गौरवमय इतिहास के प्रतीक हैं शिव मंदिर

नारायणगढ़शिवालिक की पहाडि़यां अपने गर्भ में हमारे अतीत का गौरवमय इतिहास और संस्कृति समाहित किए हुए है। कहीं तो इनमें खनिज तत्वों के भरपूर भंडार हैं, तो कहीं संस्कृति की अनुपम धरोहर इनमें सहेज कर रखी हुई है। नारायणगढ़ को शायद भगवान ने अनेकों अमूल्य धरोहरें प्रदान की हुई हैं।  नारायणगढ़ के कालाआंब के नजदीक भगवान शंकर के दो ऐसे प्राचीन तीर्थ स्थान स्थित हैं, जिनमें से एक का संबंध रामायणकाल से है तथा दूसरे का महाभारत काल से। भगवान शंकर के ये तीर्थ स्थल हैं सतकुंभा तथा पौढ़ीवाला। सतकुंभा सिंधुवन का ही एक भाग है। यह स्थान कालाआंब से यमुनानगर मार्ग पर लगभाग 4 किलोमीटर की दूरी पर गाँव झण्डेवाला के नजदीक स्थित है। इस स्थान पर पानी की सात धाराएं पत्थर से निरंतर बह रही हैं। यह प्राचीन तीर्थ महाभारत काल से संबंधित है। किंवदन्ती है कि पांडव युद्ध के परिणाम पर विचार करने लगे कि उन्होंने इस युद्ध में कया खेया और कया पाया। उनके मन में बार—बार यही विचार आ रहा था कि उनके हाथ कितने ही लोगों का रकत बहा, कितने ही निर्दोष अपनी जान से हाथ धो बैठे। युधिष्ठर का मन तो पहले ही आत्मगलानी से भर चुका था। उन्हें अपनी विजय में भी पराजय नजर आने लगी। वे सब इकटठे होकर माता कुन्ती के साथ एक ऋषि के पास गए। ऋषि ने उन्हे बताया कि फाल्गुनी अमावस्या को सात पवित्र नदियों के जल सबसे पहले स्नान करने से सभी पाप दूर हो जाते है। यदि तुम उस दिन सभी सात पवित्र नदियों के जल में स्नान करने में सफल हो जाते हो तो तुम्हारे सभी पाप दूर हो जाएंगे। फाल्गुनी अमावस्या को सभी पांडव बहुत सवेरे उठकर स्नान के लिए चल दिए। वे जब पहली नदी पर पहुंचे तो देखते हैं कि भगवान शंकर ने पहले ही वहां से जल अपने  कमंडल में ले लिया। वे दूसरी नदी की और शीघ्रता से बढ़े परंतु भगवान शंकर वहां भी उनसे पहले पहुंच गए और कमण्डल में जल ले लिया। पाँचों पाण्डव कुन्ती और द्रौपदी सहित भगवान शंकर  का पीछा करने लगे। वे पीछे-पीछे और भगवान शंकर उनके आगे-आगे। चलते-चलते वे इन शिवालिक की पहाडि़यों में पहुंच गए। भगवान शंकर  ने वहां भैंसे का रूप धारण कर लिया। उनका कमण्डल उनकी पीठ पर रखा हुआ था। पांडव उनकी तरफ बढ़े तो उसके उपर रखा कमंडल पत्थर पर गिर पड़ा। भगवान शंकर अपने असली रूप में आकर अंतर्ध्यान हो गए। पाण्डवों ने पत्थर पर गिरे पवित्र तल के छींटे अपने शरीर पर दिए तथा हिमालय की ओर चले गए। आज भी उस पत्थर से सात धाराएं निकल रही हैं। लोग फाल्गुनी अमावस्या को यहां स्नान करने आते हैं।

You might also like