पहेलियां सुलझीं, गुत्थियां नहीं

पहेलियां सुलझीं तो नई गुत्थियां पैदा हो गईं। विपिन परमार को हिमाचल विधानसभा का अध्यक्ष बनाना अगर एक पहेली का सुलझना है, तो नई गुत्थियों का श्रीगणेश भी करता है। पहेलियां दूसरी तरफ हिमाचल भाजपा की कार्यकारिणी में हल हो रही हैं, तो समीकरणों के नए ढेर पर सत्ता से संगठन तक पार्टी का कदमताल देखा जाएगा। यहां कई पदों की पैदावार में तमगे चुने जा रहे हैं या तमगों के बदलाव में राजनीति का स्तर और स्तरोन्नत सुराखों में भाजपा का कद देखा जाएगा। जो भी हो सत्ता के बीच कुछ तो संघर्ष चल रहा है या पदों की टेढ़ी खीर में नेताओं के मुंह का स्वाद बिगड़ रहा है। सरकार के भीतर से मंत्री हट रहे हैं, भले ही कारण अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं। यह अलग तरह की बिसात है, जहां बादशाह अंत में एक कमजोर मोहरा बन रहा है। कांगड़ा के लिहाज से दो वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल से रुखसत कराने की पृष्ठभूमि में झांकें तो प्रदेश की सत्ता का यह हिस्सा, अत्यंत गरीब दिखाई दे रहा है। पहले किशन कपूर को ठोकर लगी और अब विपिन परमार को निष्क्रिय किया गया। यह दीगर है कि अपनी निष्क्रियता से बाहर डा. राजीव बिंदल अब अपनी सक्रियता का दायरा फैला रहे हैं। यहां अभी तो यही विश्लेषण हो रहा है कि कांगड़ा के वरिष्ठ नेताओं का मौजूदा वक्त, सत्ता के सामने कमजोर हो चुका है। ऐसे में किशन कपूर या अब विपिन परमार की भरपाई में भाजपा नए नगीने ढूंढ पाएगी या सत्ता की चकाचौंध में फुर्सत से नए प्रयोग किए जाएंगे। यहां शिविर दर शिविर लुढ़के हैं, तो रमेश धवाला सरीखे नेता भी अब राजनीति के घुटनों पर शक करते हैं। ऐसे में पिछले काफी अरसे से परिक्रमा कर रहे राकेश पठानिया के दिन बहुरेंगे या वही एक संभावना है, जिसे साकार करने के लिए जगह बनाई गई। जाहिर है यह राकेश पठानिया बनाम विपिन परमार तो फैसला नहीं हुआ होगा। यह इस तरह भी देखा जाएगा कि सरकार तमाम लक्ष्मण रेखाओं को काटकर अपने ढंग से आगे बढ़ना चाहती है। कांगड़ा फिर सियासत की विवशता बन गया या फिर से इसे अपाहिज करने के लिए पहले किशन कपूर को चलता किया गया और अब विपिन परमार के रथ को रोका गया। आखिर सत्ता के भंवर यहीं क्यों पैदा होते हैं और क्यों सारे विराम कांगड़ा में ही देखे जाते हैं। अब देखना यह होगा कि किशन कपूर और विपिन परमार की रिक्तता में किस नेता के पक्ष में क्षेत्रीय संतुलन देखा जाता है। राकेश पठानिया को अगर मंत्री बनाया जाता है, तो उनकी हस्ती में अतीत के कई साए भी शिरकत करेंगे। हालांकि जयराम सरकार के गठन के बाद रिक्त हुए तीन मंत्री पद अपनी वकालत में नए चेहरे ढूंढने के अलावा यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सरकार के भीतर विभागों का बंटवारा समान प्रभाव से हो। विभागीय तौर पर कई खिड़कियां बंद हैं, जबकि कुछ मंत्रियों के वजन से कहीं अधिक विभाग चस्पां हैं। बजट सत्र को रेखांकित करती उम्मीदों के पालने कुछ ताकतवर मंत्रियों के झूले का इंतजार कर रहे हैं। यह केवल कुछ प्रश्नों के उत्तर बयान करने का मंजर नहीं, बल्कि उत्तरों को मांजने व प्रस्तुत करने की कार्यशैली भी होगी। बजट सत्र आते-आते सरकार के बचाव में तीन मंत्रियों की कमी और अपनी भूमिका में सफल रहे विधानसभा अध्यक्ष राजीव बिंदल के स्थान पर विपिन परमार का आगमन, सत्ता का शगुन है या नई परीक्षा की शुरुआत। विधानसभा अध्यक्ष के पद पर आसीन हो रही करवटें किस तरह पेश आती हैं या यह सफर किन मुहानों का स्पर्श करता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। बहरहाल परिवर्तनों के इस दौर में भाजपा के बरतन किस तरह खनकते हैं, यह भी उस महत्त्वाकांक्षा से जुड़ा प्रश्न है, जो मंत्रिमंडल की रिक्तियों में नसीब जगाने के संदर्भ छू रहा है। कुल मिलाकर अपनी वैचारिक धरती पर भाजपा की कशमकश सत्ता के मध्यांतर तक आते आते, स्पष्ट होने लगी है। कम से कम विपिन परमार को मंत्री से विधानसभा अध्यक्ष के पद तक पहुंचाने का सफर, किसी भी मानदंड में सामान्य नहीं। देखें ऐसी स्वीकारोक्ति के भीतर कितने छेद होते हैं या निम्न पायदान पर खड़े कांगड़ा के कान किस हद तक खड़े होते हैं।

 

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