।

अरे यार! ऐसी रोमैंटिक सुबह को लीद-लीद कर क्यों वसंत को लीद कर रहे हो

ये देखो, उसने मेरे दरवाजे पर फेंका अखबार उठा उसे खोल मुझे दिखाते कहा, अब घोड़ों की लीद से तुम्हारे वैज्ञानिक मिथेन सीएनजी बनाएंगे। उससे होटलों में टूरिस्टों के लिए खाना बनेगा। आदमी-आदमी में तो तुम वैसे वैसे भेद कर ही रहे हो, जैसे-जैसे सदी दर सदी आगे बढ़ रहे हो, पर अब जब समाज में जुदा करने को कुछ न बचा तो लीद-लीद में भी फूट डाल दी। तुम अपने गू को लेकर एक हों या न कह उसने कुर्सी पर रखे मेरे तौलिये से अपना नाक साफ  कर आगे कहा, माना बंधु! हम जात के गधे हैं। पर इतने गदहे भी नहीं कि… कह उसने अपनी लीद को लेकर आपत्ति दर्ज की तो मैंने उसे समझाते कहा, देखो भाईजान ! ऐसा वैसा कुछ नहीं, जैसा तुम समझ रहे हो ! हम तो तुम्हारी लीद को लेकर तुम्हारे लीदने से ही बड़े संजीदा रहे हैं दोस्त! हम तो तुम्हारी लीद का रेशम की चादर बिछाए इंतजार करते रहते हैं कि तुम कब जैसे लीदो। शायद तुम्हें पता हो या नए पर  हम हर पिसे मसाले में शान से तुम्हारी लीद डाल अपने जायके को तड़का लगाते रहे हैं। हम तो तुम्हारी लीद के इतने कायल हैं बंधु कि जितने और तुम कहते हो कि… हमारे बारे में अपनी लीद को लेकर इतना गलत आखिर तुमने सोच कैसे लिया।

मतलब… वह कुछ नार्मल हुआ।

मतलब यह कि… एक अंदर की बात बताऊं! अरे डियर! तुम्हारी लीद को तो वैज्ञानिक घोड़ों की लीद से भी उपयोगी बताने पर शोध कर रहे हैं। मतलब, आखिर गदहा मेरी बातों में उलझ ही गया, देखना, कल को तुम्हारी लीद से आदमी में हवा भरने वाली गैस का प्लांट लगने वाला है। सरकार ने तो उस प्लांट के लिए बजट भी तय कर दिया है। यही नहीं, तुम्हारी लीद के गुणों को लेकर और भी चोरी छिपे प्रयोगशालाओं में बीसियों प्रयोग और चल रहे हैं। तुम्हें क्या पता, आने वाले दिनों में मानवों के लिए तुम्हारी लीद घोड़ों की लीद से भी कितनी गुणकारी होगी, मैंने कहा तो वह मेरे पांव में लीद करने के बाद मुस्कराता बोला, बाबू संभाल कर रखना। क्या पता कल को तुम्हारे किस रूप में काम आए और गधियाता  मुस्कराता मेरे दिमाग को दाद देता आगे हो लिया। मित्रो! आदमी का गदहा बनाना जितना आसान होता है, आसान गधे से गधे का गधा बनाना उतना ही कठिन।

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