और कितने शाहीन बाग?

सर्वोच्च न्यायालय के वार्ताकार अपने मिशन में कामयाब नहीं हो सके। वे शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त भी नहीं कर सके। अब वार्ताकारों की रपट शीर्ष अदालत के सामने होगी। एक और वार्ताकार वजाहत हबीबुल्लाह ने भी अदालत में हलफनामा देकर पुलिस पर ही दोष मढ़ा है कि उसने ही रास्ते जाम कर रखे हैं। बहरहाल सर्वोच्च अदालत में सुनवाई है और उसके फैसले का विश्लेषण बाद में करेंगे, लेकिन इस बीच शर्मनाक, दुर्भाग्यपूर्ण, देशविरोधी और असंवैधानिक घटनाएं सामने आई हैं। फिलहाल 72 दिन पुराना शाहीन बाग अब भी जिंदा है, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में ही कुछ और धरने स्थापित हो गए हैं। मेट्रो स्टेशन के नीचे ही औरतों ने प्रदर्शन शुरू किए हैं। कइयों की गोद में मासूम शिशु हैं। शायद उन्हें एहसास तक नहीं है कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत अवैध धरनों में बच्चों को ले जाना भी एक अपराध है। बहरहाल धरने-प्रदर्शन ही होते तो गनीमत थी, क्योंकि उन्हें संवैधानिक अधिकार के दायरे में माना जाता रहा है, लेकिन दिल्ली और अलीगढ़ के मुस्लिम बहुल इलाकों में पथराव किए गए, वाहनों को आग लगा दी गई। ऐसी हिंसा में करीब 60 लोग घायल हुए हैं। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और कुछ लाठीचार्ज करना पड़ा। शर्मनाक यह है कि फिर भी उपद्रवी अपनी तुलना महात्मा गांधी से कर रहे हैं। सभी प्रदर्शनों में वही तेवर, वही उत्तेजना, वही हल्ला बोल, वही अराजकता और आजादी के नारे…! क्या इसे आंदोलन की संज्ञा दी जा सकती है। यह साफतौर पर सांप्रदायिक विरोध है, जो पूरी तरह अतार्किक है। ऐसा लगता है, देश भीड़ के हवाले कर दिया गया है। भीड़ ही संविधान की व्याख्या करेगी और सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले को स्वीकार करेगी, जो उस भीड़ के मनमुताबिक होगा। यह भीड़ अराजक ही नहीं, हिंसक भी हो रही है। भीड़ विवेकहीन और दिमागहीन होती है। जब नए शाहीन बाग के वीडियो सर्वोच्च अदालत के सामने होंगे, तब उसे भी व्याख्या करनी होगी कि ऐसी पत्थरबाज भीड़ के धरने-प्रदर्शन करने के भी संवैधानिक अधिकार होते हैं? आखिर और कितने शाहीन बाग सजाने की इजाजत यह देश देगा? देश की छवि पर नफरत के पथराव की चिंता किसी को है या नहीं? आखिर इन सुनियोजित हमलों के पीछे कौन सी संगठित ताकतें काम कर रही हैं? यह नागरिक कानून और संभावित एनआरसी का ही विरोध नहीं है, बल्कि देश के खिलाफ  परोक्ष सियासी जेहाद है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप भारत के दौरे पर हैं। जिस आगरा में टं्रप दंपति ताजमहल देखने गए थे, वहां से करीब 80-90 किलोमीटर की दूरी पर अलीगढ़ है। बेशक अराजकता और हिंसा के दृश्य राष्ट्रपति टं्रप की आंखों से नहीं गुजरेंगे, लेकिन वह दुनिया के सबसे महाबली राष्ट्राध्यक्ष हैं। क्या उन्हें ब्रीफ  नहीं मिलेगा कि सीएए, एनपीआर, एनआरसी के विरोध को लेकर भारत में कितने शाहीन बाग सक्रिय हो चुके हैं? टं्रप के वाशिंगटन से रवाना होने के पहले ‘व्हाइट हाउस’ ने इन मुद्दों पर बयान दिया था और अपना चिंतित सरोकार जताया था। हमने उस बयान की आलोचना करते हुए लक्ष्मण-रेखा लांघना माना था, लेकिन इन उपद्रवों के बाद भारत क्या सफाई देगा? अब कानून के विरोधियों के सामने कानून के समर्थक भी सड़क पर आने लगे हैं। जाहिर है कि टकराव पैदा होगा और आम जनता बंधक बनकर रह जाएगी। दरअसल धरनों पर बैठी भीड़ सिर्फ  कानून का ही विरोध नहीं कर रही, बल्कि उसका मकसद कुछ और ही है। यह सरकार का दायित्व है कि संवाद करके उस मकसद को जानने की कोशिश करे। यदि देशविरोधी मंसूबे ही सामने आते हैं, तो निर्णायक कार्रवाई करे। यह राजनीतिक फायदा लेने का वक्त नहीं है। देश को सीधी चुनौती दी जा रही है। आज पथराव किया गया है, तो कल गोलियां भी चल सकती हैं। यदि सर्वोच्च अदालत का फैसला भी शाहीन बागों को मंजूर नहीं हुआ और प्रशासन पर दारोमदार छोड़ दिया गया, तो फिर सरकार क्या कार्रवाई करेगी?

 

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