दिल्ली को जलाने की साजिश

Feb 27th, 2020 12:05 am

अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप अपने देश लौटने से पहले प्रधानमंत्री मोदी और उनके फैसलों पर मुहर लगा गए। बल्कि हरी झंडी दे गए। सबसे ज्यादा धार्मिक आजादी को सराहा कि कई अन्य देशों की तुलना में धर्म की ज्यादा स्वतंत्रता भारत में है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति टं्रप ने इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा की। अमरीकी राष्ट्रपति ने यहां तक सत्यापित किया कि प्रधानमंत्री मोदी मुसलमानों और ईसाइयों के लिए भी काम कर रहे हैं। इस संदर्भ में विवादास्पद नागरिक कानून और दिल्ली की हिंसा पर दोनों में कोई चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता टं्रप ने इनके बारे में सुना जरूर था और कहा कि ये भारत के अपने मामले हैं। उसे खुद देखना है, लिहाजा वह कुछ नहीं बोले। अमरीकी राष्ट्रपति ने माना कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को मोदी सरकार ने सोच-समझ कर हटाया। बाद में विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला ने ब्रीफ  किया कि प्रधानमंत्री ने कश्मीर के हालात पर टं्रप को जानकारी दी और विदेशी राजदूतों के प्रवास के बारे में भी बताया। हालांकि प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान राष्ट्रपति टं्रप ने एक बार फिर कश्मीर पर मध्यस्थता की बात दोहराई। दरअसल ऐसे में,जब अमरीकी राष्ट्रपति राजघाट पर जाकर महात्मा गांधी की समाधि को नमन कर रहे थे और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय संवाद करने के बाद साझा बयान जारी कर रहे थे, तो उसी  दौरान कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर दिल्ली जल रही थी। गोलियां चलाई गईं, पथराव किए गए, शीशे के टुकड़े फेंके गए। बाजार, दुकानों, गोदाम, वाहनों और घरों तक में आग लगा दी गई। कई इलाकों की अर्थव्यवस्था ही बर्बाद कर दी गई। पत्रकारों पर भी जानलेवा हमले किए गए। यह सब कुछ अमरीकी राष्ट्रपति की मौजूदगी के वक्त किया गया,जब विदेशी मीडिया की निगाहें और फोकस भारत की राजधानी दिल्ली पर था। हिंसा में अभी तक 22 मौतें हो चुकी हैं, 50 से अधिक पुलिसवालों समेत करीब 200 लोग घायल हैं। दो आईपीएस अफसर भी गंभीर रूप से जख्मी हुए और अस्पताल के आईसीयू में उपचाराधीन हैं। हवलदार रतनलाल की शहादत फिलहाल तो भुलाई नहीं जा सकती। गौरतलब यह है कि 44 लोग गोलियां लगने से घायल हुए हैं। बेशक यह सामान्य हिंसा नहीं, सांप्रदायिक दंगों का ही रूप था। लगातार तीन दिन से यह हिंसक दौर जारी रहा है। आखिर इनसान ने ही इनसान को लहूलुहान किया, मौत की नींद सुलाया। मरने वालों की कोई जाति, कोई धर्म नहीं था। बेशक सरकार कोई भी स्पष्टीकरण देती रहे। आखिर देश की राजधानी में ऐसे हालात एकाएक कैसे बने? दंगाइयों के हाथ  में पिस्तौलें या रिवाल्वर कैसे आए? पत्थर कैसे जमा किए गए, जिसकी भनक न तो पुलिस और न ही खुफिया एजेंसियों को लग सकी? अर्द्धसैनिक बलों की 35 कंपनियों की तैनाती के बावजूद दिल्ली कैसे जला दी गई? क्या पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथ बांध दिए गए थे? क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश काम कर रही थी? अब हालात ऐसे हैं कि राजधानी के चार इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा है और उत्तरी पूर्वी दिल्ली में एक माह तक धारा 144 लागू रहेगी। इसका खौफ भी खत्म लगता है,क्योंकि दंगे भड़कने के दौरान भी धारा 144 लागू थी। इन हालात और हिंसा पर किसको कोसें? कब तक शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण सरीखे शब्दों का इस्तेमाल करते रहें? मौतें जरूर हुईं, लेकिन किसी की नागरिकता छिनने की कोई खबर नहीं है। चर्चा और विमर्श इस पहलू पर होनी चाहिए थी कि भारत-अमरीका कितने घनिष्ठ रणनीतिक साझेदार देश बन गए हैं। अमरीका के साथ तीन अरब डालर के रक्षा सौदे पर सहमति हुई है। तेल, गैस, ऊर्जा, उच्च शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, नशीले पदार्थों की तस्करी और प्रौद्योगिकी आदि मुद्दों को लेकर करारों पर हस्ताक्षर किए गए हैं अथवा सैद्धांतिक सहमति बन गई है। बेशक यह भारत-अमरीकी दोस्ती का नया अध्याय है।  यदि टं्रप दोबारा चुनाव जीतते हैं, तो दोनों देशों के बीच के गतिरोध भी समाप्त होंगे और व्यापार समझौता होने के आसार प्रबल होंगे, लेकिन राष्ट्रीय सरोकारों की किसे चिंता है? देश की राजधानी इतनी अजीब,आपराधिक और बदहवास लग रही है कि ढेरों सवाल मन-मस्तिष्क में कौंध रहे हैं। यदि कोई साजिश है, तो उसे तुरंत पकड़ कर कार्रवाई की जानी चाहिए। आखिर दिल्ली के कुछ हिस्से यूं ही कब तक ‘राख’ होते रहेंगे।

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