पहाड़ की दहलीज पर नशे की दस्तक

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

‘कोटपा’ एक्ट के अंतर्गत शिक्षण सस्थानों के सौ वर्ग गज के दायरे के भीतर तंबाकू उत्पाद बेचने पर पूर्णतः रोक है तथा 18 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को तंबाकू पदार्थ बेचना दंडनीय अपराध है, हालांकि धूम्रपान के मामले में भारतीय रेलवे ने 1989 से ही रेलगाड़ी या रेल परिसर में कानूनी तौर पर धूम्रपान को वर्जित किया था…

कुछ ही महीने पहले समूचे हिमाचल प्रदेश में 15 नवंबर 2019 से 15 दिसंबर 2019 तक नशीले पदार्थों एवं मादक द्रव्यों के खिलाफ  प्रदेश व्यापी अभियान चलाया गया। प्रदेश में नशाखोरी की बढ़ती घटनाओं पर नियंत्रण के लिए राज्य सरकार ने नशा निवारण टोल फ्री हेल्पलाइन नं. 1908 भी जारी किया है तथा ‘ड्रग फ्री हिमाचल ऐप भी लांच की है, लेकिन इसके बावजूद नशे की आमद में बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। राज्य में नशे के विरुद्ध 2018 में 1341 तथा गए साल 2019 में 1450 मामले दर्ज हुए और यह सिलसिला अनवरत जारी है। इस अवैध कारोबार में महिलाओं की संलिप्तता भी बढ़ रही है। चिंताजनक बात यह है कि इस कातिल नशे की जद में सबसे ज्यादा मुल्क का मुस्तकबिल युवा वेग है जो सिंथेटिक ड्रग्स जैसे घातक नशे की गिरफ्त में जाकर मौत की आगोश में जा रहा है। वास्तव में नशे का खुमार धूम्रपान से शुरू होता है और यही जानलेवा धूम्रपान नशे की पृष्ठभूमि बनकर बाकी प्रकार के नशों को दावत देता है जबकि मई 2003 से पूरे देशभर में ‘कोटपा ‘सिगरेट एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट एक्ट लागू है। जिसके तहत किसी भी कार्यस्थल या सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषिद्ध है तथा तम्बाकू उत्पादों से जुड़े या अन्य मादक पदार्थों के विज्ञापन व प्रोमोशन तथा किसी प्रकार का प्रोत्साहन भी प्रतिबंधित है। कोटपा एक्ट के अंतर्गत शिक्षण सस्थानों के सौ वर्ग गज के दायरे के भीतर तम्बाकू उत्पाद बेचने पर पूर्णत: रोक है तथा 18 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को तंबाकू पदार्थ बेचना दंडनीय अपराध है हालांकि धूम्रपान के मामले में भारतीय रेलवे ने 1989 से ही रेलगाड़ी या रेल परिसर में कानूनी तौर पर धूम्रपान को वर्जित किया था।

मगर हैरत इस बात की है कि कोटपा अधिनियम के प्रावधानों पर सख्ती से पालन नहीं होता, नतीजतन छात्रों का बड़ा वर्ग बचपन से ही धूम्रपान की गिरफ्त में आ जाता है और यहीं से दूसरे नशों की पटकथा शुरू हो जाती है। इसलिए नशामुक्त वातावरण के लिए जरूरी है कि कोटपा एक्ट की शर्तों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करके इनका सख्ती से पालन किया जाए। कोटपा एक्ट के अलावा प्रदेश में नशे से निपटने तथा नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध के लिए नशा निवारण बोर्ड का गठन भी हुआ हैं। नशे की लत छुड़ाने के लिए नशामुक्ति केंद्र भी खोले गए है। नशे के विरुद्ध देशभर में नशामुक्ति संकल्प दिवस, तंबाकू निषेध दिवस जैसे समारोहों का आयोजन भी किया जाता है, लेकिन इन सबके बावजूद युवा वर्ग को खोखला करने वाले नशीले पदार्थों तथा मादक द्रव्यों के सेवन की बढ़ती खौफनाक प्रवृत्ति में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। ड्रग तस्कर युवाओं को नशीले पदार्थ पहुंचाने के लिए कई तरह के हथकंडे इजाद कर रहे हैं। नशा माफिया की नजर ज्यादातर शिक्षण संस्थानों पर होती है जिस कारण शिक्षित युवा वर्ग भी नशाखोरी की चपेट में आ चुका है, जबकि युवाशक्ति की ऊर्जावान ताकत व जोश मुल्क में खेल की दुनिया, कृषि क्षेत्र, उद्योग जगत या अन्य रचनात्मक कार्यों में तबदीली लाने की पूरी कुत्वत रखता है, बशर्ते उसे सही दिशा व मार्गदर्शन मिले। मगर युवाओं की जो आयु उनके जीवन का लक्ष्य तय करने की है वर्तमान में ज्यादातर युवा उस उम्र में नशे का दामन थामकर कई सामाजिक मूल्यों व उच्च आदर्शों से दूर हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार नशे की गर्त में जाने वाले अधिकांश युवाओं की आयु 15 से 25 वर्ष है। समझना जरूरी है कि देश के युवावेग के खिलाफ  नशे के रूप में चल रहे इस खामोश युद्ध के षड्यंत्र में क्रॉस एलओसी ट्रेड की भूमिका कई सालों से रही है। जब देश की सरहदें पाकिस्तान जैसे आतंक व नशे के निर्यातक बेगैरत मुल्क तथा चीन जैसे शातिर देश से लगती हों तो देश में चौकन्ना खुफिया तंत्र तथा सरहदों के प्रहरी सुरक्षों बलों को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए युवाशक्ति की सबसे ज्यादा जरूरत सेना व अन्य सुरक्षाबलों को है, मगर वही युवा पीढ़ी जिनके कंधों पर देश रक्षा जैसी जिम्मेदारियां आने वाली हैं, किशोरावस्था से ही नशा माफिया के निशाने पर हैं। युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों से सतर्क रखने तथा नशे की लत लगने वाली परिस्थितियों के बारे में अवगत करवाना जरूरी है, लेकिन नशे के खिलाफ  सड़कों पर नशा निवारण रैलियां, जुलूस, जागरूकता सेमिनार जैसे अभियानों से ड्रग तस्करों को कोई फर्क नहीं पड़ता, न कोई असर होता है। नशेडि़यों व नशे के गोरखधंधे में शामिल तस्करों से जेलें भरने से भी कोई हल नहीं निकल रहा इसलिए सियासत व प्रशासन को सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर इच्छाशक्ति दिखाकर ड्रग के बड़े सरगनाओं के गिरेबान तक पहुंचने की पुख्ता तजवीज का रोडमैप तैयार करके नशा माफिया की सरपरस्ती पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई को अंजाम देकर नशे के बडे़ सौदागरों के जहन में खौफ  पैदा करना होगा। चूंकि प्रदेश की सीमाएं पांच राज्यों से सटी हैं, जब तक सरहदी इलाकों से अवैध नशे की आ रही खेपों तथा ड्रग माफिया के फल-फूल रहे नशे के साम्राज्य पर माकूल प्रहार करके नशीले पदार्थों की सप्लाई लाइन को नेस्तनाबूद करके नशे की अवैध तस्करी का नेटवर्क ध्वस्त नहीं किया जाएगा तब तक राज्य में नशा माफिया की सक्रियता कम नहीं होगी, बल्कि युवाओं की जिंदगी लीलने वाला नशा रूपी धीमा जहर युवावेग की नसों में घुलता रहेगा। दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने वाली राज्य की रमणीक वादियों में प्रवासी व विदेशी नशा तस्कर पनाह ले रहे हैं जिस कारण पहाड़ के लिए नशा एक गंभीर चुनौती व बड़ी बुराई का प्रतीक बनकर उभर रहा है। सादगी व ईमानदार छवि वाले राज्य में पैर पसार चुके नशे से यहां घरेलू हिंसा सहित अन्य क्राइम रेट का बढ़ता ग्राफ  सभ्य समाज की शांति के लिए खतरा बन चुका है। इसलिए देवभूमि व वीरभूमि जैसे नामों की विशिष्ट शिनाख्त हासिल कर चुके राज्य में नशाखोरी के लिए मरहम पट्टी की जगह बड़ी सर्जरी की जरूरत है। पहाड़ की दहलीज पर नशे की गर्दिश नितांत चिंताजनक मसला है, अतः भाषण, चिंता व चिंतन के बजाय नशे के काले कारोबार पर बड़ा एक्शन चाहिए।

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