ज्यादा खर्चीले हुए भारतीय

अर्थव्यवस्था में सुस्ती के बीच 15 साल के निम्न स्तर पर पहुंची सेविंग

नई दिल्ली – इकोनॉमी की सुस्ती ने हमारी बचत वाली जेब में भी गहरा छेद कर दिया है। सुस्ती की गहराई इतनी है कि बचत 15 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। घरेलू बचत में आई कमी के चलते देश की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति बिगड़ी है। देश में निवेश कम होने और पूंजी के लिए विदेश का रुख किए जाने से इसकी हालत पहले से ही खराब है। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और ट्रैवल पर खर्च बढ़ने से घरेलू बचत में गिरावट आई है, जिसका शेयर देश की कुल बचत में लगभग 60 पर्सेंट है। वित्त वर्ष 2018-2019 में बचत का प्रतिशत जीडीपी का 30.1 फीसदी पर पहुंच गया, जो 2011-12 में 34.6 फीसदी था और 2007-08 में 36 फीसदी। इकोनॉमी में कुल बचत का 60 फीसदी हिस्सा परिवारों से आता है। जीडीपी में पर्सेंटेज के लिहाज से देखें, तो पिछले साल यह 2012 के 23 फीसदी से घटकर 18 फीसदी रह गया। एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजल भंडारी ने बताया कि टिकाऊ आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने के लिए देश में निवेश की दर बढ़ानी होगी, लेकिन निवेश के लिए फंड की जरूरत होती है। अगर घरेलू बचत में कमी आ रही है तो विदेश से फंड जुटाने का सरकार का फैसला सही है।

देश में बचत कम होने की वजह

आर्थिक सुस्ती की मुख्य वजह कमजोर खपत है, लेकिन घटती बचत के पीछे की प्रमुख वजह ज्यादा खरीददारी को माना जा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बचत घटने की दो वजहें हो सकती हैं। पहली, ज्यादा खरीददारी में दिलचस्पी और दूसरी, लोगों द्वारा हैल्थ-एजुकेशन जैसी सेवाओं पर पहले से ज्यादा खर्च, जो महंगी हैं। इकॉनोमिस्ट्स बचत दर में गिरावट का जिम्मेदार कुछ हद तक मौजूदा आर्थिक सुस्ती को ठहरा रहे हैं। यूबीएस सिक्यॉरिटीज अपनी रिपोर्ट में लिखती है कि हमारे हिसाब से लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक ग्रोथ घटकर 6.5 पर्सेंट पर आ सकती है जो तीन साल पहले इसके 7.1 पर्सेंट रहने का अनुमान दिया गया था। इसकी वजह कुछ हद तक मैक्रोइकोनॉमिक इम्बैलेंस है जो बचत में कमी और निवेश में सुस्ती के वजह से बनी है।

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