बेहतर कल की ईंटें

Feb 20th, 2020 12:05 am

वार्षिक योजना की ताकत में हिमाचल का सामाजिक सेवा क्षेत्र ठांठें मार रहा है, फिर भी प्रश्नों की फेहरिस्त में हिमाचल के जज्बात पूछते हैं। हर लम्हे के खुशहाल होने की दूब पर चलते प्रदेश को इंतजार है कि ऐसे स्कूल दिखाई दें जहां पीढि़यों का सफर विराम न हो और न ही सरकारी अस्पताल की दवाई को भी दुआ की जरूरत रहे। वार्षिक योजना का हिसाब तय है और आठ सौ करोड़ अतिरिक्त आने का खर्च भी बंट जाएगा, लेकिन तिनके उस घास के मजबूर न हों, जहां आज भी इनकी छांव में सुबह होने का जिक्र छिपा है। जाहिर है वार्षिक योजनाओं में आज तक हिमाचल ने पर्वतीय अंचल को बेहतर ढंग से ढांपा और कई सफल कहानियां भी लिखीं। हिमाचल की मात्रात्मक शिक्षा का उल्लेख देश के लिए उदाहरण बना और साक्षरता की सीढि़यां चढ़ते यह प्रदेश अव्वल रहा, लेकिन अब गुणवत्ता की शक्ति में पढ़ने की वजह पूछी जाएगी। यह एक साल भर का बही खाता नहीं और न ही एक सरकार का चंद दिनों का तोहफा हो सकता है। वार्षिक योजनाओं के सफर की कहानी अब एक नई दिशा खोज रही है। उदाहरण के लिए मंडी-सुंदरनगर के छात्र अगर कलस्टर यूनिवर्सिटी का पता पूछ रहे हैं, तो यह शिक्षा के नए उच्चारण हैं या विद्यार्थी होने की क्षमता के नए सुर। कुछ इसी तरह अस्थायी परिसरों में बंटे केंद्रीय विश्वविद्यालय का छात्र समुदाय से रिश्ता अगर बिखरा-बिखरा दिखाई दे रहा है, तो हमारी शिक्षा के मानक हैं कहां। वार्षिक योजना के फलक पर प्रदेश की प्राथमिकताओं से नजदीकी पुनः स्पष्ट हो रही है, तो ट्रासंपोर्ट सेक्टर तथा पर्यटन क्षेत्र का चेहरा मुस्कराने लगा है। दरअसल पर्यटन का परिवहन से ताल्लुक हर उस अंदाज से है, जो महज कनेक्टिविटी नहीं सुविधाओं में निरंतर इजाफा है। सड़क परिवहन से इतर ढांचागत उपलब्धियों में विकल्प ढूंढे जाएं, तो शिमला जैसे शहर में वाहनों का शोर और ट्रैफिक जाम के अवरोधक कम होंगे। ऐसे में रज्जु मार्गों के अलावा एलिवेटिड ट्रैफिक नेटवर्क की दिशा में नए प्रयोग की गुंजाइश बढ़ जाती है। अभी तक प्रदेश भर में एक भी ट्रांसपोर्ट नगर का न होना, हमारी योजनाओं के लक्ष्यों को कमजोर करता है। यह शहरीकरण की तस्वीर में चिन्हित होती जरूरत है, जिसे कबूल करना होगा। बेशक सड़कों के ढांचे में निरंतर सुधार की प्रक्रिया में बजटीय प्रावधान और केंद्र का प्रश्रय मिल रहा है, लेकिन बेहतर यातायात के लिए योजना का आकार संकुचित व बेजुबान रहा है। सड़कों को यातायात नियमों के अनुरूप सुदृढ़ बनाने के लिए चौक-चौराहों, फ्लाई ओवर, सुरंग निर्माण तथा बाइपास जैसे निर्माण को तीव्रता से अंगीकार करना होगा। क्या हमारी योजनाएं बेहतर कल की ईंटें चुन रही हैं, ताकि बिना समय व धन गंवाए हम पूरे हिमाचल को योजनाबद्ध विकास के हर क्षेत्र से जोड़ पाएं। आश्चर्य यह है कि विकास का हिमाचली मंत्र केंद्र की प्रतिछाया में तैयार प्रदेश का बजट रहा है और कमोबेश उन्हीं मार्गों पर हम चले जहां तक ऐसी वित्तीय व्यवस्था रही। केंद्र ने नेशनल हाई-वे या फोरलेन घोषित किए, तो प्रदेश को अचानक भू अधिग्रहण की याद आ गई। क्या हमने लैंड बैंक बनाने के लिए संकल्प पत्र तैयार किए या वर्ष के लक्ष्यों में योजनाओं को ऐसी धार दी। प्यास लगने पर कुंआ खोदते-खोदते आज हाल यह है कि हिमाचल में भू अधिग्रहण अब सबसे अहम मुद्दा है। हमारे योजनाकार इसलिए प्रसन्न हो सकते हैं कि हिमाचल देश में वनों को प्रोत्साहित करने तथा अधिकतम क्षेत्र इनके तहत लाने के लिए पांच सर्वश्रेष्ठ राज्यों में शुमार है, लेकिन ऐसी परिस्थिति में जनता की दुश्वारियों का जिक्र नहीं होता। कब और कैसे हम चीड़ के जंगलों से निजात पाएंगे, जबकि एक स्थिति यह भी है कि प्रदेश में तारपीन का धंधा चौपट हो चुका है। जंगल से बाहर निकलकर जंगली जानवर और विशेष कर बंदर किसान-बागबान के साथ-साथ मानव बस्तियों में भी उत्पात मचा रहे हैं। क्या हमारी तमाम वार्षिक योजनाएं किसान को वापस खेत में पहुंचा पा रही हैं या डिपो का सस्ता राशन, कृषि पर विभागीय कौशल और हर सत्ता का भाषण किसी असत्य की तरह छलावा है। अगर ऐसा न होता तो लगातार चाय की खेती घट कर छटांग भर न होती। बावजूद इसके कि हमारी योजनाएं ‘दुग्ध गंगा’ जैसे नारों से अटी रहीं, प्रदेश के उपभोक्ता की मांग को दूध की उस थैली से जोड़ती है, जो कई पड़ोसी राज्यों से आयातित है। क्या हमारे किसान, ग्रामीण आर्थिकी या कृषि-बागबानी के अनुसंधान में इतना भी दम नहीं कि प्रदेश की दूध मांग को अपने स्तर पर पूरा कर सकें। आखिर हमारी कृषि आधारित आर्थिकी की दिशा क्या है। एक ओर किसान परंपरागत खेती छोड़ चुका है, तो दूसरी ओर जैव से जीरो बजट खेती के बीच समाधानों की मिट्टी सूखी पड़ी है। क्या हम केंद्र की वित्तीय सहायता से केवल संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं या कोई ऐसा पर्वतीय खाका है, जिसके लिए संघर्ष बाकी है। उदाहरण के लिए केंद्र ने मेडिकल कालेज बांटे तो प्रदेश ने छह सरकारी, एक निजी, एक एम्स और एक पीजीआई सेटेलाइट केंद्र ढूंढ लिया। देखने में यह गौरवान्वित करता है, लेकिन इससे चिकित्सा क्षेत्र की टांगें किस हद तक टूटीं। कितने अस्पताल आज अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर पा रहे और अब स्थिति यह है कि निवेश के भरोसे जनता निजी अस्पताल ढूंढ रही है। हमारी योजना मेडिकल कालेज हथियाती है, लेकिन चिकित्सा में गुणवत्ता गंवाती है। हमारी शिक्षा डिग्रियां बांटती है, लेकिन युवाओं का भविष्य नहीं बनाती। पिछले कुछ सालों में हमने काम या कामगार के हाथ खो दिए। हिमाचल की आयातित मजदूरी या प्रवासी मजदूर पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में हम कब तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सरकारी नौकरी के जाल में युवाओं के सपनों को फंसाए रखेंगे। युवा महत्त्वाकांक्षा को वर्तमान प्रतिस्पर्धा के काबिल बनाने की हमारी योजनाएं क्या हैं। क्या हम संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित करने की दिशा में अग्रसर होकर युवा का मार्गदर्शन करेंगे या जो पढ़ा लिखा नौजवान अकादमियों या पुस्तकालयों के चक्कर काट रहा है, उसे ढांचागत सुविधाएं प्रदान करेंगे। क्या सार्वजनिक पुस्तकालयों को हम युवा अध्ययन के मार्गदर्शक संस्थान बनाने की कोई प्राथमिकता बना पाएंगे। क्या प्रादेशिक स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक-दो केंद्र विकसित कर पाएंगे या यूं ही कहीं सियासी मांग पर स्कूल या कालेज खोलकर संतुष्ट होते रहेंगे।

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