ट्रंप के मायने कारोबार नहीं

Feb 22nd, 2020 12:05 am

अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के भारत-प्रवास को लेकर उन्हीं के देश में एक वर्ग विरोध कर रहा है। इधर भारत में प्रधानमंत्री मोदी का भी आलोचक वर्ग है कि जब अमरीका के साथ कोई ठोस व्यापार समझौता विचाराधीन नहीं है, तो आर्थिक सुस्ती के दौर में 120 करोड़ रुपए क्यों खर्च किए जा रहे हैं? हमने महसूस किया है कि सड़क के स्तर पर आम आदमी भी प्रधानमंत्री मोदी को कोस रहा है। अमरीका में प्रमुख विपक्षी डेमोक्रेट्स राष्ट्रपति ट्रंप को दोबारा व्हाइट हाउस में देखना नहीं चाहते, लेकिन डेमोक्रेट्स के पास कोई ऐसा सशक्त चेहरा भी नहीं है, जो ट्रंप को टक्कर दे सके। बहरहाल डेमोक्रेट्स ने ट्रंप के भारत-प्रवास पर कई सवाल उठाए हैं और वे किसी भी मुद्दे पर विदेश नीति समेत अपने राष्ट्रपति से सहमत नहीं हैं। दूसरी तरफ, भारत में प्रधानमंत्री मोदी को महाभियोग के जरिए सत्ता से बाहर नहीं किया जा सकता, लिहाजा दोनों ही देशों में तीव्र धु्रवीकरण और सियासी विभाजन की स्थितियां हैं। बहरहाल राष्ट्रपति ट्रंप भारत सरकार के ही नहीं, पूरे देश के मेहमान हैं। यही हमारी संस्कृति है। मेहमान के मायने सिर्फ  व्यापार ही नहीं होता, कई स्तरों पर रिश्ते स्थापित और मजबूत करने पड़ते हैं। यही द्विपक्षीय संबंधों का तकाजा है। भारत और अमरीका के संबंध सिर्फ  व्यापार समझौते तक ही सीमित नहीं हैं। दोनों रणनीतिक साझेदार भी हैं। विश्व की महाशक्ति हमारे साथ खड़ी है, यह क्या कमतर है, लेकिन भारत-अमरीका संबंधों पर हमेशा एक विरोधाभासी विमर्श जारी रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक समीकरण इतने सशक्त हुए हैं कि आज उनका उपहास उड़ाना बेवकूफी है। वर्ष 1995 से शुरू करें तो तब दोनों देशों का दोतरफा व्यापार, वस्तुओं और सेवाओं समेत करीब 11 अरब डालर था। 2018 में यह करीब 140 अरब डालर के पार चला गया। बीते वर्ष 2019 में करीब 150 अरब डालर से भी अधिक होगा। अधिकृत आंकड़े अभी सार्वजनिक किए जाने हैं। जाहिर है कि बीते 25 सालों में दोतरफा कारोबार में इतनी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि दोनों देशों ने बीते कुछ सालों के दौरान व्यापार को 500 अरब डालर तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन यह महत्त्वाकांक्षा अभी अधूरी है, लिहाजा उसी परिप्रेक्ष्य में भारत-अमरीका के व्यापार-विवादों का विश्लेषण गंभीरता से किया जाना चाहिए। बेशक बीते सितंबर में जब प्रधानमंत्री मोदी न्यूयॉर्क में राष्ट्रपति ट्रंप से मिले थे, तो राजनयिक स्तर पर संकेत दिए गए थे कि व्यापार-समझौता करीब ही है। वह नहीं हो पाया या इस दौरे में भी प्रस्तावित नहीं है, लेकिन जब दोनों नेता द्विपक्षीय स्तर पर संवाद करेंगे, तो कुछ संकेत सामने आ सकते हैं। समझना चाहिए कि अमरीका में नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनकर इस पद के लिए दोबारा जनादेश मांगेंगे। उसके मद्देनजर यह दौरा चुनावी भी है और सौहार्द्र वाला भी है। इसके संकेत ह्यूस्टन में ‘हाउदी मोदी’ आयोजन के दौरान स्पष्ट हो गए थे। अमरीकी राष्ट्रपति पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री के मंच पर आए थे। दरअसल अमरीका में करीब 44.60 लाख भारतीय हैं, जिनमें से करीब 12 लाख गुजराती हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी गुजराती हैं और ट्रंप को गुजरातियों के वोट की दरकार है। अमरीकी भारतीय परंपरा या मानसिकता के आधार पर डेमोक्रेट्स को वोट देते रहे हैं, लिहाजा ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी के सहारे उन वोटों में गहरी सेंध लगाने की राजनीति खेल रहे हैं। हमारे अंतरराष्ट्रीय मेहमान के लिए अहमदाबाद में कुछ असामान्य गतिविधियां चलाई गई हैं। मसलन झुग्गी-झोंपड़ी की दुनिया को छिपाने के लिए दीवार बनाई गई है। अहमदाबाद की अपनी आबादी करीब 55 लाख होगी। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बयान दिया था कि वहां 70 लाख लोग उनका स्वागत करेंगे। इसे हास्यास्पद्  कहा गया, लेकिन ऐसा कहने वाले नहीं जानते कि भीड़ जुटाना किसी भी सरकार और दल के लिए रूटीन काम है। दूसरे, क्या अमरीकी राष्ट्रपति नहीं जानते कि भारत में अब भी एक तबका बहुत गरीब है, वहां झुग्गी-झोंपड़ी की भी दुनिया है? तो उनसे छिपाने के लिए दीवार नहीं बनाई गई है। इसमें सुरक्षा की सावधानी भी है। साथ में यह आमतौर पर रहा है कि घर में कोई मेहमान आता है, तो हम अपनी कमियों और कुरूपताओं को छिपाकर ही रखना चाहते हैं। उसी बहाने घर की सफाई भी हो जाती है। यदि उसके मद्देनजर यमुना नदी की बदबू को रोकने के लिए कुछ पानी छोड़ा गया है, कुछ सड़कें बेहतर हुई हैं, कुछ सजावट की गई है और एक लाख  दर्शकों की क्षमता वाला क्रिकेट स्टेडियम वक्त से पहले बनवा दिया गया है, तो इसमें सरकारों ने क्या अपराध कर दिए? बहरहाल अमरीकी राष्ट्रपति पहली बार भारत प्रवास पर 24-25 फरवरी को हमारे बीच रहेंगे, तो देखना चाहिए कि सकारात्मक क्या होता है?

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